ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 114

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 114. रुद्र की स्तुति और आरोग्य तथा रक्षा की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 114 रुद्र देवता को समर्पित है. इस सूक्त में रुद्र के शक्तिशाली और वीर स्वरूप के साथ उनके कल्याणकारी तथा रक्षक रूप की प्रार्थना की गई है.

सूक्त का आरंभ रुद्र के लिए स्तुतियां अर्पित करने से होता है. ऋषि का उद्देश्य केवल रुद्र की प्रशंसा करना नहीं है, बल्कि उनकी कृपा से द्विपद और चतुष्पद प्राणियों की रोगशांति, गांव के लोगों की पुष्टि और आरोग्य की कामना करना भी है.

इसके बाद रुद्र से सुख, निर्भयता और प्रजा की रक्षा की प्रार्थना की जाती है. रुद्र के उग्र क्रोध और उनके घातक आयुधों से रक्षा की विशेष याचना इस सूक्त की प्रमुख विशेषता है.

सूक्त में रुद्र को जटाधारी, वीरनाशक, तेजस्वी, धनुर्धारी और औषधियों को धारण करने वाले देवता के रूप में संबोधित किया गया है. साथ ही उन्हें मरुतों का पिता कहा गया है.

सूक्त के अंतिम मंत्रों में रुद्र से वृद्ध, बालक, गर्भस्थ शिशु, पुत्र-पौत्र, दास, गाय, घोड़े और वीर पुरुषों की रक्षा करने की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 1

मंत्र

इमा रुद्राय तवसे कपर्दिने क्षयद्वीराय प्र भरामहे मती:.
यथा शमसदद्विपदे चतुष्पदे विश्व पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम

सरल हिंदी अर्थ

हम प्रवृद्ध जटाधारी एवं वीरनाशक रुद्र के लिए ये मननीय स्तुतियां इसलिए अर्पित कर रहे हैं, जिससे द्विपद एवं चतुष्पद की रोगशांति हो. गांव में सभी लोग पुष्ट तथा अनातुर अर्थात रोगरहित रहें.

सरल व्याख्या

सूक्त की शुरुआत ही रुद्र से आरोग्य और सामूहिक कल्याण की प्रार्थना से होती है.

ऋषि चाहते हैं कि रुद्र की कृपा से मनुष्य और पशु दोनों स्वस्थ रहें. केवल व्यक्ति का स्वास्थ्य नहीं, बल्कि पूरे गांव की पुष्टि और रोगमुक्ति इस मंत्र की मुख्य कामना है.

मंत्र 2

मंत्र

मृव्ठा नो रुद्रोत नो मयस्कृधि क्षयद्वीराय नमसा विधेम ते.
यच्छ॑ च योश्व मनुरायेजे पिता तदश्याम तव रुद्र प्रणीतिषु..

सरल हिंदी अर्थ

हे रुद्र! हमारे लिए सुखकारक बनो एवं हमें सुख प्रदान करो. हम नमस्कारपूर्वक वीरनाशक रुद्र की सेवा करते हैं. पिता मनु ने जो रोगशांति और निर्भयता प्राप्त की थी, हे रुद्र! तुम्हें नमस्कार करने पर हम भी उन्हें प्राप्त करें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में रुद्र से सुख, रोगशांति और निर्भयता मांगी गई है.

ऋषि पूर्वज मनु का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार मनु को सुख और निर्भयता प्राप्त हुई, उसी प्रकार रुद्र की कृपा से उन्हें भी प्राप्त हो.

मंत्र 3

मंत्र

अश्याम ते सुमतिं देवयज्यया क्षयद्वीरस्य तव रुद्र मीढ्व:.
सुम्नायन्निद्विशो अस्माकमा चरारिष्टवीरा जुहवाम ते हवि

सरल हिंदी अर्थ

हे कामवर्षक रुद्र! हम वीरनाशक एवं मरुत-सहयोगी तुम्हारी कृपा देवयज्ञ के द्वारा पाएं. हमारी प्रजाओं के सुख की इच्छा करते हुए तुम उनके समीप आओ. प्रजा को हानिरहित देखकर हम तुम्हारे लिए हव्य दें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में रुद्र से अपनी प्रजा के सुख और सुरक्षा की प्रार्थना की गई है.

ऋषि चाहते हैं कि रुद्र उनके समीप आएं, उनकी प्रजा को किसी प्रकार की हानि न हो और सुरक्षित प्रजा को देखकर वे रुद्र के लिए हव्य अर्पित कर सकें.

मंत्र 4

मंत्र

त्वेषं वयं रुद्रं यज्ञलसा्धं वड़ककविमवसे नि ह्वयामहे.
आरे अरुद्दैव्यं हेव्ठो अस्यतु सुमतिमिद्वयमस्या वृणीम

सरल हिंदी अर्थ

हम रक्षा के निमित्त दीप्त, यज्ञसाधक, कुटिलगति एवं क्रांतदर्शी रुद्र को बुलाते हैं. रुद्र अपना दीप्त क्रोध दूर करें एवं हम उनकी शोभन कृपादृष्टि प्राप्त करें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में रुद्र के उग्र और तेजस्वी स्वरूप का उल्लेख है. ऋषि उन्हें रक्षा के लिए बुलाते हैं, लेकिन साथ ही उनसे अपना क्रोध दूर रखने की प्रार्थना करते हैं.

