ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 71

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 71. अग्नि की स्तुति और यजमान का कल्याण

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का यह सूक्त अग्नि देव की महिमा का विस्तार से वर्णन करता है. ऋषि यहां अग्नि को केवल यज्ञ में प्रतिष्ठित देव के रूप में नहीं देखते, बल्कि उन्हें यजमान के हितैषी, देवताओं तक हव्य पहुंचाने वाले, धन और तेज प्रदान करने वाले तथा संकटों से रक्षा करने वाले देव के रूप में स्मरण करते हैं.

पूरे सूक्त में बार-बार यह भाव सामने आता है कि श्रद्धापूर्वक अग्नि की उपासना करने वाला यजमान उनके संरक्षण और कृपा का अधिकारी बनता है.

मंत्र 1-2

मंत्र

उप प्र जिन्वन्नुशतीरुशन्तं पतिं न नित्यं जनयः सनीव्ठा:.
स्वसार: श्यावीमरुषीमजुष्रज्चित्रमुच्छन्तीमुषसं न

वीछु चिद्वृव्ठहा पितरो न उक्थैरद्रिं रुजन्नड़गिरसो रवेण.
चक्ुर्दिवो बृहतो गातुमस्मे अहः स्वर्विविदु: केतुमु

सरल अर्थ

ऋषि उषा और अग्नि के संबंध का सुंदर वर्णन करते हैं. जिस प्रकार उषा के आने से सूर्य का प्रकाश प्रकट होता है, उसी प्रकार यज्ञ में अग्नि का प्रज्वलन उन्हें प्रकाशित करता है. अंगिरा ऋषियों ने स्तुति के द्वारा अग्नि की महिमा का विस्तार किया और उनके माध्यम से लोक का कल्याण हुआ.

व्याख्या

सूक्त की शुरुआत अग्नि के प्रकट होने से होती है. ऋषि बताते हैं कि अग्नि का प्रकाश केवल यज्ञकुंड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देवताओं और मनुष्यों के बीच संबंध स्थापित करने का माध्यम भी बनता है. इसलिए अग्नि की स्तुति को वैदिक परंपरा में विशेष महत्व दिया गया है.

मंत्र 3-4

दधन्नृतं धनयन्नस्य धीतिमादिदर्यो दिधिष्वो३ विभत्रा:.
अतृष्यन्तीरपसो यन्त्यच्छा देवाञ्जन्म प्रयसा वर्धयन्ती

मथीद्यदीं विभूतो मातरिश्वा गृहेगृहे श्येतो जेन्यो भूत.
आदी राज्ञे न सहीयसे सचा सन्ना दूत्यंश भूगवाणो विवाय..

सरल अर्थ

जो यजमान श्रद्धा से अग्नि को धारण करता है और यज्ञकर्म में लगा रहता है, उसकी उन्नति होती है. अग्नि उसके लिए देवताओं और मनुष्यों के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं. व्यान वायु की भांति अग्नि यज्ञ में सक्रिय रहते हैं और यजमान के कार्यों को सफल बनाते हैं.

व्याख्या

इन मंत्रों में अग्नि को कर्मशील देव के रूप में दिखाया गया है. वे केवल यज्ञ की शोभा नहीं बढ़ाते, बल्कि यजमान के प्रत्येक शुभ कार्य में सहायक बनते हैं. श्रद्धा और यज्ञ दोनों का संबंध यहां अग्नि के माध्यम से स्पष्ट किया गया है.

मंत्र 5-6

महे यत्पित्र ईं रसं दिवे करव त्सरत्पृशन्यश्रिकित्वान्‌.
सृजदस्ता धृषता दिद्युमस्मै स्वायां देवो दुहितरि त्विषिं धा

स्व आ यस्तुभ्यं दम आ विभाति नमो वा दाशादुशतो अनु द्यून्‌.
वर्धो अग्ने वयो अस्य द्विबह्ा यासद्राया सरथं यं जुनासि..

