ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 112

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 112. अश्विनीकुमारों की स्तुति और उनके उपकारों का वर्णन

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 112 अश्विनीकुमारों को समर्पित है. यह सूक्त अश्विनीकुमारों के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव प्रस्तुत करता है. इसमें उनके द्वारा अलग-अलग व्यक्तियों की सहायता करने, संकट से निकालने, रक्षा करने और उन्हें सुख प्रदान करने वाले अनेक प्रसंगों का वर्णन मिलता है.

इस सूक्त को पढ़ते हुए एक बात विशेष रूप से सामने आती है अश्विनीकुमारों को केवल किसी एक प्रकार की सहायता करने वाले देवताओं के रूप में नहीं देखा गया है. ऋषि उनके अनेक पुराने उपकारों को याद करते हैं. कहीं वे किसी संकट में पड़े व्यक्ति की सहायता करते हैं, कहीं किसी को जीवन या स्वास्थ्य प्रदान करते हैं, कहीं किसी की पत्नी, संतान, पशु या धन की रक्षा करते हैं और कहीं युद्ध अथवा कठिन परिस्थिति में सहारा देते हैं.

सूक्त के आरंभ में अश्विनीकुमारों को यज्ञ में आने के लिए आमंत्रित किया गया है. आगे उनके द्वारा किए गए विभिन्न कार्यों को एक-एक करके याद किया जाता है. सूक्त के अधिकांश मंत्रों की शुरुआत “याभिः…” से होती है, अर्थात उन उपायों या कार्यों का स्मरण करते हुए जिनके द्वारा अश्विनीकुमारों ने पहले सहायता की थी, ऋषि उन्हीं उपायों के साथ फिर आने की प्रार्थना करते हैं. यह इस सूक्त की सबसे प्रमुख शैलीगत विशेषताओं में से एक है.

मंत्र 1

ईब्ठे द्यावापृथिवीं पूर्वचित्तयेडग्निं घर्मं सुरुचं यामन्निष्टये.
याभिभे॑रे कारमंशाय जिन्वथस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गत

सरल हिंदी अर्थ

ऋषि अश्विनीकुमारों का आह्वान करते हुए कहते हैं कि वे उन उपायों के साथ यज्ञ में आएं, जिनके द्वारा उन्होंने पहले अपने भक्तों की सहायता की है. उनसे यज्ञ में उपस्थित होने और अपनी कृपा प्रदान करने की प्रार्थना की गई है.

सरल व्याख्या

सूक्त की शुरुआत सीधे अश्विनीकुमारों के आह्वान से होती है. ऋषि उनके पुराने उपकारों को याद करते हुए चाहते हैं कि वे उसी प्रकार इस यज्ञ में भी आएं.

यहां से सूक्त का एक खास ढंग शुरू होता है. आगे के मंत्रों में अश्विनीकुमारों द्वारा किए गए अलग-अलग कार्यों का उल्लेख मिलता है और हर बार उन्हीं कार्यों के माध्यम से उनकी सहायता फिर प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त होती है.

मंत्र 2

युवोर्दानाय सुभरा असश्वतो रथमा तस्थुर्वचसं न मन्तवे.
याभिर्धियो&वथ: कर्मन्निष्टये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! अन्य देवों में आसक्त होकर दूसरे स्तोता जिस प्रकार धन के लिए तुम्हारे रथ के पास पहुंचते हैं, उसी प्रकार न्यायपूर्ण वचन जानने वाले पंडित के पास लोग अपना फैसला कराने जाते हैं. तुम जिन उपायों से यज्ञ में लोगों की विशिष्ट स्त्रियों को रक्षा करते हो, उन्हीं उपायों के साथ हमारे पास आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में अश्विनीकुमारों की ओर लोगों के आकर्षण और उनके पास सहायता के लिए पहुंचने का भाव है. जैसे लोग किसी ज्ञानी व्यक्ति के पास उचित निर्णय पाने के लिए जाते हैं, वैसे ही स्तोता अश्विनीकुमारों से सहायता की अपेक्षा रखते हैं.

