ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 98

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 98. वैश्वानर अग्नि की स्तुति और धन की रक्षा

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 98 अग्नि देव को समर्पित है. इस छोटे से सूक्त में अग्नि के वैश्वानर स्वरूप का वर्णन मिलता है. ऋषि वैश्वानर अग्नि की कृपा से उत्तम बुद्धि प्राप्त करने, धन और समृद्धि पाने तथा परिवार के साथ सुरक्षित रहने की प्रार्थना करते हैं.

इस सूक्त में वैश्वानर अग्नि को समस्त भुवनों के राजा के रूप में स्मरण किया गया है. उनके सूर्य के साथ संबंध का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वे यहां से उत्पन्न होकर समस्त संसार को देखते हैं. आगे अग्नि के आकाश और पृथ्वी में स्थित होने तथा औषधियों में प्रवेश करने का वर्णन आता है.

मंत्र 1

मंत्र

वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्री:.
इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण..

सरल अर्थ

हम वैश्वानर अग्नि की उत्तम बुद्धि में स्थित हों. वैश्वानर अग्नि समस्त भुवनों के राजा हैं. वे यहां से उत्पन्न होकर इस पूरे संसार को देखते हैं और सूर्य के साथ मिलकर अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं.

व्याख्या

सूक्त की शुरुआत वैश्वानर अग्नि के व्यापक स्वरूप के स्मरण से होती है. उन्हें केवल यज्ञ की अग्नि के रूप में नहीं, बल्कि समस्त भुवनों के राजा के रूप में देखा गया है. ऋषि उनकी उत्तम बुद्धि में रहने की इच्छा व्यक्त करते हैं.

मंत्र में यह भी कहा गया है कि वैश्वानर अग्नि यहां से उत्पन्न होकर पूरे संसार को देखते हैं और सूर्य के साथ अपने कार्य में प्रवृत्त होते हैं. इस प्रकार इस मंत्र में अग्नि और सूर्य के संबंध का भी उल्लेख मिलता है.

मंत्र 2

मंत्र

पृष्टो दिवि पृष्टो अग्नि: पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश.
वैश्वानर: सहसा पृष्टो अग्नि: स नो दिवा स रिष: पातु नक्तम्‌.

सरल अर्थ

वैश्वानर अग्नि आकाश में सूर्यरूप से तथा पृथ्वी पर गृहपति के रूप में वर्तमान हैं. अग्नि ने सभी औषधियों में प्रवेश किया है. वही वैश्वानर अग्नि हमें दिन और रात शत्रु से बचाएं.

व्याख्या

इस मंत्र में अग्नि के अलग-अलग रूपों का वर्णन किया गया है. आकाश में वे सूर्यरूप से और पृथ्वी पर गृहपति के रूप में वर्तमान बताए गए हैं. साथ ही उनका संबंध सभी औषधियों से जोड़ा गया है.

मंत्र के अंत में ऋषि वैश्वानर अग्नि से दिन और रात दोनों समय शत्रुओं से रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं. यहां अग्नि का स्वरूप सुरक्षा देने वाला दिखाई देता है.

मंत्र 3

मंत्र

वैश्वानर तव तत्सत्यमस्त्वस्मात्रायो मघवान:ः सचन्ताम्‌.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:.

सरल अर्थ

हे वैश्वानर अग्नि. तुम्हारे संबंध में जो कहा गया है, वह सत्य हो. हमें धन प्राप्त हो और हमारे साथ धनवान लोग जुड़े रहें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश हमारे धन की रक्षा करें.

व्याख्या

सूक्त के अंतिम मंत्र में वैश्वानर अग्नि से धन और समृद्धि की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि उनके संबंध में कही गई स्तुति सत्य सिद्ध हो और उन्हें धन प्राप्त हो.

इसके बाद मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण करते हुए उनसे भी धन की रक्षा करने का निवेदन किया गया है. इस प्रकार सूक्त का समापन अग्नि के साथ अन्य देवशक्तियों और प्रकृति के प्रमुख रूपों से संरक्षण की प्रार्थना के साथ होता है.

सूक्त का सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 98 आकार में छोटा है, लेकिन इसमें वैश्वानर अग्नि के व्यापक स्वरूप का वर्णन मिलता है. पहले मंत्र में उन्हें समस्त भुवनों का राजा बताया गया है और उनके सूर्य के साथ संबंध का उल्लेख किया गया है.

दूसरे मंत्र में वैश्वानर अग्नि को आकाश में सूर्यरूप और पृथ्वी पर गृहपति के रूप में बताया गया है. उनके सभी औषधियों में प्रवेश करने की बात भी कही गई है. इसी मंत्र में उनसे दिन और रात शत्रुओं से रक्षा करने की प्रार्थना की गई है.

अंतिम मंत्र में धन की प्राप्ति और उसकी रक्षा की कामना की गई है. इसके लिए वैश्वानर अग्नि के साथ मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का भी स्मरण किया गया है.

इस प्रकार सूक्त 98 में वैश्वानर अग्नि का व्यापक स्वरूप, सूर्य और प्रकृति से उनका संबंध, शत्रुओं से रक्षा तथा धन की प्राप्ति और सुरक्षा मुख्य रूप से सामने आती है. यहां दिया गया अर्थ और विवेचन आपके उपलब्ध स्रोत में दिए गए मंत्रों और हिंदी अर्थ पर ही आधारित है. इसमें अपनी ओर से कोई अतिरिक्त धार्मिक या आधुनिक अर्थ नहीं जोड़ा गया है.

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