ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 113

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 113. उषा की स्तुति और सरल हिंदी अर्थ

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 113 उषा और रात्रि को समर्पित है. इस सूक्त में उषा के आगमन, उसके प्रकाश और उसके कारण संसार से अंधकार के दूर होने का सुंदर वर्णन मिलता है.

उषा को यहां केवल सुबह के समय दिखाई देने वाली लालिमा के रूप में नहीं देखा गया है. वह संसार को प्रकाशित करने वाली, मनुष्यों और दूसरे प्राणियों को जगाने वाली तथा दिन के कार्यों के लिए मार्ग खोलने वाली शक्ति के रूप में सामने आती है.

सूक्त में उषा के आने के साथ रात का समाप्त होना, सूर्य के प्रकाश का प्रकट होना और जीवों का अपने-अपने काम में लगना बार-बार सामने आता है. उषा को धन देने वाली, कल्याणकारी और संसार को जागृत करने वाली भी कहा गया है.

इस सूक्त की एक विशेष बात यह है कि इसमें पूर्व में आई उषाओं और आने वाली उषाओं दोनों का स्मरण किया गया है. ऋषि देखते हैं कि पहले भी अनगिनत उषाएं आ चुकी हैं और आगे भी उषाएं आती रहेंगी. इस क्रम के बीच वर्तमान उषा अपना प्रकाश फैलाती है और संसार को जागृत करती है.

मंत्र 1

मंत्र

इदं श्रेष्ठ ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्र: प्रकेतो अजनिष्ट विभ्वा.
यथा प्रसूता सवितु: सवायाँ एवा रात्र्युषसे योनिमारैक्‌

सरल हिंदी अर्थ

घोर अंधकार को नष्ट करने वाली और प्रकाश करने वाली उषा आई है. इसकी बहुरंगी एवं विश्व को प्रकाशित करने वाली रश्मियां सभी जगह फैल गई हैं. जिस प्रकार रात्रि सूर्य से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार उषा का उत्पत्ति स्थान रात्रि है.

सरल व्याख्या

सूक्त की शुरुआत उषा के आगमन से होती है. ऋषि उसके प्रकाश को विशेष ज्योति के रूप में देखते हैं. उसके आते ही अंधकार पीछे हटता है और उसकी किरणें चारों ओर फैल जाती हैं.

यहां उषा और रात्रि के संबंध की ओर भी संकेत है. जिस प्रकार रात्रि का अपना एक क्रम है, उसी प्रकार उसके बाद उषा का आगमन होता है. इस तरह रात और सुबह एक निरंतर क्रम में जुड़े हुए दिखाई देते हैं.

मंत्र 2

मंत्र

रुशद्वत्सा रुशती श्वैत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्या:.
समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्ण चरत आमिना

सरल हिंदी अर्थ

सूर्य की माता तेजस्विनी एवं श्वेतवर्ण वाली उषा आई है. कृष्णवर्ण रात्रि ने उसे अपना स्थान दे दिया है. वह उषा के पीछे-पीछे आती है एवं एक-दूसरी का रूप नष्ट करती हुई आकाश में विचरण करती हैं.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में रात्रि और उषा को एक-दूसरे के क्रम में आने वाली शक्तियों के रूप में देखा गया है. रात्रि के बाद उषा आती है और उसका अंधकार हट जाता है.

दोनों के आने-जाने का यह क्रम लगातार चलता रहता है. उषा के प्रकाश के आते ही रात्रि पीछे हटती है और फिर समय आने पर रात्रि उषा के प्रकाश को ढक लेती है.

मंत्र 3

मंत्र

समानो अध्वा स्वस्रोरनन्तस्तमन्यान्या चरतो देवशिष्टे.
न मेथेते न तस्थतुः सुमेके नक्तोषासा समनसा विरूपे..

सरल हिंदी अर्थ

इन दोनों बहनों का अनंत गमनमार्ग एक ही है, जिस पर सूर्य द्वारा दिए गए निर्देश पाकर ये एक-दूसरी के पीछे आती-जाती रहती हैं. एक-दूसरे का रूप नष्ट करके आकाश में विचरण करती हैं और कभी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहतीं.

