ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 121. इंद्र की स्तुति और उनके वीर कार्य
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 121 इंद्र देव को समर्पित है. इस सूक्त में इंद्र की स्तुति करते हुए उनके अनेक वीर कार्यों का वर्णन किया गया है. साथ ही उनसे शत्रुओं से रक्षा, धन, अन्न, पशुधन और कल्याण प्रदान करने की प्रार्थना की गई है.
इस सूक्त में इंद्र के लिए सोमरस, यज्ञ और स्तुति का उल्लेख मिलता है. इंद्र द्वारा वर्षा कराने, गायों को मुक्त कराने, शत्रुओं का नाश करने, वृत्र जैसे विरोधी का वध करने तथा अपने भक्तों और यजमानों की सहायता करने के प्रसंग आते हैं.
मंत्र 1. इंद्र की स्तुति और आह्वान
न: पात्र देवयतां श्रवद्गिरो अड्डिरसां तुरण्यन्, प्र विश आ हर्म्यस्योरु क्रंसते अध्वरे यज
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. देवताओं की श्रद्धा से स्तुति करने वाले हम आपको पुकारते हैं. आप हमारे यज्ञ में आएं और हमारे द्वारा अर्पित सोमरस को स्वीकार करें. आप स्तुति करने वालों के लिए महान और सहायक हैं.
सरल व्याख्या
सूक्त के आरंभ में इंद्र का आह्वान किया गया है. स्तोता श्रद्धा के साथ उनकी स्तुति करता है और उन्हें यज्ञ में आने तथा सोमरस स्वीकार करने के लिए बुलाता है.
इंद्र को यहां ऐसे देवता के रूप में संबोधित किया गया है जिनकी कृपा और सहायता की कामना स्तोता करता है.
मंत्र 2. इंद्र का यज्ञ में आगमन
स्तम्भीद्ध द्यां स धरुणं प्रुषायद्भुर्वाजाय द्रविणं नरो गोः.
अनु स्वजां महिषकश्षक्षत व्रां मेनामश्वस्य परि मातरं गो:..
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आप अपने भक्त अंगिरा की स्तुति कब सुनेंगे? जब आप यजमान के ऋत्विजों को सामने देखते हैं, तब यज्ञ में स्वयं आते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के यज्ञ में आने का वर्णन है. स्तोता उनसे अपनी स्तुति सुनने की प्रार्थना करता है.
इंद्र को यज्ञ और स्तुति से जुड़े देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
मंत्र 3. इंद्र की व्यापक शक्ति
नक्षद्धवमरुणी: पूर्व्य राट् तुरो विशामड्रिरसामनु द्यून.
तक्षद्वजं नियुतं तस्तम्भद् दां चतुष्पदे नर्याय द्विपा
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आपने विशाल पृथ्वी और आकाश को धारण किया है. आपने असुरों द्वारा चुराई गई गायों को बाहर निकाला और अपने महान सामर्थ्य से प्राणियों द्वारा किए गए स्तवन को स्वीकार किया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र की महान शक्ति का वर्णन मिलता है. स्रोत में बताया गया है कि इंद्र ने आकाश को धारण किया और असुरों द्वारा चुराई गई गायों को मुक्त कराया.
इस प्रकार इंद्र के कार्यों में गौ रक्षा और शत्रुओं से संघर्ष का विशेष स्थान दिखाई देता है.
मंत्र 4. इंद्र का वज्र और शत्रुओं का विनाश
अस्य मदे स्वर्य दा ऋतायापीवृतमुस्रियाणामनीकम्.
यद्ध प्रसर्गे त्रिककुम्निवर्तदप ट्रहो मानुषस्य दुरो व:.
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आपने शत्रुओं पर प्रहार करने के लिए अपना वज्र उठाया. आपने अपने शत्रुओं का सामना किया और उनके विरुद्ध अपने महान अस्त्र का प्रयोग किया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के वज्र का उल्लेख मिलता है. इंद्र को शत्रुओं के विरुद्ध युद्ध करने वाले और अपने वज्र द्वारा उनका सामना करने वाले देवता के रूप में वर्णित किया गया है.
इंद्र का वज्र उनके प्रमुख वीर कार्यों और शक्ति का प्रतीक बनकर सामने आता है.
मंत्र 5. इंद्र द्वारा उषा को प्रकाशित करना
तुभ्यं पयो यत्पितरावनीतां राध: सुरेतस्तुरणे भुरण्यू.
शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दघाया: पय उस्रियाया:
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. अरुण वर्ण की उषा को प्रकाशित करने वाले और प्राचीन ऋषियों द्वारा निर्मित स्तोत्र को सुनने वाले आप हैं. आप अंगिरावंशी ऋषियों को धन देते हैं, वज्र को तीखा करते हैं और मनुष्यों के हित के लिए आकाश को धारण करते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के कई कार्य एक साथ बताए गए हैं. वे उषा को प्रकाशित करते हैं, ऋषियों की स्तुति सुनते हैं और अंगिरावंशी ऋषियों को धन देते हैं.
इसके साथ उनके वज्र को तीखा करने और आकाश को धारण करने का भी वर्णन मिलता है.