मंत्र में उनकी रक्षा करने वाली शक्ति का स्मरण करते हुए उनसे फिर उसी सहायता के साथ आने की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 3

युवं तासां दिव्यस्य प्रशासने विशां क्षयथो अमृतस्य मज्मना.
याभिवर्धनुमस्वं१ पिन्वथो नरा ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌..

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुम दोनों ने स्वर्ग में उत्पन्न सोमरूपी अमृत से प्राप्त बल के कारण तीनों लोकों में रहने वाली प्रजाओं का शासन किया. रक्षा के जिन उपायों से तुमने प्रसव में असमर्थ गायों को दूध देने योग्य बनाया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

यहां अश्विनीकुमारों के सामर्थ्य का वर्णन किया गया है. उनके बारे में कहा गया है कि अमृतरूपी सोम से प्राप्त बल के कारण वे तीनों लोकों की प्रजाओं का शासन करने में समर्थ थे.

इसके साथ एक विशेष उपकार का उल्लेख हैउन्होंने ऐसी गायों को भी दूध देने योग्य बनाया जो पहले प्रसव करने में असमर्थ थीं. ऋषि उन्हीं उपायों के साथ अश्विनीकुमारों से फिर आने की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 4

याभि: परिज्मा तनयस्य मज्मना द्विमाता तूर्षु तरणिविभूषति.
याभिस्त्रिमन्तुरभवद्विचक्षणस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! चारों ओर घूमने वाला वायु जब अपने पुत्र और माता से उत्पन्न अग्नि के बल से जुड़कर धन के स्थानों में बहुत तेजी से व्याप्त होता है, तब जिन उपायों से कक्षीवान ऋषि को विशिष्ट ज्ञानयुक्त किया गया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में वायु और अग्नि से जुड़ा हुआ चित्र सामने आता है. इसके बाद कक्षीवान ऋषि का उल्लेख किया गया है.

ऋषि अश्विनीकुमारों से उस सहायता और ज्ञान देने वाली शक्ति के साथ आने का निवेदन करते हैं, जिसके द्वारा कक्षीवान को विशेष ज्ञान प्राप्त हुआ था.

मंत्र 5

याभी रेभं निवृतं सितमदभ्य उद्धन्दनमैरयतं स्वर्दशे.
याभि: कण्वं प्र सिषासन्तमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गत

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से कुएं में फंसे हुए और पत्थरों से बांधे गए रेभ ऋषि को जल से बाहर निकाला था, उसी प्रकार वंदन नामक ऋषि को सूर्य के दर्शन के लिए जल से बाहर निकाला था और असुरों द्वारा अंधकार में डाले गए एवं प्रकाश की इच्छा रखने वाले वृषक ऋषि को जिन उपायों से बचाया था, उन्हीं उपायों के साथ हमारे पास आओ.

सरल व्याख्या

यह मंत्र अश्विनीकुमारों के कई पुराने उपकारों को एक साथ याद करता है. इसमें रेभ ऋषि, वंदन ऋषि और वृषक ऋषि से जुड़े संकटों का उल्लेख है.

किसी को कुएं से निकालना, किसी को सूर्य के दर्शन के लिए जल से बाहर लाना और किसी को अंधकार से बचाना—इन सभी प्रसंगों के माध्यम से अश्विनीकुमारों को संकट से निकालने वाले सहायक देवताओं के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

मंत्र 6

याभिरन्तकं जसमानमारणे भुज्युं याभिरव्यथिभिर्जिजिन्वशु:,
याभि: कर्कन्धुं वय्यं च जिन्वथस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन रक्षा संबंधी उपायों से कुएं में गिरकर मरते हुए राजा का जीवन बचाया था और समुद्र में डूबते हुए भुज्यु की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों से कक्षीवान और वय ऋषि को बचाया था. उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में अश्विनीकुमारों के दो अलग-अलग प्रकार के संकटों में सहायता करने का उल्लेख है—एक ओर कुएं में गिरा राजा और दूसरी ओर समुद्र में डूबता हुआ भुज्यु.