सरल व्याख्या

उषा और रात्रि को यहां दो बहनों की तरह बताया गया है. दोनों का मार्ग एक ही है, लेकिन उनका समय अलग-अलग है.

रात्रि के बाद उषा आती है और उषा के बाद फिर रात्रि आती है. दोनों का यह क्रम कभी रुकता नहीं. इस प्रकार मंत्र दिन और रात के निरंतर चक्र को सामने रखता है.

मंत्र 4

मंत्र

भास्वती नेत्री सूनृतानामचेति चित्रा वि दुरो न आव:.
प्रार्पा जगदव्यु नो रायो अख्यदुषा अजीगर्भुवनानि विश्वा

सरल हिंदी अर्थ

हम प्रकाशसंपन्न एवं वाणियों की नेत्री उषा को जानते हैं. विविध रूपों वाली उषा हमारे लिए अंधकार के द्वार खोल देती है, सारे संसार को प्रकाशित करते हुए हमें धन एवं समस्त लोक को प्रकाशित किया है.

सरल व्याख्या

यहां उषा को प्रकाशसंपन्न और वाणियों की नेत्री कहा गया है. उसके आने पर अंधकार के द्वार खुल जाते हैं और संसार दिखाई देने लगता है.

उषा का प्रकाश केवल किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रहता. उसकी किरणें चारों ओर फैलती हैं और संसार को उसके दैनिक कार्यों के लिए जागृत करती हैं.

मंत्र 5

मंत्र

जिद्मश्ये३चरितवे मघोन्याभोगय इष्टये राय उ त्वं.
दश्न॑ पश्यद्धय उर्विया विचक्ष उषां अजीगर्भुवनानि विश्वा.

सरल हिंदी अर्थ

उषा ठंडे सोए हुए लोगों में कुछ को अपने अपेक्षित स्थान को जाने के लिए, कुछ को भोग के लिए, कुछ को यश के लिए एवं कुछ को धन के लिए जगाती है. यह अंधकार के कारण थोड़ा देखने वालों के लिए सभी युगों को प्रकाशित करती है.

सरल व्याख्या

उषा के आते ही सोए हुए लोग जागने लगते हैं. कोई अपने काम के लिए उठता है, कोई अपने भोग के लिए, कोई यश के लिए और कोई धन की प्राप्ति के लिए.

इस तरह उषा संसार के अलग-अलग लोगों को उनके कार्यों की ओर ले जाने वाली शक्ति बन जाती है. अंधकार में जो दिखाई नहीं देता था, वह उसके प्रकाश में स्पष्ट होने लगता है.

मंत्र 6

मंत्र

क्षत्राय त्वं श्रवसे त्वं महीया इष्टये त्वमर्थमिव त्वमित्यै.
विसदृशा जीविताभिप्रचक्ष उषा अजीगर्भुवनानि विश्वा.

सरल हिंदी अर्थ

उषा किसी को धन के लिए, किसी को अन्न के लिए, किसी को महत्त्व के लिए एवं किसी को अभीष्ट वस्तु प्राप्ति के लिए जगाती है. वह नाना प्रकार के जीवों के निमित्त समस्त विश्व को प्रकाशित करती है.

सरल व्याख्या

पिछले मंत्र की तरह यहां भी उषा के द्वारा संसार को जगाने का वर्णन है. लेकिन इस बार अलग-अलग इच्छाओं का उल्लेख किया गया है.

कोई धन चाहता है, कोई अन्न, कोई सम्मान और कोई अपनी इच्छित वस्तु. उषा सबके लिए एक समान प्रकाश लेकर आती है और संसार के सभी जीवों को अपने-अपने काम में लगाती है.

मंत्र 7

मंत्र

एषा दिवो दुहिता प्रत्यदर्शि व्युच्छन्ती युवति: शुक्रवासा:.
विश्वस्येशाना पार्थिवस्य वस्व उषो अद्येह सुभगे व्युच्छ

सरल हिंदी अर्थ

आकाश की पुत्री उषा मनुष्यों द्वारा नित्य यौवना, श्वेतवसना, तमोनाशिनी एवं समस्त संपत्तियों की अधीश्वरी के रूप में देखी गई है. हे शोभनधनसंपन्न उषा! तुम आज यहां अंधकार नष्ट करो.

