ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 101. इंद्र से विजय और अन्न की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 101 इंद्र देव को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि इंद्र की स्तुति करते हुए उनसे शत्रुओं पर विजय, अन्न की प्राप्ति, धन और सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं. कई मंत्रों में इंद्र के साथ मरुद्गणों का भी आह्वान किया गया है.
इस सूक्त में इंद्र को महान, बलशाली और शत्रुओं का नाश करने वाले रूप में स्मरण किया गया है. ऋषि उनसे अपने स्तोत्र को स्वीकार करने, यज्ञ में आने और यजमानों की रक्षा करने का निवेदन करते हैं. सूक्त में इंद्र के रथ, उनके अश्वों और उनके युद्ध संबंधी स्वरूप का भी वर्णन मिलता है.
सूक्त 101 के देवता
देवता. इंद्र
मंत्र 1
मंत्र
प्र मन्दिने पितुमदर्चता वचो यः कृष्णगर्भा निरहन्नृजिश्वना.
अवस्यवो वृषणं वज्रदक्षिणं मरुत्वन्तं सख्याय हवाम
सरल हिंदी अर्थ
हे ऋत्विजो. जिन इंद्र ने राजा ऋजिश्वा की मित्रता के कारण कृष्ण असुर की गर्भिणी पत्नियों को मारा था, उन्हीं स्तुति के योग्य इंद्र के उद्देश्य से हवि रूप अन्न के साथ स्तुति वचन बोलो. वे कामनाओं को पूरा करने वाले और दाएं हाथ में वज्र धारण करने वाले हैं. रक्षा की इच्छा रखने वाले हम उन्हीं इंद्र को मरुतों सहित अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं.
सरल व्याख्या
सूक्त की शुरुआत इंद्र के एक युद्ध संबंधी कार्य के उल्लेख से होती है. स्रोत में कहा गया है कि इंद्र ने राजा ऋजिश्वा की मित्रता के कारण कृष्ण असुर की गर्भिणी पत्नियों का वध किया था. इसके बाद ऋषि इंद्र को स्तुति के लिए बुलाते हैं.
इंद्र को यहां वज्र धारण करने वाले और कामनाओं को पूरा करने वाले बताया गया है. साथ ही मरुद्गणों के साथ उन्हें अपना मित्र बनाने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 2
मंत्र
यो व्यंसं जाह्ृषाणेन मन्युना यः शम्बरं यो अहन्पिप्रुमव्रतम्.
इन्द्रो यः शुष्णमशुषं न््यावृणड्मरुत्वन्तं सख्याय हवाम
सरल हिंदी अर्थ
जिन इंद्र ने अत्यंत क्रोध के कारण बिना बांधों वाले वृत्र असुर का वध किया, जिन्होंने शंबर, यज्ञ न करने वाले पिप्रु एवं विश्वशोषक शुष्ण का नाश किया, हम उन्हीं इंद्र को मरुतों के साथ अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के द्वारा विभिन्न शत्रुओं के वध का वर्णन किया गया है. स्रोत में वृत्र, शंबर, पिप्रु और शुष्ण का उल्लेख आता है. इन शत्रुओं के नाश के बाद भी मंत्र का मुख्य भाव वही रहता है. ऋषि इंद्र को मरुद्गणों के साथ अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं.
मंत्र 3
मंत्र
यस्य द्यावापथिवी पौंस्यं महद्यस्य व्रते वरुणो यस्य सूर्य:.
यस्येन्द्रस्य सिन्धव: सश्नति व्रतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे..
सरल हिंदी अर्थ
हम मित्र बनाने के लिए इंद्र को मरुतों के साथ बुलाते हैं. द्युलोक और पृथ्वीलोक जिन इंद्र के महान पराक्रम को देखते हैं, सूर्य और चंद्रमा जिनके पराक्रम को देखते हैं तथा नदियां जिनके नियम का पालन करती हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के पराक्रम को बहुत व्यापक रूप में बताया गया है. पृथ्वी और आकाश, सूर्य और चंद्रमा तथा नदियों का उल्लेख करते हुए उनके सामर्थ्य का वर्णन किया गया है.
ऋषि फिर इंद्र को मरुद्गणों के साथ अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं.
मंत्र 4
मंत्र
यो अश्वानां यो गवां गोपतिर्वशी य आरित: कर्मणिकर्मणि स्थिर: .
