ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 120. अश्विनीकुमारों की स्तुति और रक्षा की प्रार्थना
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 120 अश्विनीकुमारों को समर्पित है. इस सूक्त में अश्विनीकुमारों से स्तोता के पास आने, उनकी स्तुति स्वीकार करने, धन और अन्न प्रदान करने तथा संकट से रक्षा करने की प्रार्थना की गई है.
सूक्त के आरंभ में अश्विनीकुमारों के रथ का वर्णन आता है. उनके रथ को तीव्र गति वाला, धन से युक्त और यज्ञ में बुलाने योग्य बताया गया है. स्तोता उनसे अपने पास आने और उनकी कृपा प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त करता है.
इसके बाद विभिन्न मंत्रों में अश्विनीकुमारों की स्तुति, उनके पुराने कार्यों और उनके द्वारा स्तोता तथा अन्य लोगों की सहायता किए जाने का उल्लेख मिलता है. अंधे ऋषि, रेम, वर्तिका, पेदु, भुज्यु, दधीचि और अन्य प्रसंग इस सूक्त में आते हैं.
मंत्र 1. अश्विनीकुमारों के रथ का आह्वान
मंत्र
का राधद्धोत्राश्विना वां को वां जोष उभयो:. कथा विधात्यप्रचेता:..
सरल हिंदी अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. कौन सी स्तुति तुम्हें प्रसन्न कर सकती है और कौन तुम्हें प्रसन्न करने में समर्थ है? तुम्हारे महत्व को जानने वाला और तुम्हारी सेवा करने वाला कौन हो सकता है?
सरल व्याख्या
सूक्त के आरंभ में स्तोता अश्विनीकुमारों के प्रति अपनी जिज्ञासा और श्रद्धा व्यक्त करता है. वह जानना चाहता है कि ऐसी कौन सी स्तुति है जिससे अश्विनीकुमार प्रसन्न हों.
यह मंत्र अश्विनीकुमारों के महत्व और उनकी स्तुति करने की इच्छा को सामने रखता है.
मंत्र 2. अश्विनीकुमारों की सेवा और स्तुति
मंत्र
विद्वांसाविददुर: पृच्छेदविद्वानित्थापरो अचेता:. नू चिन्रु मर्ते अक्रौ
सरल हिंदी अर्थ
स्तोता उसी प्रकार तुम्हारी सेवा के मार्ग को जानना चाहता है और तुम्हें जानने का प्रयास करता है. वह शत्रु के आक्रमण से रहित होकर शीघ्र ही स्तोता पर अनुग्रह करता है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अश्विनीकुमारों को जानने और उनकी सेवा के उचित मार्ग को समझने की इच्छा व्यक्त की गई है. स्तोता उनके अनुग्रह की कामना करता है.
मंत्र का भाव अश्विनीकुमारों की स्तुति और उनके अनुकूल होने की प्रार्थना से जुड़ा है.
मंत्र 3. अश्विनीकुमारों को आह्वान
मंत्र
ता विद्वांसा हवामहे वां ता नो विद्वांसा मन््म वोचेतमद्य. प्रार्चद्रयमानो युवाकुः
सरल हिंदी अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. हम दोनों ज्ञानी देवताओं को बुलाते हैं. आप दोनों हमारी प्रार्थना सुनकर हमें उत्तर दें. हम आपकी सहायता की कामना करते हुए आपकी स्तुति करते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अश्विनीकुमारों को सीधे आह्वान किया गया है. स्तोता चाहता है कि वे उसकी प्रार्थना सुनें और उसके लिए कल्याणकारी हों.
मंत्र 4. सोमरस और अश्विनीकुमारों की प्रसन्नता
वि पृच्छामि पाक्या३ न देवान्वषट्कृतस्यादभुतस्य दसख्रा. पातं च सहासो युवं च रभ्यसो नः..
सरल हिंदी अर्थ
हे दर्शनीय अश्विनीकुमारों. मैं तुमसे पूछना चाहता हूं, लेकिन किसी अन्य देवता से नहीं. तुम बढ़कर अग्नि में डाले गए सोमरस को पीओ और उसे प्रौढ़ बनाओ.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अश्विनीकुमारों को यज्ञ में अर्पित सोमरस ग्रहण करने के लिए बुलाया गया है. स्तोता उनसे सीधे संवाद करना चाहता है और उनकी प्रसन्नता की कामना करता है.
मंत्र 5. कक्षीवान की स्तुति
प्र या घोषे भूगवाणे न शोभे यया वाचा यजति पतज्ियो वाम्. प्रैषयुर्न विद्वान्.
सरल हिंदी अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. जिस स्तुति से घोसा-पुत्र कक्षीवान ऋषि सुशोभित हुए थे, उसी स्तुति से मैं भी तुम्हारी प्रशंसा करके सफल होना चाहता हूं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में कक्षीवान ऋषि की स्तुति का उल्लेख आता है. स्तोता उसी प्रकार की स्तुति द्वारा अश्विनीकुमारों को प्रसन्न करने की इच्छा व्यक्त करता है.
यहां पूर्व में की गई स्तुति को वर्तमान प्रार्थना के लिए आधार बनाया गया है.
मंत्र 6. अंधे ऋषि को नेत्र प्रदान करना
श्रुतं गायत्रं तकवानस्याहं चिद्धि रिरेभाश्विना वाम्, आक्षी शुभस्पति दन्..