मंत्र का भाव यही है कि जिस शक्ति से अश्विनीकुमारों ने पहले लोगों की रक्षा की थी, उसी शक्ति से वे अब भी सहायता करें.

मंत्र 7

याभि: शुचन्तिं धनसां सुषंसद॑ं तप्तं घ॒र्ममोम्यावन्तमत्रये.
याभि: पृश्चिगुं पूरकुत्समावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌..

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से शुचि को धनसंपन्न और शोभन गृह का स्वामी बनाया, अग्नि को जलाने वाली तत्त्व अग्नि को सुखदायक बनाया तथा पृश्नि और पृक्षुस का संरक्षण किया, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में अश्विनीकुमारों के विभिन्न उपकारों का उल्लेख जारी रहता है. इसमें धन-संपन्नता, गृह-सुख और अग्नि से जुड़े प्रसंगों के साथ कुछ व्यक्तियों और समूहों की रक्षा का उल्लेख है.

ऋषि इन पुराने कार्यों को याद करके अश्विनीकुमारों से उसी कृपा के साथ आने का निवेदन करते हैं.

मंत्र 8

याभि: शचीभिर्वषणा परावृजं प्रान्धं श्रोणं चक्षस एतवे कृथः.
याभिवरर्तिकां ग्रसितामुड्चतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌

सरल हिंदी अर्थ

हे कामवर्षक अश्विनीकुमारों! तुमने जिन कर्मों द्वारा पणु नामक व्यक्ति को छलने में समर्थ, अंधे ऋज्राश्व को देखने में कुशल, जागरूक श्रौण को गतिशील और वृक द्वारा गृहीत पक्षी वर्तिका को मुक्त किया था, उन्हीं उपायों से आओ.

सरल व्याख्या

यह मंत्र अश्विनीकुमारों के कई अलग-अलग सहायता कार्यों को एक साथ सामने रखता है. इसमें ऋज्राश्व की दृष्टि वापस करने, श्रौण को गतिशील बनाने और वर्तिका नामक पक्षी को संकट से मुक्त करने जैसे प्रसंग आते हैं.

इससे अश्विनीकुमारों की सहायता को केवल एक क्षेत्र तक सीमित न मानकर अनेक प्रकार के संकटों से मुक्ति देने वाली शक्ति के रूप में देखा गया है.

मंत्र 9

याभि: सिन्धु मधुमन्तमसश्चतं वसिष्ठ॑ं याभिरजरावजिन्वतम्‌.
याभि: कुत्सं श्रुतर्य नर्यमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌.

सरल हिंदी अर्थ

हे जरारहित अश्विनीकुमारों! जिन उपायों से तुमने सिंधु नदी को मधुर प्रवाह वाली बनाया, वशिष्ठ को प्रसन्न किया तथा कुत्स, शर्याति और नर ऋषियों को सुरक्षित रखा, उन्हीं उपायों के साथ हमारे पास आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में नदी, ऋषि और अन्य व्यक्तियों से जुड़े कई प्रसंग आते हैं. अश्विनीकुमारों द्वारा सिंधु के मधुर प्रवाह, वशिष्ठ की प्रसन्नता तथा कुत्स, शर्याति और नर की रक्षा का स्मरण किया गया है.

ऋषि चाहते हैं कि ऐसी ही सहायता उन्हें भी प्राप्त हो.

मंत्र 10

याभिरवविश्पलां धनसामथर्व्य सहस्रमीव्ठहह आजावजिन्वतम
याभिववशमश्व्यं प्रेणिमावतं ताभिरू घु ऊतिभिरश्विना गतम्‌.

