ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 102

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 102. इंद्र से शत्रु विजय, धन और अन्न की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 102 देवता इंद्र को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि इंद्र के महान बल और उनके द्वारा किए गए शत्रु-विनाश के कार्यों का स्मरण करते हुए उनसे अपनी रक्षा और विजय की प्रार्थना करते हैं.

सूक्त में इंद्र को महान बल वाला, शत्रुओं का नाश करने वाला और धन देने वाला बताया गया है. ऋषि उनसे अपने स्तोत्र को स्वीकार करने और यज्ञ में उपस्थित होने का निवेदन करते हैं. कई मंत्रों में इंद्र के रथ, उनके घोड़ों और युद्ध में उनके साथ रहने वाले सामर्थ्य का वर्णन भी मिलता है.

इस सूक्त में विशेष रूप से शत्रुओं पर विजय और उनके धन की प्राप्ति, यजमान की रक्षा, अन्न की प्राप्ति तथा युद्ध में सफलता की कामना सामने आती है. अंतिम मंत्रों में इंद्र के पक्ष में रहने और अन्न की प्राप्ति के लिए मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का भी स्मरण किया गया है.

मंत्र 1

मंत्र

इमां ते थियं प्र भरे महो महीमस्य स्तोत्रे धिषणा यत्त आनजे.
तमुत्सवे च प्रसवे च सासहिमिन्द्रं देवास: शवसामदन्ननु.

सरल हिंदी अर्थ

हे इंद्र. तुम्हारे महान उद्देश्य से मैं यह बड़ी स्तुति कर रहा हूं, क्योंकि तुम्हारी अनुग्रह बुद्धि मेरे स्तोत्र पर ही आधारित है. ऋत्विजों ने अभिवृद्धि और धन पाने के लिए शत्रु पराक्रम वाले इंद्र की स्तुतियों द्वारा प्रसन्न किया है. देवता तुम्हारे बल से प्रसन्न हों.

सरल व्याख्या

सूक्त की शुरुआत इंद्र के प्रति की गई बड़ी स्तुति से होती है. ऋषि कहते हैं कि वे इंद्र के महान उद्देश्य से यह स्तुति कर रहे हैं. ऋत्विज भी अभिवृद्धि और धन की प्राप्ति के लिए इंद्र की स्तुति करते हैं.

मंत्र के अंत में देवताओं के इंद्र के बल से प्रसन्न होने की कामना की गई है.

मंत्र 2

मंत्र

अस्य श्रवो नद्यः सप्त बिश्रति द्यावाक्षामा पृथिवी दर्शतं वपु:.
अस्मे सूर्याचन्द्रमसाभिचक्षे श्रद्धे कमिन्द्र चरतो वितर्तु

सरल हिंदी अर्थ

गंगा आदि सात सरिताएं इंद्र की कीर्ति एवं आकाश, पृथ्वी तथा अंतरिक्ष इंद्र का दर्शनीय रूप धारण करते हैं. हे इंद्र. पदार्थों को हमारे सामने प्रकाशित करने एवं हमारी श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए सूर्य और चंद्रमा बारी-बारी से बार-बार घूमते हैं.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में इंद्र के साथ पृथ्वी, आकाश, अंतरिक्ष, नदियों, सूर्य और चंद्रमा का उल्लेख आता है. स्रोत के अनुसार गंगा आदि सात सरिताएं इंद्र की कीर्ति से जुड़ी हैं और आकाश, पृथ्वी तथा अंतरिक्ष उनके दर्शनीय रूप को धारण करते हैं.

सूर्य और चंद्रमा के बार-बार घूमने का उल्लेख भी इसी मंत्र में किया गया है. उनका प्रकाश पदार्थों को सामने लाने और श्रद्धा उत्पन्न करने वाला बताया गया है.

मंत्र 3

मंत्र

तं समा रथं मघवन्प्राव सातये जैत्रं यं ते अनुमदाम संगमे.
आजा न इन्द्र मनसा पुरुष्टत त्वायद्भ्यो मघवउ्छर्म यच्छ न:..

सरल हिंदी अर्थ

हे इंद्र. तुम्हारे जिस जयशील रथ को शत्रुओं के साथ होने वाले संग्राम में देखकर हम प्रसन्न होते हैं, हे धनस्वामी इंद्र. हमें धन देने के लिए उसी रथ को चलाओ और अपने अभिलाषी हम लोगों को सुख दो.

सरल व्याख्या

यहां इंद्र के जयशील रथ का वर्णन है. ऋषि कहते हैं कि शत्रुओं के साथ होने वाले संग्राम में उस रथ को देखकर वे प्रसन्न होते हैं.

इंद्र को धनस्वामी कहकर उनसे प्रार्थना की गई है कि वे उसी रथ को चलाएं, जिससे अभिलाषा रखने वाले लोगों को धन और सुख प्राप्त हो.