वीन्गेश्िदिन्द्रो यो असुन्वतो वधो मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे
सरल हिंदी अर्थ
जो चलने वाले एवं सांस लेने वाले प्राणियों के स्वामी हैं, जिन्होंने पणि द्वारा अपहृत गायों का सभी देवों से पहले ब्राह्मणों के निमित्त उद्धार किया था और जिन्होंने असुरों को निकृष्ट बनाकर मारा था, हम उन्हीं इंद्र को अपना सखा बनाने के लिए मरुतों के साथ बुलाते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र को अश्वों और गायों के स्वामी के रूप में बताया गया है. स्रोत के अनुसार उन्होंने पणि द्वारा अपहृत गायों को देवताओं से पहले ब्राह्मणों के लिए वापस प्राप्त किया था. साथ ही असुरों को पराजित करने का उल्लेख भी मिलता है.
इंद्र के इस स्वरूप को स्मरण करते हुए ऋषि उन्हें मरुद्गणों के साथ अपना सखा बनाने के लिए बुलाते हैं.
मंत्र 5
मंत्र
यो विश्वस्य जगत: प्राणतस्पतिर्यों ब्रह्मणे प्रथमो गा अविन्न्दत्.
इन्द्रो यो दस्यूँरधराँ अवातिरन्मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे
सरल हिंदी अर्थ
जो शूरों और कायों द्वारा बुलाने योग्य हैं, युद्ध में हारकर भागने वाले एवं विजयी दोनों ही जिन्हें बुलाते हैं और सभी प्राणी जिन्हें अपने-अपने कार्यों में आगे रखते हैं, उन्हीं इंद्र को हम अपना मित्र बनाने के लिए मरुतों के साथ बुलाते हैं.
सरल व्याख्या
यहां इंद्र को ऐसे देवता के रूप में स्मरण किया गया है जिन्हें युद्ध में विजय पाने वाले और पराजित होकर भागने वाले दोनों ही पुकारते हैं. सभी प्राणी अपने-अपने कार्यों में उन्हें आगे रखते हैं.
मंत्र का अंत फिर इंद्र को मरुद्गणों के साथ अपना मित्र बनाने के आह्वान से होता है.
मंत्र 6
मंत्र
यः शूरेभिह्॒व्यो यश्व भीरुभियों धावद्धि्ूयते यश्व जिग्युभि:,
इन्द्र यं विश्वा भुवनाभि संदधुर्मरुत्वन्तं सख्याय हवाम
सरल हिंदी अर्थ
प्रकाशमान इंद्र सभी प्राणियों में प्राणरूप से वर्तमान रुद्रपुत्र मरुतों को मनुष्यों के लिए प्रदान करते हुए आकाश में उदित होते हैं और उन्हीं मरुतों के साथ प्राणियों में मध्यमा वाणी का विस्तार करते हैं. स्तुति रूपी वाणी उन्हीं इंद्र की पूजा करती है. उन्हें हम मरुतों के साथ अपना मित्र बनाने के लिए बुलाते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र और मरुद्गणों के संबंध का वर्णन किया गया है. स्रोत में मरुतों को प्राणरूप में वर्तमान बताया गया है और इंद्र के आकाश में उदित होने का उल्लेख है.
इसके साथ स्तुति रूपी वाणी द्वारा इंद्र की पूजा करने और उन्हें मरुद्गणों के साथ मित्र बनाने के लिए बुलाने की बात कही गई है.
मंत्र 7
मंत्र
रुद्राणामेति प्रदिशा विचक्षणो रुद्रेभियोषा तनुते पृथु ज्य:.
इन्द्र मनीषा अभ्यर्चति श्रुतं मरुत्वन्तं सख्याय हवामहे..
सरल हिंदी अर्थ
हे मरुतों सहित इंद्र. तुम उत्तम घर अथवा नवीन स्थान में प्रसन्न रहते हो, तुम हमारे यज्ञ में आओ. हे सत्यधन. तुम्हारी कामना से हम हवि देते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र को मरुद्गणों के साथ यज्ञ में आने का निमंत्रण दिया गया है. ऋषि कहते हैं कि वे इंद्र की कामना से हवि देते हैं. इसलिए उनसे यज्ञ में आने और प्रसन्न होने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 8
मंत्र
यद्वा मरुत्व: परमे सधस्थे यद्वावमे वृजने मादयासे.
अत आ याहाध्वरं नो अच्छा त्वाया हविश्वकृमा सत्यराध:..