सरल व्याख्या

उषा को आकाश की पुत्री कहा गया है. वह नित्य नई और युवा दिखाई देती है. उसका प्रकाश अंधकार को दूर करता है और उसे संपत्तियों की अधीश्वरी के रूप में भी संबोधित किया गया है.

ऋषि उससे आज के दिन भी अंधकार दूर करने की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 8

मंत्र

परायतीनामन्वेति पाथ आयतीनां प्रथमा शश्वतीनाम्‌.
व्युच्छन्ती जीवमुदीरयन्त्युषा मृतं क॑ चन बोधय

सरल हिंदी अर्थ

अतीत उषाओं के मार्ग का अनुसरण वर्तमान उषा करती है. यह आने वाली अगणित उषाओं की आदि है. यह अंधकार को मिटाती, प्राणियों को जागृत करती एवं निद्रा में मृतवत बने लोगों को चेतन बनाती है.

सरल व्याख्या

यह मंत्र उषा के निरंतर क्रम को बहुत सुंदर ढंग से सामने रखता है. वर्तमान उषा पहले आ चुकी उषाओं के मार्ग पर आती है और भविष्य में आने वाली उषाओं के लिए भी क्रम बनाती है.

उसके आने पर सोए हुए प्राणी जागते हैं. जो रात में मृत व्यक्ति की तरह निश्चेष्ट पड़े थे, वे फिर से चेतन होकर अपने कार्यों में लग जाते हैं.

मंत्र 9

मंत्र

उषो यदरग्निं समिधे चकर्थ वि यदावश्चक्षसा सूर्यस्य.
यन्मानुषान्यक्ष्यमाणोँ अजीगस्तद्देवेषु चकृषे भद्र

सरल हिंदी अर्थ

हे उषा! तुमने अग्नि को प्रज्वलित किया है. अंधकारगत विश्व को सूर्य के प्रकाश से स्पष्ट किया है एवं यह जगत करने वाले मनुष्यों को अंधकार से छुड़ाकर दिया है, ये काम तुमने देवों के कल्याण के लिए किए हैं.

सरल व्याख्या

उषा के आने के साथ अग्नि के प्रज्वलित होने और सूर्य के प्रकाश से संसार के स्पष्ट होने का वर्णन है.

रात के अंधकार से मनुष्यों को निकालकर उन्हें दिन के काम में लगाने का कार्य भी उषा से जोड़ा गया है. इस प्रकार उषा का आगमन संसार के लिए सक्रियता का आरंभ बन जाता है.

मंत्र 10

मंत्र

कियात्या यत्समया भवाति या व्यूषुर्याश्चि नूनं व्युच्छा
अनु पूर्वा: कृपते वावशाना प्रदीध्याना जोषमन्याभिरेति

सरल हिंदी अर्थ

पता नहीं कितने समय से उषा उत्पन्न हो रही है और कितने समय तक उत्पन्न होती रहेगी. वर्तमान उषा पूर्ववर्ती उषाओं का अनुकरण करती है तथा आगामी उषाएं इसके प्रकाश का अनुर्तन करेंगी.

सरल व्याख्या

यह मंत्र उषा के अनादि से चले आ रहे क्रम पर विचार करता है. कितनी उषाएं पहले आ चुकी हैं और आगे कितनी उषाएं आएंगी, इसका कोई अंत दिखाई नहीं देता.

वर्तमान उषा पहले की उषाओं के मार्ग का अनुसरण करती है और भविष्य की उषाएं भी इसी क्रम में आती रहेंगी.

मंत्र 11

मंत्र

ईयुष्टे ये पूर्वतरामपश्यन्व्युच्छन्तीमुषसं मर्त्यास:.
अस्माभिरू नु प्रतिचक्ष्याभूदो ते यन्ति ये अपरीषु पश्या

सरल हिंदी अर्थ

जिन मनुष्यों ने अतिशय पूर्ववर्ती उषाओं को प्रकाश करते देखा था, वे समाप्त हो गए. उषा हमारे द्वारा इस समय देखी जाती है. होने वाली उषाओं को जो लोग देखेंगे, वे आ रहे हैं.