मंत्र 4

मंत्र

वयं जयेम त्वया युजा वृतमस्माकमंशमुदवा भरेभरे,
अस्मभ्यमिन्द्र वरिव: सुगं कृधि प्र शत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रु

सरल हिंदी अर्थ

हे इंद्र. तुम्हें सहायक पाकर हम स्तोता शत्रु को जीत लें. संग्राम में हमारे भाग की रक्षा करो. हे मधुवान. हमें धन सुलभ कराओ तथा शत्रुओं की शक्ति बाधित करो.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋषि इंद्र को अपना सहायक मानकर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं. संग्राम में अपने पक्ष की रक्षा करने और धन को सहज बनाने का भी निवेदन है.

इसके साथ शत्रुओं की शक्ति को रोकने की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 5

मंत्र

नाना हि त्वा हवमाना जना इमे धनानां धर्तरवसा विपन्यव:.,
अस्माकं समा रथमा तिष्ठ सातये जैत्रं हीन्द्र निभृतं मनस्तव..

सरल हिंदी अर्थ

हे धनधारणकर्ता इंद्र. अपनी रक्षा के निमित्त बहुत से लोग तुम्हारी स्तुति करते एवं तुम्हें बुलाते हैं. उनमें केवल हमें धन प्रदान करने के लिए रथ पर बैठो. हे इंद्र. तुम्हारा मन अभययुक्त एवं जयशील है.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में बहुत से लोगों द्वारा इंद्र की स्तुति और उनके आह्वान की बात कही गई है. ऋषि विशेष रूप से प्रार्थना करते हैं कि इंद्र उनके लिए धन देने वाले रथ पर बैठें.

मंत्र में इंद्र के मन को अभययुक्त और जयशील बताया गया है.

मंत्र 6

मंत्र

गोजिता बाहू अमितक्रतु: सिम: कर्मन्कर्मज्छतमूति: खजड्कर:,
अकल्प इन्द्र: प्रतिमानमोजसाथा जना वि ह्वयन्ते सिघासव:.

सरल हिंदी अर्थ

हे इंद्र. तुम्हारी भुजाएं शत्रु-विजय द्वारा गायों को प्राप्त कराने वाली एवं तुम्हारा ज्ञान असीमित है. तुम श्रेष्ठ हो और स्तोताओं के यज्ञों की अनेक प्रकार से रक्षा करते हो. तुम संग्रामकर्ता, स्वतंत्र एवं समस्त प्राणियों की शक्ति के प्रतिमान हो. इसलिए धन पाने के इच्छुक तुम्हें अनेक प्रकार से बुलाते हैं.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में इंद्र की भुजाओं और उनके ज्ञान का वर्णन किया गया है. उनकी भुजाओं को गायों को विजय द्वारा प्राप्त कराने वाली बताया गया है और उनके ज्ञान को असीमित कहा गया है.

इंद्र को श्रेष्ठ, स्वतंत्र और समस्त प्राणियों की शक्ति का प्रतिमान बताया गया है. इसी कारण धन की इच्छा रखने वाले लोग उन्हें अनेक प्रकार से बुलाते हैं.

मंत्र 7

मंत्र

उत्ते शतान्मघवन्नुच्च भूयस उत्सहसाद्रिरिचे कृष्टिषु श्रव:.
अमात्र त्वा धिषणा तित्विषे मह्ुधा वृत्राणि जिघ्नसे पुरन्दर..

सरल हिंदी अर्थ

हे धनस्वामी इंद्र. मनुष्यों को तुम्हारे द्वारा दिया गया अन्न सौ धनों से अधिक, शताधिक से भी अधिक अथवा हजार से भी अधिक है. अगणित गुणों से युक्त तुम्हारी स्तुति प्रकाशित करती है. हे पुरंदर. तुम शत्रुओं का विनाश करते हो.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में इंद्र द्वारा दिए गए अन्न और धन की प्रचुरता का वर्णन है. स्रोत में इसकी तुलना सौ, शताधिक और हजार से भी अधिक धन से की गई है.

इंद्र को अनेक गुणों से युक्त बताया गया है और उनकी स्तुति को प्रकाशित करने वाली कहा गया है. मंत्र के अंत में उन्हें पुरंदर, अर्थात शत्रुओं का विनाश करने वाला, कहा गया है.

मंत्र 8

मंत्र

त्रिविष्टिधातु प्रतिमानमोजसस्तिस्रो भूमीर्न॑पते त्रीणि रोचना.
अतीद विश्व भुवनं ववक्षिथा शत्रुरिन्द्र जनुषा सनादसि

सरल हिंदी अर्थ

हे मनुष्यों के पालक इंद्र. जिस प्रकार तिगुनी बढ़ी हुई रस्सी दृढ़ होती है, उसी प्रकार तुम बल में सभी प्राणियों के प्रतिमान हो. हे इंद्र. तुम अपने जन्मकाल से ही शत्रुहंता थे, इसलिए तुम तीन लोकों में तीन प्रकार के तेज एवं इस संसार को ढोने में पूरी तरह समर्थ हो.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में इंद्र के बल की तुलना तिगुनी बढ़ी हुई दृढ़ रस्सी से की गई है. उन्हें सभी प्राणियों के बल का प्रतिमान कहा गया है.