सरल अर्थ

जब यजमान श्रद्धा के साथ यज्ञ करता है, तब अग्नि उसके शत्रुओं और बाधाओं को दूर करते हैं. वे अपने तेज को स्थापित करते हैं और यज्ञ की मर्यादा की रक्षा करते हैं. जो व्यक्ति नियमपूर्वक अग्नि की उपासना करता है, उसकी समृद्धि में भी वृद्धि होती है.

व्याख्या

ऋषि यहां अग्नि के रक्षक स्वरूप का वर्णन करते हैं. वे बताते हैं कि अग्नि केवल आहुति स्वीकार करने वाले देव नहीं हैं, बल्कि यज्ञ में आने वाले विघ्नों को भी दूर करते हैं. इसी कारण उन्हें यज्ञ का संरक्षक कहा गया है.

मंत्र 7-8

अन्निं विश्वा अभि पृक्ष: सचन्ते समुद्र न ख्रवतः सप्त यद्दी:.
न जामिभिर्वि चिकिते वयो नो विदा देवेषु प्रमतिं चिकित्वान्‌

आ यदिषे नृपतिं तेज आनट्‌ छुचि रेतो निषिक्तं द्यौरभीके.
अग्नि: शर्धमनवद्यं युवानं स्वाध्यं जनयत्सूदयच्च

सरल अर्थ

जिस प्रकार अनेक नदियां समुद्र में जाकर मिलती हैं, उसी प्रकार यज्ञ में अर्पित समस्त हव्य अग्नि तक पहुंचते हैं. अग्नि यजमान को धन, तेज और उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए प्रेरित करते हैं.

व्याख्या

यहां एक सुंदर उपमा दी गई है. जैसे नदियों का अंतिम लक्ष्य समुद्र होता है, वैसे ही यज्ञ की प्रत्येक आहुति अग्नि के माध्यम से अपने उद्देश्य तक पहुंचती है. इसी कारण अग्नि यज्ञ के केंद्र माने गए हैं.

मंत्र 9-10

मनो न यो5ध्वन: सद्य एत्येक: सत्रा सुरो वस्व ईशे.
राजाना मित्रावरुणा सुपाणी गोषु प्रियममृतं रक्षमाणा

मा नो अग्ने सख्या पित्र्याणि प्र मर्षिष्ठा अभि विदुष्कवि:
सन्‌. नभो न रूप॑ं जरिमा मिनाति पुरा तस्या अभिशस्तेरधीहि

सरल अर्थ

ऋषि अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वे अपनी प्राचीन मित्रता को बनाए रखें. वे वर्तमान, भूत और भविष्य सभी को जानने वाले हैं. जिस प्रकार सूर्य अपने प्रकाश से अंधकार को दूर करता है, उसी प्रकार अग्नि भी उपासक को संकटों से बचाएं.

व्याख्या

सूक्त के अंतिम भाग में अग्नि के प्रति आत्मीय भाव प्रकट होता है. यहां केवल स्तुति नहीं, बल्कि विश्वास भी दिखाई देता है. ऋषि अग्नि से उसी प्रकार संरक्षण की कामना करते हैं, जैसे एक सच्चा मित्र अपने मित्र का साथ कभी नहीं छोड़ता.

सूक्त का सार

ऋग्वेद के इस सूक्त में अग्नि को यज्ञ के प्रधान देव, यजमान के हितैषी, धन और समृद्धि देने वाले, शत्रुओं से रक्षा करने वाले तथा देवताओं तक हव्य पहुंचाने वाले देव के रूप में स्मरण किया गया है. श्रद्धा, यज्ञ और अग्नि का परस्पर संबंध इस सूक्त का मुख्य विषय है. साथ ही अग्नि के तेज, उनके संरक्षण और उपासक के प्रति उनकी कृपा का भी सुंदर वर्णन मिलता है. यह सारांश केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 71 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

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