मंत्र 6. इंद्र का रथ और वर्षा
अध प्र जज्ञे तरणिम॑मत्तु प्र रोच्यस्या उषसो न सूर:.
इन्दुर्येभिराष्ट स्वेदुहव्यै: खुवेण सिउचड्जरणाभि धा
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आपने अपने रथ से शत्रुओं का सामना किया. आपके द्वारा किए गए कार्यों से आकाश और पृथ्वी के बीच वर्षा का संबंध स्थापित हुआ. आप अपने सामर्थ्य से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के रथ और उनके युद्ध संबंधी कार्यों का उल्लेख है. वर्षा और आकाश से संबंधित उनका स्वरूप भी सामने आता है.
इंद्र की शक्ति यहां युद्ध और वर्षा दोनों से जुड़ी दिखाई देती है.
मंत्र 7. सूर्य के समान प्रकाशित इंद्र
स्विध्मा यद्वनधितिरपस्यात्सूरो अध्वरे परि रोधना गो:ः.
यद्ध प्रभासि कृत्व्याँ अनु द्यूननर्विशे पश्चिषे तुरा
सरल हिंदी अर्थ
उषा के समीप सूर्य के समान चमकते हुए इंद्र प्रकट होते हैं. वे स्तोता को प्रसन्न करते हैं और सोमरस को यज्ञशाला में स्वीकार करते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के तेजस्वी स्वरूप का वर्णन है. उनके प्रकट होने की तुलना सूर्य के प्रकाश से की गई है.
सोमरस और यज्ञ का संबंध भी इस मंत्र में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
मंत्र 8. सोमरस से प्रसन्न इंद्र
अष्टा महो दिव आदो हरी इह द्युम्नासाहमभि योधान उत्सम्.
हरिं यत्ते मन्दिन॑ दुक्षन्वृधे गोरभसमद्रिभिवववताप्य
सरल हिंदी अर्थ
जब ऋत्विज तुम्हारे लिए मनोहर, मादक और उपयोग योग्य सोमरस को पत्थरों की सहायता से निचोड़ते हैं, तब तुम अपने हव्यदाता और सोमरस अर्पित करने वाले दोनों घोड़ों को इस यज्ञ में सोम पिलाते हो और हमारे धन का अपहरण करने वाले शत्रुओं को रोकते हो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में सोमरस तैयार करने की वैदिक यज्ञ प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है. ऋत्विज सोमरस को निचोड़कर इंद्र को अर्पित करते हैं.
इंद्र उस यज्ञ से प्रसन्न होकर यजमान के धन की रक्षा करते हैं और शत्रुओं को रोकते हैं.
मंत्र 9. शत्रुओं के विरुद्ध इंद्र का वज्र
त्वमायसं प्रति वर्तयो गोर्दिवो अश्मानमुपनीतमभ्वा.
कुत्साय यत्र पुरुहृत वन्वञ्छुष्णमनन्तै: परियासि वधै:
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आपने शत्रुओं की ओर शीघ्र जाने वाले अपने लोहमय वज्र को शुष्क असुर की ओर फेंका. उस समय आपने ऋषि के कल्याण के लिए अपने अनेक प्रकार के हनन साधनों से उस शत्रु को नष्ट किया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के वज्र द्वारा शत्रु पर किए गए प्रहार का वर्णन है. इंद्र अपने अस्त्र के द्वारा असुर का विनाश करते हैं.
यहां उनका स्वरूप शत्रु-विनाशक और अपने भक्त या ऋषि की रक्षा करने वाले देवता के रूप में सामने आता है.
मंत्र 10. इंद्र द्वारा शत्रु का विनाश
पुरा यत्सूरस्तमसो अपीतेस्तमद्रिव: फलिगं हेतिमस्य.
शुष्णस्य चित्परिहितं यदोजो दिवस्परि सुग्रथितं तदाद
सरल हिंदी अर्थ
हे वज्रधारी इंद्र. प्राचीन समय में जब आपका सूर्य के साथ संग्राम हुआ, उस समय आपने मेघ का विनाश किया. आपने सूर्य को ढकने वाली और सूर्य से संबंधित शुष्क शक्ति को भी समाप्त कर दिया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के एक प्राचीन वीर कार्य का स्मरण किया गया है. इसमें संग्राम, मेघ और सूर्य से संबंधित प्रसंग आता है.
इंद्र को यहां वज्रधारी और शत्रु या बाधा का विनाश करने वाले देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
मंत्र 11. इंद्र की व्यापक शक्ति
अनु त्वा मही पाजसी अचक्रे द्यावाक्षामा मदतामिन्द्र कर्मन्.
त्वं वृत्रमाशयानं सिरासु महो वज्नेण सिष्वपो वराहुम्
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आप विशाल शक्ति वाले हैं और समस्त पृथ्वी तथा आकाश में व्याप्त हैं. आपने वृत्र को पराजित किया और उसके द्वारा रोकी गई शक्तियों को मुक्त किया. आपने अपने महान बल से असुर को नष्ट किया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र की विशाल शक्ति और उनके द्वारा किए गए वीर कार्य का उल्लेख है. वृत्र से संबंधित प्रसंग में इंद्र के शत्रु-विनाशक स्वरूप को सामने रखा गया है.
