ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 70. अग्नि का सर्वव्यापी स्वरूप और यज्ञ में उनका महत्व
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का यह सूक्त अग्नि देव की महिमा का वर्णन करता है. यहां ऋषि अग्नि को केवल यज्ञ की अग्नि के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें ऐसा देव बताते हैं जो समस्त सृष्टि में विद्यमान हैं. वे देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु हैं, यज्ञ को सफल बनाने वाले हैं और अपने उपासकों का कल्याण करने वाले हैं.
इस सूक्त में अग्नि के ज्ञान, उनके सर्वव्यापी स्वरूप और यज्ञ में उनकी विशेष भूमिका का क्रमशः वर्णन किया गया है.
मंत्र 1-2
मंत्र
वनेम पूर्वीरर्यो मनीषा अग्नि: सुशोको विश्वान्यश्या:.
आ दैव्यानि व्रता चिकित्वाना मानुषस्य जनस्य ज
सरल अर्थ
बुद्धि से प्राप्त होने वाले, शोभायुक्त अग्नि देवों के व्रतों और मनुष्यों के जन्म से जुड़े कर्मों को भली-भांति जानते हैं. वे सभी कार्यों में व्याप्त होकर उनका ज्ञान रखते हैं.
व्याख्या
सूक्त के आरंभ में ऋषि अग्नि के ज्ञान की प्रशंसा करते हैं. वे बताते हैं कि अग्नि केवल प्रकाश देने वाले देव नहीं हैं, बल्कि देवताओं के नियमों और मनुष्यों के कर्मों को भी जानते हैं. इस प्रकार अग्नि को ऐसा साक्षी माना गया है जो सभी कार्यों में उपस्थित रहते हैं.
मंत्र 3-4
मंत्र
गर्भो यो अपां गर्भो वनानां गर्भश्न स्थातां गर्भश्वरथाम्.
अद्रौ चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां न विश्वो अमृत: स्वाधी:..
सरल अर्थ
अग्नि जल में, वनों में, स्थावर और जंगम सभी में स्थित हैं. वे प्रजाओं के मध्य निवास करते हैं. अमर और स्वाधीन अग्नि हमारी रक्षा करें और हमें शोभा प्रदान करें.
व्याख्या
इन मंत्रों में अग्नि की सर्वव्यापकता का वर्णन मिलता है. ऋषि बताते हैं कि अग्नि किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं. वे प्रकृति के विविध रूपों में विद्यमान हैं और सभी प्राणियों के बीच रहते हुए उनकी रक्षा करते हैं.
मंत्र 5-6
मंत्र
स हि क्षपावाँ अग्नी रयीणां दाशद्यो अस्मा अरं सूक्तै:.
एता चिकित्वो भूमा नि पाहि देवानां जन्म मर्ताश्व विद्वान्..
सरल अर्थ
जो यजमान मंत्रों द्वारा अग्नि की स्तुति करता है, अग्नि उसे धन प्रदान करते हैं. वे देवताओं और मनुष्यों के स्वरूप को जानते हुए गौ आदि धन की रक्षा करते हैं.
व्याख्या
यहां अग्नि को यजमान के हितैषी के रूप में स्मरण किया गया है. श्रद्धा से स्तुति करने वाले की वे रक्षा करते हैं और उसके धन तथा समृद्धि की देखभाल करते हैं. साथ ही वे देवताओं और मनुष्यों दोनों के विषय में जानने वाले बताए गए हैं.
मंत्र 7-8
मंत्र
वर्धान्यं पूर्वी: क्षपो विरूपा: स्थातुश्न रथमृतप्रवीतम्.
अराधि होता स्वशर्निषित्त: कृण्वन्विश्वान्यपांसि स
सरल अर्थ
उषा और रात्रि भिन्न स्वरूप वाली होते हुए भी अग्नि की वृद्धि करती हैं. स्थावर और जंगम सभी अग्नि का पोषण करते हैं. देवयज्ञ में स्थापित होकर अग्नि सभी यज्ञकर्मों को सफल बनाते हैं.
व्याख्या
ऋषि यहां बताते हैं कि दिन और रात का क्रम भी अग्नि की महिमा से जुड़ा हुआ है. सम्पूर्ण सृष्टि उनके कार्य में सहयोग करती है और यज्ञ में स्थापित होकर अग्नि प्रत्येक कर्म को पूर्णता तक पहुंचाते हैं.
मंत्र 9-10
मंत्र
गोषु प्रशस्तिं वनेषु धिषे भरन्त विश्वे बलिं स्वर्ण:.
वि त्वा नरः पुरुत्रा सपर्यन्पितुर्न जिव्रेविं वेदो भरन्त
सरल अर्थ
हे अग्नि. हमारे लिए गाय आदि पशुओं को प्रशंसनीय बनाओ. समस्त मनुष्य हमारे लिए धन प्राप्त करें. जैसे वृद्ध पिता से पुत्र धन प्राप्त करता है, वैसे ही यजमान अनेक देवस्थानों में श्रद्धा के साथ तुम्हारी सेवा करते हैं.
व्याख्या
इन मंत्रों में यजमान अग्नि से अपनी समृद्धि की कामना करता है. वह प्रार्थना करता है कि पशुधन और धन-संपत्ति की वृद्धि हो. साथ ही यह भी बताया गया है कि श्रद्धा से अग्नि की उपासना करने वाले यजमान निरंतर उनकी सेवा में लगे रहते हैं.
मंत्र 11
मंत्र
साधुर्न गृध्नुरस्तेव शूरो यातेव भीमस्त्वेष: समत्सु
सरल अर्थ
अग्नि साधक के समान समस्त हव्य स्वीकार करते हैं. वे धनुषधारी शूरवीर के समान पराक्रमी हैं और संघर्ष के समय सहायता करने वाले हैं.
व्याख्या
सूक्त का अंतिम मंत्र अग्नि के वीर और रक्षक स्वरूप का स्मरण कराता है. वे यज्ञ में अर्पित हव्य को स्वीकार करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर वीर योद्धा के समान अपने उपासकों की सहायता करते हैं.
सूक्त का सार
इस सूक्त में अग्नि को सर्वज्ञ, सर्वव्यापी और यज्ञ के प्रधान देव के रूप में प्रस्तुत किया गया है. वे जल, वन, स्थावर और जंगम सभी में विद्यमान हैं. श्रद्धापूर्वक यज्ञ करने वाले यजमान का कल्याण करते हैं, उसके धन की रक्षा करते हैं और यज्ञ को सफल बनाते हैं. साथ ही अग्नि के रक्षक, वीर और हितकारी स्वरूप का भी सुंदर वर्णन इस सूक्त में मिलता है. यह सारांश PDF में दिए गए अर्थों पर आधारित है.