सरल अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. तुमने अटक-अटक कर चलने वाले और अंधे ऋषि ऋजाश्व की स्तुति सुनी. शोभन पालकी वाले उस ऋषि ने मेरे सामने स्तुति करते हुए अपने नेत्र प्राप्त किए.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में ऋजाश्व का प्रसंग आता है. स्रोत में उन्हें अंधे ऋषि के रूप में वर्णित किया गया है और अश्विनीकुमारों द्वारा उन्हें नेत्र प्रदान करने की बात कही गई है.
मंत्र 7. अश्विनीकुमारों के रथ का वर्णन
युवं ह्यास्तं महो रन्युवं वा यत्रिरततंसतम्. ता नो वसू सुगोपा स्यातं पातं नो वृकादघायो:
सरल अर्थ
हे गुह्यताओ. महान धन देने वाले और पाप का नाश करने वाले बनकर हमारे रक्षक बनो. हमें विपत्ति से बचाओ और अपने रथ द्वारा हमारे पास आओ.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अश्विनीकुमारों से रक्षा की प्रार्थना की गई है. उन्हें धन प्रदान करने वाले और पाप या संकट का नाश करने वाले रूप में पुकारा गया है.
स्तोता चाहता है कि अश्विनीकुमार अपने रथ से उसके पास आएं और उसकी रक्षा करें.
मंत्र 8. शत्रुओं से रक्षा
मा कस्मै धातमभ्यमित्रिणो नो माकुत्रा नो गृहेभ्यो धेनवो गुः. स्तनाभुजो अशिश्वी
सरल अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. हमें किसी शत्रु के सामने उपस्थित मत करो. हमारी दूध देने वाली गायों को किसी अनजान स्थान में भटकने मत दो और उन्हें सुरक्षित रखो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना के साथ गायों की रक्षा की कामना की गई है. स्तोता चाहता है कि उसकी संपत्ति और पशुधन सुरक्षित रहें.
इस प्रकार मंत्र में व्यक्तिगत सुरक्षा के साथ पशुधन की सुरक्षा का भी उल्लेख मिलता है.
मंत्र 9. धन और अन्न की प्राप्ति
दुहीयन्मित्रधितये युवाकु राये च नो मिमीतं वाजवत्यै. इषे च नो मिमीतं धेनुमत्यै
सरल अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. तुम्हारी इच्छा से स्तुति करने वाला व्यक्ति वंश के पोषण के लिए धन प्राप्त करता है. हमें बलवान और गायों सहित अन्न दो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अश्विनीकुमारों से धन, अन्न और वंश के पोषण के लिए आवश्यक साधनों की प्रार्थना की गई है.
स्तोता अपनी समृद्धि के साथ अपने परिवार और वंश के पोषण की भी कामना करता है.
मंत्र 10. अश्विनीकुमारों का धनयुक्त रथ
अश्विनोरसनं रथमनश्चं वाजिनीवतो:. तेनाहं भूरि चाकन..
सरल अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. मैंने अन्नदाता अश्विनीकुमारों का सुरक्षित रथ पाया है. मैं उस रथ से बहुत अधिक धन की कामना करता हूं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अश्विनीकुमारों के रथ को अन्न और धन से जोड़ा गया है. स्तोता उस रथ को प्राप्त करने और उससे विपुल धन की प्राप्ति की इच्छा व्यक्त करता है.
मंत्र 11. वंश की वृद्धि
अयं समह मा तनूह्ाते जनाँ अनु. सोमपेयं सुखो रथः:.
सरल अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. हमें धन सहित अपने उस रथ द्वारा समृद्ध करो. उस रथ को स्तोता के समीप आने वाले स्थान पर ले आओ और हमारे वंश की वृद्धि करो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अश्विनीकुमारों से धन और वंश की वृद्धि की प्रार्थना की गई है. उनका रथ यहां समृद्धि लेकर आने वाले साधन के रूप में प्रस्तुत होता है.
मंत्र 12. प्रातःकाल के अश्विनीकुमार
अध स्वप्रस्य निर्विदे3भुञ्जतश्न रेवतः. उभा ता बस्रि नश्यतः..
सरल अर्थ
हे अश्विनीकुमारों. मैं प्रातःकाल के समय तुम्हें सुनता और पुकारता हूं. तुम दोनों शीघ्र आओ और मेरी रक्षा करो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में प्रातःकाल अश्विनीकुमारों का आह्वान किया गया है. स्तोता उन्हें शीघ्र आने और अपनी रक्षा करने के लिए पुकारता है.
यहां अश्विनीकुमारों की शीघ्र सहायता करने वाली विशेषता फिर सामने आती है.
सूक्त 120 का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 120 अश्विनीकुमारों की स्तुति और उनसे सहायता, रक्षा तथा समृद्धि की प्रार्थना का सूक्त है.
सूक्त के आरंभ में स्तोता अश्विनीकुमारों को जानने और उनकी सेवा करने की इच्छा व्यक्त करता है. इसके बाद उन्हें यज्ञ में आने, सोमरस ग्रहण करने और अपनी स्तुति स्वीकार करने के लिए बुलाया जाता है.
सूक्त में कक्षीवान और ऋजाश्व जैसे प्रसंगों का उल्लेख मिलता है. विशेष रूप से ऋजाश्व को नेत्र प्रदान करने का प्रसंग अश्विनीकुमारों की सहायता से जुड़ा हुआ है.
इसके बाद स्तोता अश्विनीकुमारों से शत्रुओं से रक्षा, गायों की सुरक्षा, धन, अन्न और वंश की वृद्धि की प्रार्थना करता है. अश्विनीकुमारों के रथ को बार-बार अपने पास बुलाया गया है.
अंतिम मंत्रों में धनयुक्त रथ और वंशवृद्धि की कामना के साथ सूक्त समाप्त होता है.