स्रोत में इंद्र को जन्मकाल से ही शत्रुओं का नाश करने वाला बताया गया है. उनके तीन लोकों में तीन प्रकार के तेज और संसार को धारण करने की सामर्थ्य का भी उल्लेख किया गया है.

मंत्र 9

मंत्र

त्वां देवेषु प्रथमं हवामहे त्वं बभूथ पृतनासु सासहि:.
सेम॑ं नः कारुमुपमन्युमुद्धिदमिन्द्र: कृणोतु प्रसवे रथं

सरल हिंदी अर्थ

हे इंद्र. तुम देवों में श्रेष्ठ एवं संग्रामों में शत्रुपराजयकर्ता हो. हम तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमें स्तुतिकर्ता, सर्वज्ञ एवं शत्रुनाशक पुत्र दो तथा युद्ध होने पर हमारा रथ अन्य रथों से आगे करो.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में इंद्र को देवों में श्रेष्ठ और संग्रामों में शत्रुओं को पराजित करने वाला कहा गया है. ऋषि उनसे स्तुतिकर्ता, सर्वज्ञ और शत्रुनाशक पुत्र देने की प्रार्थना करते हैं.

युद्ध के समय अपने रथ को अन्य रथों से आगे करने का निवेदन भी इसी मंत्र में किया गया है.

मंत्र 10

मंत्र

त्वं जिगेथ न धना रुरोधिथार्भेष्वाजा मघवन्महत्सु च.
त्वामुग्रमवसे सं शिशीमस्यथा न इन्द्र हवनेषु चोद

सरल हिंदी अर्थ

हे इंद्र. तुम शत्रुओं को जीतते हो एवं उनका धन छिपाकर नहीं रखते हो. हे मधुवान. छोटे एवं बड़े संग्राम में हम स्तुति द्वारा उग्र को अपनी रक्षा के निमित्त बुलाते हैं. हमें युद्ध के निमित्त आह्वानों से प्रेरित करो.

सरल व्याख्या

यहां इंद्र के शत्रु-विजयी स्वरूप का वर्णन है. उनके द्वारा शत्रुओं के धन को प्राप्त करने और उसे छिपाकर न रखने की बात कही गई है.

ऋषि छोटे और बड़े दोनों प्रकार के संग्राम में इंद्र को अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं और उनसे युद्ध के लिए प्रेरित करने की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 11

मंत्र

विश्वाहेन्द्री अधिवक्ता नो अस्त्वपरिहवृता: सनुयाम वाजम्‌.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ

सरल हिंदी अर्थ

सभी कालों में वर्तमान इंद्र हमारे पक्षपाती बनकर बोलें एवं हम अकुंठित गति बनकर हवि रूपी अन्न का उपभोग करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती एवं आकाश उसकी पूजा करें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋषि इंद्र को अपने पक्ष में रखने की प्रार्थना करते हैं. वे चाहते हैं कि इंद्र उनकी ओर से बोलें और उन्हें हवि रूप अन्न प्राप्त हो.

इसके बाद मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है. उनसे भी इस अन्न की रक्षा और पूजा से संबंधित प्रार्थना की गई है.

सूक्त का सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 102 इंद्र की स्तुति करते हुए उनसे शत्रुओं पर विजय, धन, अन्न और सुरक्षा की प्रार्थना करता है. शुरुआत में ऋषि इंद्र के महान बल और उनके शत्रु-विजयी स्वरूप का स्मरण करते हैं.

सूक्त के बीच के मंत्रों में इंद्र के रथ, उनकी भुजाओं, उनके बल और उनके द्वारा दिए जाने वाले धन तथा अन्न का वर्णन मिलता है. ऋषि उनसे अपना सहायक बनने और संग्राम में शत्रुओं की शक्ति को रोकने की प्रार्थना करते हैं.

एक मंत्र में इंद्र द्वारा दिए गए अन्न की प्रचुरता का वर्णन है. दूसरे मंत्र में उनके बल की तुलना दृढ़ता से की गई है और उन्हें जन्म से ही शत्रुओं का नाश करने वाला बताया गया है. आगे इंद्र से स्तुतिकर्ता और शत्रुनाशक पुत्र देने तथा युद्ध में अपने रथ को आगे रखने की प्रार्थना की गई है.

अंतिम मंत्रों में इंद्र को शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला और उनके धन को प्राप्त कराने वाला बताया गया है. ऋषि छोटे और बड़े दोनों प्रकार के संग्राम में इंद्र से रक्षा की प्रार्थना करते हैं. इसके बाद इंद्र को अपने पक्ष में रखने और हवि रूप अन्न प्राप्त करने की कामना की गई है.

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