सरल व्याख्या

यहां ऋषि समय के बीतने की ओर ध्यान दिलाते हैं. जिन्होंने बहुत पहले की उषाओं को देखा था, वे अब इस संसार में नहीं हैं.

आज की उषा हम देख रहे हैं और भविष्य में आने वाली उषाओं को आने वाली पीढ़ियां देखेंगी. उषा बनी रहती है, लेकिन उसे देखने वाले मनुष्य बदलते रहते हैं.

मंत्र 12

मंत्र

यावयदद्वेषा ऋतपा ऋतेजा: सुम्नावरी सूनृता ईरयन्ती.
सुमड़लीर्बिभ्रती देववीतिमिहाद्योष: श्रेष्ठतमा व्युच्छ..

सरल हिंदी अर्थ

हे उषा! तुम हमसे द्वेष करने वाली को दूर हटाने वाली, सत्य की पालनकर्त्री, यज्ञ के निमित्त उत्पन्न सुखयुक्त वचनों की प्रेरक, कल्याणहित एवं देवों के अभिलषित यज्ञ को धारण करने वाली हो, तुम उत्तम प्रकार से आज इस स्थान को प्रकाशित करो.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में उषा से केवल प्रकाश देने की ही नहीं, बल्कि कल्याणकारी और शुभ कार्यों को आगे बढ़ाने की प्रार्थना की गई है.

ऋषि चाहते हैं कि उषा द्वेष को दूर करे, सत्य के पालन में सहायता करे और यज्ञ से जुड़े शुभ कार्यों के लिए अनुकूल वातावरण बनाए.

मंत्र 13

मंत्र

शश्चत्पुरोषा व्युवास देव्यथो अद्येदं व्यावो मघोनी.
अथो व्युच्छादुत्तराँ अनु द्यूनजरामृता चरति स्वधाभि:..

सरल हिंदी अर्थ

देवी उषा पूर्वकाल में प्रतिदिन प्रकाश देती थी. धन की स्वामिनी उषा आज भी इस विश्व को अंधकार से छुड़ा दिलाती है एवं इसी प्रकार भविष्य के दिनों में प्रकाश प्रदान करेगी. वह जरा एवं मरण से रहित होकर अपने तेज से विचरण करती है.

सरल व्याख्या

यहां फिर उषा के निरंतर क्रम का वर्णन है. वह पहले भी प्रतिदिन आती थी, आज भी आती है और भविष्य में भी आती रहेगी.

मनुष्यों का जीवन सीमित है, लेकिन उषा का प्रकाश अपने क्रम में बना रहता है. वह हर दिन अंधकार को पीछे हटाकर नया दिन सामने लाती है.

मंत्र 14

मंत्र

व्यश्ज्जिभिर्दिव आतास्वद्यौदप कृष्णां निर्णिजं देव्याव:.
प्रबोधयन्त्यरुणेभिरश्वैरोषा याति सुयुजा रथेन..

सरल हिंदी अर्थ

आकाश की विस्तृत दिशाओं में उषा प्रकाश करते हुए उदित होती है एवं उसने रात्रि द्वारा निर्मित काल को समाप्त कर दिया है. वह सोते हुए प्राणियों को जगाती हुई लाल रंग वाले अपने घोड़ों वाले रथ से आती रहती है.

सरल व्याख्या

उषा के आने पर आकाश की दिशाएं प्रकाश से भर जाती हैं. रात्रि का अंधकार समाप्त होता है और सोए हुए प्राणी जागने लगते हैं.

यहां उषा के रथ और उसके लाल रंग के घोड़ों का भी उल्लेख मिलता है. यह उषा के आगमन को एक सजीव दृश्य के रूप में सामने रखता है.

मंत्र 15

मंत्र

आवहन्ती पोष्या वार्याणि चित्र केतुं कृणुते चेकिताना.
ईयुषीणामुपमा शश्वतीनां विभातीनां प्रथमोषा व्यश्वैत्‌.

