ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 85

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 85. मरुद्गणों की महिमा, वर्षा और यज्ञ में उनका आगमन

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 85 मरुद्गणों को समर्पित है. इस सूक्त में उनके तेज, गति, पराक्रम और वर्षा कराने वाले स्वरूप का अत्यंत सुंदर वर्णन मिलता है. ऋषि मरुद्गणों को आकाश और पृथ्वी में विचरण करने वाले, बादलों को गति देने वाले, शत्रुओं का नाश करने वाले तथा यज्ञ में आने वाले देवों के रूप में स्मरण करते हैं.

सूक्त के अनेक मंत्रों में मरुद्गणों के रथ, उनके स्वर्णाभूषण, वर्षा कराने की शक्ति और यजमान के प्रति उनके अनुग्रह का उल्लेख मिलता है. यहां प्रस्तुत व्याख्या केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 85 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

मंत्र 1

मंत्र

प्र ये शुम्भन्ते जनयो न सप्तयो यामज्ुद्रस्य सूनव: सुदंस
रोदसी हि मरुतश्नक्रिरे वृधे मदन्ति वीरा विदथेषु घृष्वय:.

सरल अर्थ

हे मरुद्गण. तुम यात्रा के समय अपने शरीर को नाड़ियों के समान अलंकृत करते हो. रुद्र के पुत्र होने के कारण पृथ्वी और आकाश की वृद्धि करने वाले, शत्रुओं को दूर भगाने वाले और यज्ञ में सोमपान से प्रसन्न रहने वाले हो.

व्याख्या

सूक्त का आरंभ मरुद्गणों के तेजस्वी स्वरूप के वर्णन से होता है. ऋषि उन्हें रुद्र के पुत्र बताते हैं और उनके दिव्य रूप, गति तथा संसार के हित में किए जाने वाले कार्यों का स्मरण करते हैं.

मंत्र 2

मंत्र

त उक्षितासो महिमानमाशत दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः.
अर्चन्तो अर्क जनयन्त इन्द्रियमधि श्रियो दधिरे पृष्णिमातरः..

सरल अर्थ

देवताओं द्वारा अभिषिक्त होकर मरुद्गणों ने महान पद प्राप्त किया. उन्होंने आकाश में अपना स्थान बनाया. इन्द्र की पूजा करते हुए और शक्ति धारण करके उन्होंने विशेष ऐश्वर्य प्राप्त किया.

व्याख्या

यहां मरुद्गणों की दिव्य प्रतिष्ठा का वर्णन है. ऋषि बताते हैं कि वे केवल बलशाली ही नहीं, बल्कि देवकार्य में सदैव लगे रहने वाले देव हैं. उनका ऐश्वर्य और तेज उनके सत्कर्मों का परिणाम है.

मंत्र 3

मंत्र

गोमातरः यच्छुभयन्ते अञ्जिभिस्तनूषु शुभ्रा दधिरे विरुक्मतः.
बाधन्ते विश्वमभिमातिनमप वर्त्मन्येषामनु रीयते घृतम्..

सरल अर्थ

भूमिपुत्र मरुद्गण स्वयं को शोभायुक्त करते समय उज्ज्वल आभूषण धारण करते हैं. वे शत्रुओं का नाश करते हैं और उनके मार्ग का अनुसरण करते हुए वर्षा का जल प्रवाहित होता है.

व्याख्या

इस मंत्र में मरुद्गणों के सौंदर्य और पराक्रम का सुंदर समन्वय दिखाई देता है. एक ओर वे स्वर्णाभूषणों से विभूषित हैं, दूसरी ओर उनके आने से वर्षा और जीवन का संचार होता है.

मंत्र 4

मंत्र

वि ये भ्राजन्ते सुमखास ऋष्टिभिः प्रयज्यवो मरुतो अच्युता चित्.
मनोजुवो यन्मरुतो रथेष्वा वृषव्रतासः पृषतीरयुग्ध्वम्..

सरल अर्थ

शोभन यज्ञ करने वाले मरुद्गण अपनी शक्ति से पर्वतों को भी हिला देते हैं. जब वे अपने रथ में बूंदों वाली हरिणियों को जोतते हैं, तब वे मन के समान तीव्र गति से चलते हैं और वर्षा का कारण बनते हैं.