इंद्र को पृथ्वी और आकाश में व्यापक शक्ति रखने वाला बताया गया है.
मंत्र 12. इंद्र द्वारा शत्रुओं से रक्षा
त्वमिन्द्र नर्यो याँ अवो नृन्तिष्ठा वातस्य सुयुजो वहिष्ठान्.
यं ते काव्य उशना मन्दिनं दादवत्रहणं पार्य ततक्ष वज्म्.
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आप हमारे हितकारी हैं. जिन अश्वों की रक्षा आप करते हैं, उन तेज गति वाले अश्वों को हमारे रथ में जोड़ें. कवि और उशना द्वारा प्रदान किए गए मदकर वज्र को आपने वृषभ के समान बलवान और शत्रुओं का नाश करने वाला बनाया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के अश्वों और रथ का उल्लेख मिलता है. स्तोता उनसे अपने रथ और कार्य के लिए सहायता की प्रार्थना करता है.
साथ ही उशना से संबंधित वज्र का उल्लेख करते हुए इंद्र की युद्ध शक्ति का वर्णन किया गया है.
मंत्र 13. इंद्र और सूर्य रूप
त्वं सूरो हरितो रामयो नृन्भरच्चक्रमेतशो नायमिन्द्र.
प्रास्य पारं नवतिं नाव्यानामपि कर्तमवर्तयो5यज्यू
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. आप सूर्य के रूप में अपने हरि नामक घोड़ों को रोकें. एतश नामक घोड़ा आपके रथ का पहिया आगे ले जाता है. आप नदियों को पार करके यज्ञ करने वाले असुरों के पास पहुंचे और उन्हें उनके कार्य में लगाया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के हरि नामक घोड़ों और उनके रथ का वर्णन मिलता है. एतश नामक घोड़े का भी उल्लेख है.
मंत्र में इंद्र के नदियों को पार करने और असुरों तक पहुंचने का प्रसंग आता है.
मंत्र 14. इंद्र से रक्षा और धन की प्रार्थना
त्वं नो अस्या इन्द्र दुर्हणाया: पाहि वज्िवो दुरितादभीके.
प्र नो वाजात्रथ्यो३ अश्वबुध्यानिषे यन्धि श्रवसे सूनृतायै
सरल हिंदी अर्थ
हे वज्रधारण करने वाले इंद्र. इस शक्तिशाली दरिद्रता से हमारी रक्षा करो. समीपवर्ती संग्राम में हमें पाप से बचाओ. हमें कीर्ति, सत्यभाषण के लिए रथ और पर्याप्त धन प्रदान करो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में स्तोता इंद्र से सीधे सहायता मांगता है. वह दरिद्रता, पाप और संकट से रक्षा की प्रार्थना करता है.
इसके साथ कीर्ति, सत्यभाषण के लिए रथ और पर्याप्त धन की कामना की गई है.
मंत्र 15. इंद्र से समृद्धि और वंश की कामना
मा सा ते अस्मत्सुमतिर्वि दसद्वाजप्रमह: समिषो वरन्त.
आ नो भज मघवन्गोष्वर्यो मंहिष्ठास्ते सधमाद: स्याम..
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. हम आपके अनुग्रह से अलग न हों. हे महान देव. हमें धन के स्वामी बनाओ. हमारी स्तुति स्वीकार करो और हमें गायों, पुत्रों, पौत्रों तथा समृद्धि के साथ आनंदित करो.
सरल व्याख्या
अंतिम मंत्र में इंद्र से उनके अनुग्रह में बने रहने की प्रार्थना की गई है. स्तोता धन, गायों और वंश की वृद्धि की कामना करता है.
सूक्त 121 का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 121 इंद्र की स्तुति और उनके वीर कार्यों का वर्णन करता है.
सूक्त के आरंभ में इंद्र को यज्ञ में आने और सोमरस स्वीकार करने के लिए बुलाया गया है. स्तोता उनके महत्व और सामर्थ्य को स्वीकार करते हुए उनकी सहायता की कामना करता है.
इंद्र को विशाल पृथ्वी और आकाश को धारण करने वाला, असुरों से गायों को मुक्त कराने वाला और वज्र धारण करके शत्रुओं का सामना करने वाला बताया गया है.
सूक्त के मध्य भाग में इंद्र के कई पुराने वीर कार्यों का स्मरण मिलता है. वे उषा को प्रकाशित करते हैं, ऋषियों को धन देते हैं, शत्रुओं का विनाश करते हैं और अपने यजमानों की रक्षा करते हैं.
वृत्र से संबंधित प्रसंग भी सूक्त में आता है. इसके अतिरिक्त इंद्र के वज्र, रथ, हरि नामक घोड़ों और उनके युद्ध संबंधी कार्यों का वर्णन किया गया है.
अंतिम मंत्रों में स्तोता इंद्र से दरिद्रता और पाप से रक्षा, कीर्ति, धन, गाय, पुत्र और पौत्र प्रदान करने की प्रार्थना करता है.