सरल हिंदी अर्थ

उषा पोषण समर्थ, वरणीय धन को लाती हुई एवं समस्त मनुष्यों को चेतनयुक्त करती हुई विविध किरणों को प्रकाशित करती है. पूर्ववर्ती उषाओं के उपमान एवं आगामी विशेष प्रकाशयुक्त उषाओं की प्रथा वह उषा अपने तेज से बढ़ाती है.

सरल व्याख्या

उषा को यहां पोषण और धन लाने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है. उसकी किरणें संसार को प्रकाशित करती हैं और मनुष्यों को जागृत करती हैं.

साथ ही पहले आ चुकी और आगे आने वाली उषाओं के बीच वर्तमान उषा एक कड़ी के रूप में दिखाई देती है.

मंत्र 16

मंत्र

उदीर्ध्व॑ जीवो असुर्न आगादप प्रागात्तम आ ज्योतिरेति.
आरैक्पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्‍्त आयु:.

सरल हिंदी अर्थ

हे मनुष्यो! उठो, हमारे शरीर को प्रेरक जीव आ गया है. अंधकार चला गया एवं प्रकाश आ रहा है. हे उषा! हम उस देश में जाते हैं जिसमें तुम अन्न की वृद्धि करती हो.

सरल व्याख्या

यह मंत्र उषा के सबसे सीधे प्रभाव को सामने रखता है—जागरण.

ऋषि मनुष्यों को उठने के लिए कहते हैं. रात का अंधकार समाप्त हो चुका है और प्रकाश आ गया है. अब दिन के कार्यों का समय है.

मंत्र 17

मंत्र

स्यूमना वाच उदियर्ति वह्लिः स्तवानो रेभ उषसो विभाती:ः.
अद्या तदुच्छ गृणते मघोन्यस्मे आयुर्नि दिदीहि प्रजावत्‌..

सरल हिंदी अर्थ

स्तुतियों को वहन करने वाला स्तोता प्रकाशमान उषा की स्तुति करता हुआ सुखावस्थित वेद वचन बोलता है. हे धनस्वामिनी उषा! इसलिए आज इस स्तोता का रात्रि संबंधी अंधकार मिटाओ तथा हमें प्रजायुक्त धन दो.

सरल व्याख्या

यहां ऋषि स्वयं स्तुति करने वाले व्यक्ति की बात करते हैं. उषा के प्रकाश में वह उसकी स्तुति करता है और शुभ वचन बोलता है.

उषा से प्रार्थना की गई है कि वह रात्रि का अंधकार दूर करे और स्तोता को प्रजा तथा धन से युक्त करे.

मंत्र 18

मंत्र

या गोमतीरुषस:ः सर्ववीरा व्युच्छन्ति दाशुषे मर्त्याय.
वायोरिव सुनृतानामुदर्के ता अश्वदा अश्ववत्सोमसुत्वा

सरल हिंदी अर्थ

गो-संपन्न एवं समस्त शूरों से युक्त जो उषाएं स्तुति वचन समाप्त होते ही हृदय देने वाले यजमान का वायु के समान शीघ्र अंधकार नष्ट करती हैं, वे ही अश्व देने वाली उषाएं सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को व्याप्त करें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में उषा के साथ गाय, वीरता और अश्व जैसे समृद्धि के प्रतीकों का उल्लेख आता है. उषा के आने पर अंधकार बहुत तेजी से दूर होता है.

ऋषि ऐसी उषाओं की कामना करते हैं जो यजमान के लिए समृद्धि और कल्याण लेकर आएं.

मंत्र 19

मंत्र

माता देवानामदितेरनीकं यज्ञस्य केतुर्बहती विभाहि.
प्रशस्तिकृद्‌ ब्रह्मणे नो व्युशच्छा नो जने जनय विश्ववारे..

सरल हिंदी अर्थ

हे देवों की माता एवं अदिति से प्रतिस्पर्धा करने वाली उषा! तुम यज्ञ का ज्ञापन करती हुई एवं महत्व प्राप्त करती हुई प्रकाशित एवं हमारे स्तोत्र की प्रशंसा करती हुई उदित बनो. हे वरदायिनी उषा! हमें संसार में प्रसिद्ध बनाओ.