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! जिन उपायों से तुमने धन की इच्छा करने वाले को हजारों संपत्तियों से पूर्ण किया और संग्राम में जाने योग्य बनाया तथा अत्रि ऋषि के स्तुतिगत पुत्र वश ऋषि की रक्षा की, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

यहां अश्विनीकुमारों से धन और सामर्थ्य प्रदान करने वाले स्वरूप में सहायता की प्रार्थना की गई है. अत्रि ऋषि और वश ऋषि से जुड़ा प्रसंग भी उनके संरक्षणकारी स्वरूप को सामने लाता है.

मंत्र 11

याभि: सुदानू औशिजाय वणिजे दीर्घश्रवसे मधु कोशो अक्षरत्‌.
कक्षीवन्तं स्तोतारं याभिरावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌..

सरल हिंदी अर्थ

हे सुंदर दान वाले अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से अत्रि के पुत्र और वाणिज्य कर्म करने वाले दीर्घश्रवा के लिए जल बरसाया तथा स्तुतिकर्ता कक्षीवान की रक्षा की, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में अश्विनीकुमारों के द्वारा जल प्रदान करने और किसी की रक्षा करने के प्रसंग का उल्लेख है. दीर्घश्रवा और कक्षीवान के नाम यहां विशेष रूप से आते हैं.

सूक्त की शैली के अनुसार इन पुराने उपकारों को याद करके उनसे वर्तमान यज्ञ में भी आने की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 12

याभि रसां क्षोदसोदन: पिपिन्वथुरनश्वं याभी रथमावतं जिषे.
याभिस्रिशोक उस्रिया उदाजत ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌..

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से सरिताओं के तटों को जलपूर्ण किया, अध्वरहित रथ को विजय के लिए चलाया और त्रिशोक को अपनी पहुंची हुई गायों को पानी पिलाने में समर्थ किया, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में जल और यात्रा से जुड़े प्रसंग दिखाई देते हैं. नदियों के तटों को जल से भरना, रथ को विजय के लिए आगे बढ़ाना और गायों को पानी पिलाने में सहायता करना—इन कार्यों को अश्विनीकुमारों की शक्ति से जोड़ा गया है.

मंत्र 13

याभि: सूर्य परियाथ: परावति मन्धातार क्षैत्रपत्येष्वावतम्‌.
याभिविंप्रं प्र भरद्वाजमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌.

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से सूर्य को ग्रहण के अंधकार से मुक्त किया, मांधा की ऐश्वर्यपूर्ण क्षत्रियता की रक्षा की और भेवया को उसके शत्रु से बचाया, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ.

सरल व्याख्या

यहां सूर्य को ग्रहण के अंधकार से मुक्त करने का प्रसिद्ध प्रसंग आता है. इसके साथ मांधा और भेवया की रक्षा से जुड़े कार्यों का उल्लेख किया गया है.

मंत्र का मुख्य भाव संकट और अंधकार से मुक्ति तथा संरक्षण है.

मंत्र 14

याभिमहामतिथिग्वं कशोजुव॑ दिवोदासं शम्बरहत्य आवतम्‌.
याभि: पूर्भिद्ये त्रसदस्युमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गत

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से महान अतिथि सत्कार करने वाले और राक्षसों के भय से जल में छिपने को प्रस्तुत दिवोदास को शंबर असुर द्वारा मारे जाते समय बचाया था और संग्राम में निःसहाय ऋषि की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों को लेकर आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में दिवोदास और शंबर का प्रसंग आता है. संकट के समय दिवोदास की रक्षा करने और युद्ध में असहाय ऋषि की सहायता करने की बात कही गई है.

इससे अश्विनीकुमारों का युद्ध और संकट के समय सहायता करने वाला स्वरूप और स्पष्ट होता है.

मंत्र 15

याभिवरगम्नं विपिपानमुपस्तुतं कलिं याभिरवर्वित्तजानिं दुवस्यथ:,
याभिवर्यश्व॒मुत पृथिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से पीने में संलग्न और स्तुति किए गए वृषक की पत्नी प्राप्त करने वाले कलि की तथा अंधे पृथु की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में कलि और पृथु से जुड़े प्रसंग आते हैं. एक ओर पत्नी की प्राप्ति का उल्लेख है और दूसरी ओर अंधे पृथु की रक्षा का.

