ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 34. अश्विनीकुमारों का आह्वान और उनकी कृपा की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 34 अश्विनीकुमारों को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि बार-बार अश्विनीकुमारों का आह्वान करते हैं और उनसे यज्ञ में आने, हवि स्वीकार करने तथा यजमान को धन, अन्न और कल्याण प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं. अनेक मंत्रों में उन्हें दिन में तीन बार आने का निमंत्रण दिया गया है.
तीन बार आने का आह्वान
सूक्त के प्रारंभिक मंत्रों में अश्विनीकुमारों से प्रार्थना की गई है कि वे दिन में तीन बार यज्ञ में आएं.
ऋषि कहते हैं कि जैसे वे अन्य यजमानों के पास जाते हैं, उसी प्रकार उनके यज्ञ में भी तीन बार पधारें. इस प्रकार बार-बार उनके आगमन की कामना इस सूक्त का प्रमुख विषय है.
यज्ञ और हवि स्वीकार करने की प्रार्थना
अनेक मंत्रों में अश्विनीकुमारों को यज्ञ में आमंत्रित किया गया है.
ऋषि चाहते हैं कि वे यज्ञ में उपस्थित होकर अर्पित हवि को स्वीकार करें. उनसे कहा गया है कि वे यजमान की प्रार्थनाएं सुनें और उसके यज्ञ को सफल बनाएं.
धन और अन्न की कामना
सूक्त में कई स्थानों पर धन और अन्न की प्राप्ति की कामना की गई है.
ऋषि अश्विनीकुमारों से निवेदन करते हैं कि वे यजमान को समृद्ध बनाएं और उसके लिए आवश्यक साधन प्रदान करें. वे उनसे पोषण और कल्याण की अपेक्षा रखते हैं.
औषधियों का उल्लेख
मंत्रों में औषधियों का भी उल्लेख मिलता है.
ऋषि अश्विनीकुमारों से प्रार्थना करते हैं कि वे स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष में स्थित औषधियों सहित यज्ञ में आएं. इससे उनके साथ औषधियों का संबंध भी दिखाई देता है.
रथ का वर्णन
सूक्त में अश्विनीकुमारों के रथ का अनेक बार उल्लेख किया गया है.
कहा गया है कि उनका रथ विभिन्न दिशाओं में जाता है और यजमान के पास पहुंचता है. ऋषि चाहते हैं कि वे अपने रथ द्वारा शीघ्र उनके यज्ञ में उपस्थित हों.
जल और नदियों का उल्लेख
आगे के मंत्रों में जल, नदियों और समुद्र का भी उल्लेख मिलता है.
ऋषि अश्विनीकुमारों से कहते हैं कि वे जहां कहीं भी हों, वहां से उनके यज्ञ में आएं. चाहे वे जल के समीप हों या अन्य किसी स्थान पर, वे यजमान की पुकार सुनें.
रक्षा की प्रार्थना
सूक्त में अश्विनीकुमारों से रक्षा की कामना भी की गई है.
ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे शत्रुओं और बाधाओं को दूर करें तथा यजमान को सुरक्षित रखें. वे चाहते हैं कि उनकी कृपा से जीवन में आने वाली कठिनाइयों का निवारण हो.
पर्वतों और दूरस्थ स्थानों से आने का निमंत्रण
मंत्रों में पर्वतों और दूरस्थ प्रदेशों का उल्लेख मिलता है.
ऋषि कहते हैं कि अश्विनीकुमार जहां कहीं भी हों, वहां से उनके यज्ञ में आएं. वे उन्हें दूर स्थानों से भी आमंत्रित करते हैं और उनकी उपस्थिति की कामना करते हैं.
यजमान की प्रार्थना
सूक्त के अंतिम मंत्रों में यजमान अपनी कामनाएं व्यक्त करता है.
वह अश्विनीकुमारों से धन, अन्न, सुरक्षा और कल्याण की प्रार्थना करता है. साथ ही उनसे आग्रह करता है कि वे उसके यज्ञ को स्वीकार करें और उस पर प्रसन्न हों.
पूरे सूक्त में अश्विनीकुमारों का बार-बार आह्वान, उनके रथ का वर्णन, यज्ञ में आने का निमंत्रण तथा धन, अन्न और रक्षा की प्रार्थना प्रमुख रूप से दिखाई देती है.