यहां रुद्र की शक्ति से भय के बजाय उनकी शोभन कृपादृष्टि प्राप्त करने की इच्छा प्रमुख है.

मंत्र 5

मंत्र

दिवो वराहमरुष॑ कपर्दिन॑ त्वेषं रूपं नमसा नि ह्वयामहे.
हस्ते बिश्रद्धेषजा वार्याणि शर्म वर्म च्छर्दिसस्मभ्यं यंसत्‌..

सरल हिंदी अर्थ

हम वराह के समान दृढ़, प्रकाशशील, जटाधारी, तेजोदीप्त एवं निरूपणीय रुद्र को नमस्कार द्वारा बुलाते हैं. वे अपने हाथों में वरणीय औषधियां धारण करते हुए हमें सुख, कवच एवं गृह प्रदान करें.

सरल व्याख्या

यह मंत्र रुद्र के एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष को सामने लाता है. यहां वे केवल उग्र देवता नहीं हैं, बल्कि औषधियों को धारण करने वाले और सुख तथा रक्षा देने वाले देवता भी हैं.

ऋषि उनसे औषधि, सुरक्षा-कवच और सुरक्षित निवास की कामना करते हैं.

मंत्र 6

मंत्र

इदं पित्रे मरुतामुच्यते वचः स्वादो: स्वादीयो रुदाय वर्धनम्‌.
रास्वा च नो अमृत मर्तभोजनं त्मने तोकाय तनयाय मृत्ठ..

सरल हिंदी अर्थ

मरुतों के पिता रुद्र को लक्ष्य करके हम स्वादिष्ट पदार्थों से भी मधुर एवं वृद्धिकारक स्तुति-वचन बोल रहे हैं. हे मरणरहित रुद्र! हमें मनुष्यों का भोजन प्रदान करो और मेरे तथा मेरे पुत्र की रक्षा करो.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में रुद्र को मरुतों का पिता कहा गया है.

ऋषि रुद्र से भोजन और पोषण की कामना करते हैं. साथ ही अपने और अपने पुत्र की रक्षा की प्रार्थना करते हैं. यहां परिवार के कल्याण और भोजन की आवश्यकता दोनों साथ दिखाई देती हैं.

मंत्र 7

मंत्र

मा नो महान्तमुत मा नो अर्भक॑ मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम्‌,
मा नो वधी: पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिष:..

सरल हिंदी अर्थ

हे रुद्र! हम लोगों में से वयोवृद्ध, बालक, गर्भाधान समर्थ युवक एवं गर्भस्थ शिशु की हिंसा मत करना. हमारी माता अथवा पिता की हिंसा एवं हमारे प्रिय शरीर का नाश भी मत करना.

सरल व्याख्या

यह सूक्त का अत्यंत महत्वपूर्ण रक्षा-मंत्र है.

ऋषि रुद्र से परिवार की प्रत्येक पीढ़ी की रक्षा की प्रार्थना करते हैं—वृद्ध, बालक, युवा और गर्भस्थ शिशु तक. माता-पिता और अपने प्रिय शरीर की सुरक्षा भी मांगी गई है.

इस मंत्र में परिवार की संपूर्ण पीढ़ीगत सुरक्षा का भाव बहुत स्पष्ट है.

मंत्र 8

मंत्र

मा नस्तोके तनये मा न आयौ मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिष:.
वीरान्मा नो रुद्र भामितो वधीह्विष्मन्त: सदमित्त्वा हवामहे..

सरल हिंदी अर्थ

हे रुद्र! हमारे पुत्र, पौत्र, दास, गाय एवं घोड़ों की हिंसा एवं क्रोधित होकर हमारे वीरों का वध मत करना. हम सदैव हव्य लेकर तुम्हें बुलाते हैं.

सरल व्याख्या

मंत्र 7 में परिवार के सदस्यों की रक्षा मांगी गई थी, जबकि मंत्र 8 में यह सुरक्षा और विस्तृत हो जाती है.

ऋषि रुद्र से पुत्र-पौत्र के साथ दास, गाय, घोड़े और वीर पुरुषों की रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं. यह उस समय के परिवार, पशुधन और सामुदायिक शक्ति के महत्व को दर्शाता है.

मंत्र 9

मंत्र

उप ते स्तोमान्पशुपा इवाकरं रास्वा पितृर्मरुतां सुम्नमस्मे.
भद्रा हि ते सुमतिर्मुव्ठयत्तमाथा वयमव इत्ते वृणीमहे

सरल हिंदी अर्थ

हे मरुतपिता! जिस प्रकार गोप दिनभर चराने के बाद पशु मालिक को लौटा देता है, उसी प्रकार मैं तुम्हारा स्तोत्र तुम्हें लौटा रहा हूं. हमें सुख दो. तुम्हारी कल्याणकारी बुद्धि परम रक्षक एवं सुखकारिणी है, इसी कारण हम तुमसे रक्षा की याचना करते हैं.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में एक सुंदर उपमा दी गई है. जैसे गोप अपने पशुओं को चराने के बाद उनके स्वामी को लौटा देता है, उसी प्रकार स्तोता अपनी स्तुति रुद्र को अर्पित करता है.