यहां भी अश्विनीकुमारों की सहायता अलग-अलग प्रकार की आवश्यकताओं से जुड़ी दिखाई देती है.

मंत्र 16

याभिननरा शयवे याभिरत्रये याभि: पुरा मनवे गातुमीषथु:.
याभि: शारीराजतं स्यूमरश्मये ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌

सरल हिंदी अर्थ

हे नेता रूप अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों द्वारा शर्याति, अग्नि और प्रथम मनु को दुःख से निकलने का मार्ग बताया था और सुमरश्मि की रक्षा के उद्देश्य से उसके शत्रुओं पर बाण चलाए थे, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में शर्याति, अग्नि और प्रथम मनु का उल्लेख है. अश्विनीकुमारों ने उन्हें कठिनाई से बाहर निकलने का मार्ग बताया था, ऐसा स्रोत के अर्थ में कहा गया है.

इसके साथ सुमरश्मि की रक्षा के लिए शत्रुओं के विरुद्ध किए गए कार्य का भी उल्लेख है.

मंत्र 17

याभि: पठर्वा जठरस्य मज्मनानिनिर्नादीदेच्चित इद्धो अज्मन्ना.
याभि: शर्यातमवथो महाधने ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌..

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों द्वारा पूर्वज ऋषि के शरीर को बल प्रदान करके संग्राम में उसी प्रकार दिवोदास को बल दिया था, उसी प्रकार युद्ध में मघवन के लिए शर्याति की रक्षा की थी, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में अश्विनीकुमारों द्वारा शरीर और युद्ध-शक्ति प्रदान करने के प्रसंग आते हैं. दिवोदास और शर्याति की रक्षा का उल्लेख भी किया गया है.

यहां अश्विनीकुमार केवल संकट से बचाने वाले ही नहीं, बल्कि कठिन समय में बल और सामर्थ्य देने वाले देवताओं के रूप में सामने आते हैं.

मंत्र 18

याभिरड़्लिरो मनसा निरण्यथो<ग्र॑ गच्छथो विवरे गोअर्णस:.
याभिम॑नुं शूरमिषा समावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गत

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से मनसा नामक ऋषि के लिए मनुष्य को खोजते हुए गो को प्राप्त कराया और उसे उसके पशुओं का स्वामी बनाया, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में पशुधन से जुड़ी सहायता का उल्लेख है. अश्विनीकुमारों ने मनसा नामक ऋषि के लिए गाय की प्राप्ति और पशुधन के स्वामित्व से जुड़ा उपकार किया था, ऐसा स्रोत में बताया गया है.

इससे सूक्त में धन और समृद्धि के साधन के रूप में पशुधन के महत्व का भी संकेत मिलता है.

मंत्र 19

याभि: पत्नीर्विमदाय न्यूहथुरा घ वा याभिररुणीरशिक्षतम्‌.
याभि: सुदास ऊहथु: सुदेव्यंश ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌.

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुमने जिन उपायों से विमद ऋषि के लिए पत्नी और लाल रंग की गायें दीं तथा सुदास को प्रसिद्ध बना दिया, उन्हीं उपायों के साथ यहां आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में विमद और सुदास का उल्लेख मिलता है. विमद के लिए पत्नी और लाल रंग की गायों की प्राप्ति तथा सुदास को प्रसिद्ध बनाने का प्रसंग अश्विनीकुमारों के उपकारों में गिना गया है.

मंत्र 20

याभि: शंताती भवथो ददाशुषे भुज्युं याभिरवथो याभिरघ्रिगुम्‌.
ओम्यावतीं सुभरामृतस्तुभं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌..