सरल हिंदी अर्थ
हे शोभन बल वाले इंद्र. हम तुम्हारी कामना से सोमरस निचोड़ते हैं. हे स्तुति द्वारा बुलाने योग्य इंद्र. हम तुम्हारी कामना से हवि देते हैं. हे अश्वों के स्वामी. तुम मरुतों के साथ गणरूप में वर्तमान यज्ञ में बैठे हुए कुशों पर तृप्त बनो.
सरल व्याख्या
यहां यज्ञ में सोमरस और हवि देने का वर्णन है. ऋषि स्पष्ट रूप से कहते हैं कि यह सब इंद्र की कामना से किया जा रहा है. उनसे मरुद्गणों के साथ यज्ञ में उपस्थित होकर तृप्त होने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 9
मंत्र
त्वायेन्द्र सोम॑ सुषुमा सुदक्ष त्वाया हविश्वकृमा ब्रह्मवाह:.
अधा नियुत्व: सगणो मरुद्धिरस्मिन्यज्ञे बर्हिषि मादयस्व.
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. अपने घोड़ों के साथ प्रसन्न बनो. सोमपान के निमित्त अपने जबड़ों, जिह्वा एवं उपजिह्वा को खोलो. हे सुंदर ठोड़ी वाले इंद्र. घोड़े तुम्हें यहां लाएं. तुम हमारी कामना करते हुए हमारा हवि ग्रहण करो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र को उनके अश्वों के साथ यज्ञ में आने का आह्वान किया गया है. ऋषि उनसे सोमपान के लिए तैयार होने और यजमान द्वारा दी गई हवि स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 10
मंत्र
मादयस्व हरिभिरयये त इन्द्र वि ष्यस्व शिप्रे वि सृजस्व धेने.
आ त्वा सुशिप्र हरयो वहन्तूशन्हव्यानि प्रति नो जुषस्व.
सरल हिंदी अर्थ
मरुतों के साथ स्तुति किए जाने वाले एवं शत्रुहंता इंद्र के द्वारा सुरक्षित हम उनसे अन्न प्राप्त करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश उस अन्न की पूजा करें.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र के द्वारा सुरक्षित रहने और उनसे अन्न प्राप्त करने की प्रार्थना की गई है. इंद्र का संबंध यहां मरुद्गणों के साथ बताया गया है. मंत्र के अंत में मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है.
मंत्र 11
मंत्र
मरुत्स्तोत्रस्य वृजनस्य गोपा वयमिन्द्रेण सनुयाम वाजम्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:..
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. तुम्हारे महान उद्देश्य से मैं यह बड़ी स्तुति कर रहा हूं, क्योंकि तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि मेरे स्तोत्र पर ही आधारित है. ऋत्विजों ने अभिवृद्धि एवं धन पाने के लिए शत्रु पराक्रम वाली इंद्र की स्तुतियों द्वारा प्रसन्न किया है. देवता तुम्हारे बल से प्रसन्न हों.
सरल व्याख्या
सूक्त के अंतिम मंत्र में ऋषि इंद्र के लिए की जा रही अपनी बड़ी स्तुति का उल्लेख करते हैं. वे बताते हैं कि उनकी स्तुति इंद्र की कृपा और अनुग्रह पर आधारित है.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 101 इंद्र की स्तुति और उनके आह्वान का सूक्त है. इसमें इंद्र को शक्तिशाली, शत्रुओं का नाश करने वाले, वज्रधारी और यजमानों की सहायता करने वाले रूप में स्मरण किया गया है. लगभग पूरे सूक्त में इंद्र के साथ मरुद्गणों को भी बुलाने की बात आती है.
सूक्त के आरंभिक मंत्रों में इंद्र द्वारा कृष्ण, वृत्र, शंबर, पिप्रु और शुष्ण जैसे शत्रुओं के वध का वर्णन किया गया है. आगे इंद्र के पराक्रम को पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा और नदियों से संबंधित रूप में बताया गया है.
मध्य के मंत्रों में इंद्र को गायों के स्वामी, अपहृत गायों को वापस प्राप्त कराने वाले और युद्ध में विजय दिलाने वाले रूप में स्मरण किया गया है. इसके बाद इंद्र को मरुद्गणों के साथ यज्ञ में आने और सोम तथा हवि स्वीकार करने का निमंत्रण दिया गया है.
अंतिम मंत्रों में इंद्र के अश्वों का उल्लेख आता है और उनसे अन्न की प्राप्ति की प्रार्थना की जाती है. अंतिम मंत्र में ऋषि इंद्र की स्तुति करते हुए अभिवृद्धि और धन की कामना करते हैं.