ऋषि रुद्र की कल्याणकारी बुद्धि को रक्षक और सुख देने वाली मानते हुए उनसे अपनी रक्षा की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 10

मंत्र

आरे ते गोघ्नमुत पूरुषध्नं क्षयद्वीर सुम्नमस्मे ते अस्तु.
मृव्ठा च नो अधि च ब्रूहि देवाधा च नः शर्म यच्छ द्विबर्हाः

सरल हिंदी अर्थ

हे वीरनाशक रुद्र! गोहनन एवं मनुष्य हनन का साधन तुम्हारा आयुध हमसे दूर रहे. हमारे पास तुम्हारा दिया सुख रहे. हमें सुखी करो एवं हमारे प्रति पक्षपात रखने वाले वचन बोलो. तुम धरती और आकाश के स्वामी बनकर हमें सुख दो.

सरल व्याख्या

यहां ऋषि रुद्र के घातक आयुधों को दूर रखने की स्पष्ट प्रार्थना करते हैं.

रुद्र की शक्ति को स्वीकार करते हुए उनसे विनाशकारी आयुधों के बजाय सुखदायक और रक्षक स्वरूप की अपेक्षा की गई है. अंत में धरती और आकाश के स्वामी के रूप में रुद्र से सुख की कामना की गई है.

मंत्र 11

मंत्र

अवोचाम नमो अस्मा अवस्यव: शुणोतु नो हवं रुद्रो मरुत्वान्‌.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:.

सरल हिंदी अर्थ

रक्षा के इच्छुक हम लोग यह सूक्त बोलते हैं. इस रुद्र को नमस्कार हो. रुद्र मरुतों के साथ हमारी यह पुकार सुनें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना का आदर करें.

सरल व्याख्या

सूक्त का अंतिम मंत्र रुद्र को नमस्कार और उनकी ओर से रक्षा की प्रार्थना के साथ समाप्त होता है.

ऋषि चाहते हैं कि रुद्र मरुतों के साथ उनकी पुकार सुनें. इसके बाद मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण करते हुए इस प्रार्थना के स्वीकार और सम्मान की कामना की गई है.

सूक्त 114 का सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 114 रुद्र की स्तुति के साथ आरोग्य, परिवार, पशुधन और प्रजा की रक्षा की प्रार्थना करने वाला सूक्त है.

सूक्त के पहले ही मंत्र में द्विपद और चतुष्पद की रोगशांति तथा पूरे गांव के लोगों के पुष्ट और रोगरहित रहने की कामना की गई है. इससे स्पष्ट होता है कि रुद्र से मांगी गई कृपा केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामूहिक स्वास्थ्य और कल्याण से भी जुड़ी है.

दूसरे मंत्र में रुद्र से सुख, रोगशांति और निर्भयता की प्रार्थना की गई है. इसके बाद प्रजा के सुख और सुरक्षा का विषय सामने आता है.

सूक्त में रुद्र का उग्र रूप भी स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है. वे तेजस्वी, वीरनाशक और आयुध धारण करने वाले हैं. लेकिन ऋषि उनसे उनके क्रोध और घातक शक्ति को अपने से दूर रखने की प्रार्थना करते हैं.

पांचवें मंत्र में रुद्र के हाथों में औषधियां होने का उल्लेख है. उनसे सुख, कवच और सुरक्षित गृह देने की प्रार्थना की गई है. इस प्रकार रुद्र का एक औषधि और आरोग्य प्रदान करने वाला कल्याणकारी पक्ष भी सामने आता है.

छठे मंत्र में रुद्र को मरुतों का पिता कहा गया है. उनसे भोजन तथा अपने और अपने पुत्र की रक्षा की प्रार्थना की गई है.

सातवें और आठवें मंत्रों में परिवार और समाज की सुरक्षा का भाव सबसे अधिक स्पष्ट होता है. ऋषि रुद्र से वृद्ध, बालक, युवा, गर्भस्थ शिशु, माता-पिता, पुत्र-पौत्र, दास, गाय, घोड़े और वीर पुरुषों की रक्षा करने का निवेदन करते हैं.

नौवें मंत्र में रुद्र की कल्याणकारी बुद्धि को रक्षक और सुखदायक कहा गया है. ऋषि उनसे इसी कारण रक्षा की याचना करते हैं.

दसवें मंत्र में रुद्र के गो और मनुष्य के हनन के साधन बनने वाले आयुध को दूर रखने की प्रार्थना की गई है. ऋषि उनके विनाशकारी पक्ष के स्थान पर उनके सुखदायक और रक्षक स्वरूप की कामना करते हैं.

अंतिम मंत्र में रुद्र और मरुतों से स्तोता की पुकार सुनने का निवेदन किया गया है. साथ ही मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है.

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