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुम दोनों ने जिन उपायों द्वारा विद्वान यजमान के लिए सुंदर स्तुति करने वाले ऋषि को सुखकर और भरपूर अन्न प्रदान किया था, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

यहां अश्विनीकुमारों से अन्न और सुख देने की प्रार्थना जुड़ी है. विद्वान यजमान और ऋषि के लिए पर्याप्त तथा सुखदायक अन्न प्रदान करने का उल्लेख उनके पुराने उपकार के रूप में किया गया है.

मंत्र 21

याभि: कृशानुमसने दुवस्यथो जवे याभिययूनो अर्वन्तमावतम्‌.
मधु प्रियं भरथो यत्सरड्भ्यस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुम दोनों ने जिन उपायों से कश्यप ऋषि के लिए मधुर और प्रिय अन्न प्रदान किया था, उन्हीं उपायों के साथ हमारे पास आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में कश्यप ऋषि के लिए अन्न की प्राप्ति का उल्लेख है. अन्न को मधुर और प्रिय बताया गया है.

यहां भी पुराने उपकार का स्मरण वर्तमान यज्ञ के लिए अश्विनीकुमारों को आमंत्रित करने का आधार बनता है.

मंत्र 22

याभिरनरं गोषुयुधं नृषाहो क्षेत्रस्य साता तनयस्य जिन्वथ:.
याभी रथाँ अवथो याभिरगव॑तस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌.

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुम दोनों ने जिन उपायों से युद्ध में काशु की रक्षा की, वृद्ध पुरुषों को युवा बनाया तथा मधुमक्खियों को मधु प्रदान किया, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

यह मंत्र कई अलग-अलग उपकारों को एक साथ रखता है. काशु की रक्षा, वृद्ध पुरुषों को फिर से युवा बनाना और मधुमक्खियों को मधु देना—इन प्रसंगों को अश्विनीकुमारों के कार्यों के रूप में याद किया गया है.

विशेष रूप से वृद्धों को युवा बनाने का प्रसंग अश्विनीकुमारों की पुनर्जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ी छवि को मजबूत करता है.

मंत्र 23

याभि: कुत्समार्जुनेयं शतक्रतू प्र तुर्वीतिं प्र च दभीतिमावतम्‌.
याभिथर्ध्वसन्तिं पुरुषन्तिमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम्‌.

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! तुम दोनों ने जिन उपायों द्वारा धन की प्राप्ति के लिए युद्ध करने वाले मनुष्यों की संग्राम में रक्षा की, क्षेत्र और धन की प्राप्ति में यजमान की सहायता की तथा उसके रथों और घोड़ों की रक्षा की, उन्हीं उपायों के साथ आओ.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में युद्ध, धन और कृषि या क्षेत्र से जुड़े हितों की रक्षा का उल्लेख है. अश्विनीकुमारों से संग्राम में मनुष्यों की रक्षा करने, यजमान को क्षेत्र और धन प्राप्त करने में सहायता देने तथा उसके रथ और घोड़ों की रक्षा करने की प्रार्थना की गई है.

यह सूक्त में बार-बार दिखाई देने वाले एक महत्वपूर्ण भाव को फिर सामने लाता है—संकट के समय सहायता और जीवन के आवश्यक साधनों की रक्षा.

मंत्र 24

अप्रस्वतीमश्चिना वाचमस्मे कृतं नो दस्रा वृषणा मनीषाम्‌.
अद्यूत्येअवसे नि ह्वये वां वृधे च नो भवतं वाजसा

सरल हिंदी अर्थ

हे कामवर्षी अश्विनीकुमारों! हमारी वाणी को विहित कर्म से युक्त और बुद्धि को देवज्ञान में समर्थ बनाओ. प्रकाशित रात्रि के अंतिम प्रहर में हम तुम्हें अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. हमारे अनुकूल समय में सहायता करने वाले बनो.

सरल व्याख्या

मंत्र 24 में प्रार्थना का स्वर थोड़ा बदलता है. अब ऋषि केवल पुराने उपकारों को याद नहीं करते, बल्कि अपनी वाणी और बुद्धि को योग्य बनाने की प्रार्थना भी करते हैं.