व्याख्या

ऋषि यहां मरुद्गणों की गति की तुलना मन से करते हैं. उनके रथ, उनके वाहन और उनकी गति यह संकेत देते हैं कि प्रकृति में परिवर्तन अत्यंत तीव्रता से होता है और वर्षा उसी का परिणाम है.

मंत्र 5

मंत्र

प्र यद्रथेषु पृषतीरयुग्ध्वं वाजे अद्रिं मरुतो रंहयन्तः.
उतारुषस्य वि धुनि धाराः पविभिर्दुनन्ति भूम..

सरल अर्थ

हे मरुद्गण. अन्न उत्पन्न करने के लिए बादलों को प्रेरित करते हुए बूंदों वाली हरिणियों को अपने रथ में जोतो. उस समय प्रकाशमान सूर्य से निकलने वाली जलधाराएं संपूर्ण पृथ्वी को भिगो देती हैं.

व्याख्या

यहां वर्षा का अत्यंत सुंदर चित्रण मिलता है. मरुद्गणों के प्रयत्न से बादल सक्रिय होते हैं और वर्षा के माध्यम से पृथ्वी पर अन्न और जीवन का आधार तैयार होता है.

मंत्र 6

मंत्र

आ वो वहन्तु सप्तयो रघुष्यदो रघुपत्वानः प्र जिगात बाहुभिः.
सीदता बर्हिषो वः सदस्कृतं मादयध्वं मरुतो मध्वो अन्धसः..

सरल अर्थ

हे मरुद्गण. शीघ्र गति वाले घोड़े तुम्हें हमारे यज्ञ में लेकर आएं. तुम वेदी पर बिछे कुशों पर विराजमान होकर मधुर सोमरस का पान करो और प्रसन्न होओ.

व्याख्या

इस मंत्र में ऋषि मरुद्गणों को यज्ञ में आमंत्रित करते हैं. वे चाहते हैं कि मरुद्गण यज्ञ स्वीकार करें और अपनी उपस्थिति से यज्ञ को सफल बनाएं.

मंत्र 7

मंत्र

तेऽवर्धन्त स्वंतवसो महित्वना नाकं तस्थुश्चक्रिरे सदः.
विष्णुर्यद्वावृधे वृणीषु मरुद्भ्यो वयो न सीदन्नधि बर्हिषि प्रिये..

सरल अर्थ

अपनी शक्ति के सहारे महान बने मरुद्गण स्वर्ग में प्रतिष्ठित हुए. उन्होंने अपने निवास स्थान को विस्तृत बनाया. विष्णु ने भी उनके लिए कल्याणकारी कार्य किए. वे पक्षियों के समान शीघ्र आकर हमारे यज्ञ में विराजमान हों.

व्याख्या

यहां मरुद्गणों के उच्च स्थान और उनके तेज का वर्णन है. ऋषि चाहते हैं कि वे शीघ्र यज्ञ में उपस्थित होकर भक्तों को अपने दर्शन और कृपा से अनुग्रहित करें.

मंत्र 8

मंत्र

शूरा इवेद्युधयः न जग्मयः श्वेत्रेय्यो न पृतनासु येतिरे.
भयंते विश्वा भुवना मरुद्गणाः राजान इव त्वेषसंदृशो नरः..

सरल अर्थ

शीघ्र चलने वाले मरुद्गण वीरों के समान युद्ध में प्रवृत्त होते हैं. वर्षा और आंधी के प्रबल वेग से समस्त संसार प्रभावित हो जाता है.

व्याख्या

इस मंत्र में मरुद्गणों की शक्ति और प्रभाव का वर्णन मिलता है. उनकी गति और पराक्रम इतने प्रबल हैं कि संपूर्ण प्रकृति उनके प्रभाव को अनुभव करती है.

मंत्र 9

मंत्र

त्वष्टा यद्वज्रं सुकृतं हिरण्यमयं सहस्रभृष्टिं स्वपाः अवर्तयत्.
धत्ते इन्द्रो नर्यापसं कर्तवे वृत्रं निरपामोजसा ववर्ष..