सरल व्याख्या

उषा को यहां अत्यंत सम्मानित रूप में संबोधित किया गया है. ऋषि उससे यज्ञ और स्तुति को स्वीकार करने तथा अपने स्तोत्र को प्रतिष्ठा देने की प्रार्थना करते हैं.

अंत में उषा से संसार में प्रसिद्धि और सम्मान देने की इच्छा व्यक्त की गई है.

मंत्र 20

मंत्र

यच्चित्रमप्नर उषसो वहन्तीजानाय शशमानाय भद्रम्‌.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:..

सरल हिंदी अर्थ

उषा जो विविध एवं प्राप्त करने योग्य धन लाती हैं, वह हर्ष देने वाले वाले स्तोता के लिए कल्याणकारी है. मित्र, वरुण, सिंधु, धरती एवं आकाश इस प्रार्थना की पूजा करें.

सरल व्याख्या

सूक्त का अंतिम मंत्र उषा से मिलने वाले धन और कल्याण की प्रार्थना के साथ समाप्त होता है.

ऋषि उषा से विविध प्रकार के कल्याणकारी धन की कामना करते हैं. अंत में मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है और उनसे इस प्रार्थना का आदर करने की कामना की गई है.

सूक्त 113 का सरल सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 113 मुख्य रूप से उषा के आगमन और उसके प्रकाश का सूक्त है. इसमें रात के अंधकार से दिन के प्रकाश की ओर होने वाले परिवर्तन को बहुत स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत किया गया है.

उषा आती है तो अंधकार दूर होता है, सूर्य का प्रकाश दिखाई देने लगता है और सोए हुए प्राणी जागने लगते हैं. मनुष्य अपने-अपने काम में लगते हैं. कोई धन चाहता है, कोई अन्न, कोई यश और कोई अपनी इच्छित वस्तु. उषा सभी के लिए प्रकाश लेकर आती है.

सूक्त में उषा और रात्रि को दो बहनों के समान बताया गया है. दोनों का मार्ग एक है और वे एक-दूसरे के बाद आती रहती हैं. एक आती है तो दूसरी पीछे हट जाती है. इस प्रकार दिन और रात का क्रम निरंतर चलता रहता है.

उषा को आकाश की पुत्री, नित्य युवा, श्वेतवसना और अंधकार का नाश करने वाली कहा गया है. वह केवल प्रकाश नहीं देती, बल्कि संसार को जागृत करती है और मनुष्यों को उनके दैनिक कर्मों की ओर ले जाती है.

सूक्त का एक गहरा भाव समय के निरंतर बीतने से जुड़ा है. जिन लोगों ने बहुत पुरानी उषाओं को देखा था, वे अब नहीं हैं. आज की उषा हम देख रहे हैं और भविष्य की उषाओं को आने वाली पीढ़ियां देखेंगी. उषा आती रहती है, जबकि उसे देखने वाले मनुष्य बदलते रहते हैं.

उषा का यह क्रम अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ जोड़ता है. वर्तमान उषा पहले की उषाओं का अनुसरण करती है और भविष्य में आने वाली उषाएं भी इसी क्रम को आगे बढ़ाएंगी.

सूक्त में उषा से अंधकार दूर करने के साथ-साथ धन, अन्न, प्रजा, यश और कल्याण देने की प्रार्थना भी की गई है. वह यज्ञ और स्तुति के लिए अनुकूल समय लेकर आती है और संसार को फिर से सक्रिय बनाती है.

अंतिम मंत्र में उषा से प्राप्त होने वाले विविध और कल्याणकारी धन की कामना की गई है. इसके साथ मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण करके प्रार्थना के स्वीकार किए जाने की इच्छा व्यक्त की गई है.

इस प्रकार सूक्त 113 का मुख्य भाव उषा के प्रकाश, अंधकार के अंत, प्राणियों के जागरण, समय के निरंतर क्रम और जीवन में प्रकाश, कर्म, धन तथा कल्याण की कामना है.

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