वे अश्विनीकुमारों को रात्रि के अंतिम प्रहर में अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं और चाहते हैं कि वे उचित समय पर उनकी सहायता करें.

मंत्र 25

द्युभिरक्तुभि: परि पातमस्मानरिष्टेभिरश्वचिना सौभगेभि:.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:.

सरल हिंदी अर्थ

हे अश्विनीकुमारों! हमें प्रतिदिन, रात-दिन और विनाशरहित शोभायमान समयों द्वारा सुरक्षित बनाओ. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश इस स्तुति का आदर करें.

सरल व्याख्या

सूक्त का अंतिम मंत्र सुरक्षा की व्यापक प्रार्थना के साथ समाप्त होता है. ऋषि चाहते हैं कि अश्विनीकुमार उन्हें दिन-रात और निरंतर आने वाले समय में सुरक्षित रखें.

इसके बाद मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है और उनसे इस स्तुति का आदर करने की कामना की गई है.


सूक्त 112 का सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 112 अश्विनीकुमारों के प्रति कृतज्ञता और सहायता की प्रार्थना का विस्तृत सूक्त है. इसमें ऋषि बार-बार उन पुराने कार्यों को याद करते हैं जिनके माध्यम से अश्विनीकुमारों ने अलग-अलग लोगों की सहायता की थी.

इस सूक्त को केवल एक सामान्य देव-स्तुति के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं होगा. इसके मंत्रों में अनेक छोटे-छोटे प्रसंग जुड़े हुए हैं. कहीं कोई व्यक्ति कुएं में फंस गया है, कहीं कोई समुद्र में संकट में है, कहीं कोई अंधा है, कहीं कोई वृद्ध है और कहीं किसी को धन, अन्न, पशुधन या युद्ध में सहायता की आवश्यकता है. इन सभी प्रसंगों में अश्विनीकुमार सहायता करने वाले देवताओं के रूप में सामने आते हैं.

सूक्त में रेभ, वंदन, वृषक, भुज्यु, कक्षीवान, ऋज्राश्व, वशिष्ठ, कुत्स, शर्याति, अत्रि, दिवोदास, विमद, सुदास और कश्यप जैसे अनेक नाम आते हैं. इनके माध्यम से अश्विनीकुमारों के अलग-अलग उपकारों का स्मरण किया गया है.

इन प्रसंगों में कुछ कार्य विशेष रूप से ध्यान खींचते हैं—कुएं में फंसे व्यक्ति को बाहर निकालना, समुद्र में डूबते व्यक्ति की रक्षा करना, अंधे को देखने योग्य बनाना, वृद्धों को युवा बनाना, गायों और पशुधन की रक्षा करना, जल उपलब्ध कराना तथा युद्ध में सहायता करना.

सूक्त के मध्य और अंतिम भाग में धन, अन्न, क्षेत्र, रथ, घोड़ों और युद्ध में विजय से जुड़ी प्रार्थनाएं भी आती हैं. इससे पता चलता है कि ऋषि अश्विनीकुमारों से केवल संकट के समय रक्षा ही नहीं, बल्कि समृद्ध और सुरक्षित जीवन के लिए आवश्यक साधनों की भी कामना करते हैं.

अंतिम दो मंत्रों में व्यक्तिगत और सामुदायिक कल्याण से आगे बढ़कर वाणी, बुद्धि और निरंतर सुरक्षा की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि उनकी वाणी उचित कर्म से जुड़ी हो, बुद्धि देवज्ञान में समर्थ बने और वे दिन-रात सुरक्षित रहें.

इस प्रकार सूक्त 112 का मूल भाव अश्विनीकुमारों के पुराने उपकारों का स्मरण करते हुए उनसे वर्तमान यज्ञ और जीवन में भी उसी प्रकार की सहायता, रक्षा, अन्न, धन, स्वास्थ्य, शक्ति और कल्याण की प्रार्थना करना है.

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