सरल अर्थ

शोभन कर्म करने वाले त्वष्टा ने इन्द्र के लिए स्वर्णमय और हजार धारों वाला वज्र बनाया. उसी वज्र को लेकर इन्द्र ने वृत्र का वध किया और उसके द्वारा रोकी गई जलधाराओं को मुक्त कर दिया.

व्याख्या

इस मंत्र में मरुद्गणों के साथ इन्द्र के कार्य का भी स्मरण किया गया है. वृत्र-वध के बाद वर्षा का प्रवाह प्रारंभ होना समस्त सृष्टि के कल्याण का प्रतीक माना गया है.

मंत्र 10

मंत्र

ऊर्ध्वं नुनुद्रेऽवतं त ओजसा दादृ्हाणं चिद्बिभिदुर्वि पर्वतम्.
धमन्तो वाणं मरुतः सुदानवो मदे सोमस्य रण्यानि चक्रिरे..

सरल अर्थ

मरुद्गण अपनी शक्ति से कुओं को ऊपर तक भर देते हैं. मार्ग में पर्वत बाधा बनते हैं तो उन्हें भी तोड़ देते हैं. सोमरस का पान करके प्रसन्न होकर वे स्तुतिकर्ताओं को प्रिय धन प्रदान करते हैं.

व्याख्या

यह मंत्र मरुद्गणों की शक्ति और उदारता दोनों को प्रकट करता है. वे केवल वर्षा कराने वाले देव नहीं हैं, बल्कि अपने उपासकों को समृद्धि और कल्याण भी प्रदान करते हैं.

मंत्र 11

मंत्र

जिहीं नुनुद्रेऽवतं तथा दिशासिंचवन्तं गोतमाय वण्जने.
आ गच्छन्तीमनसा चित्रभानवः कामं विप्रस्य तर्पयन्त धामभिः..

सरल अर्थ

मरुद्गण गौतम ऋषि की ओर बढ़कर उन्हें जल प्रदान करते हैं और उनकी रक्षा करते हैं. प्रकाशमान मरुद्गण अपनी कृपा से ऋषि की कामना पूर्ण करते हैं.

व्याख्या

सूक्त का अंतिम मंत्र मरुद्गणों की कृपालु प्रकृति को दर्शाता है. वे अपने भक्तों की आवश्यकताओं को समझते हैं, उनका संरक्षण करते हैं और उन्हें जीवन के लिए आवश्यक साधन प्रदान करते हैं.

मंत्र 12

मंत्र

यः वः शर्म शशमानाय सन्ति त्रिधातूनि दाशुषे यच्छदधि.
अस्मभ्यं तानि मरुतो वि यन्तु रयीं नो धत्त शोभनैर्वीरैः..

सरल अर्थ

हे मरुद्गण. तुम अपने उपासक को तीनों लोकों में सुख प्रदान करते हो. उसी प्रकार हमें भी उत्तम वीरों, धन और समृद्धि से युक्त जीवन प्रदान करो.

व्याख्या

सूक्त का समापन मंगलकामना के साथ होता है. ऋषि मरुद्गणों से केवल भौतिक धन नहीं, बल्कि ऐसा जीवन चाहते हैं जिसमें सुख, संरक्षण, योग्य संतति और समृद्धि बनी रहे.

सूक्त का सार

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 85 मरुद्गणों की शक्ति, तेज और प्रकृति में उनकी भूमिका का अत्यंत सुंदर वर्णन करता है. इसमें उन्हें रुद्र के पुत्र, वर्षा कराने वाले, पर्वतों को कंपित करने वाले, बादलों को गति देने वाले और यज्ञ में आने वाले देवों के रूप में चित्रित किया गया है. साथ ही इन्द्र के साथ उनके संबंध तथा वृत्र-वध के प्रसंग का भी उल्लेख मिलता है.

सूक्त का मुख्य भाव यह है कि मरुद्गण प्रकृति के संतुलन, वर्षा, समृद्धि और यजमान के कल्याण के देव हैं. श्रद्धा से उनका स्मरण करने वाला उपासक उनके संरक्षण और अनुग्रह का अधिकारी बनता है. यहां प्रस्तुत व्याख्या केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 85 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

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