ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 92

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 92. उषा और अश्विनीकुमारों से प्रकाश, अन्न और समृद्धि की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 92 उषा और अश्विनीकुमारों को समर्पित है. इस सूक्त में उषा के प्रकट होने से अंधकार के दूर होने, सूर्य के प्रकाश के फैलने और समस्त प्राणियों के जागने का सुंदर वर्णन मिलता है. उषा को प्रकाश फैलाने वाली, प्राणियों को उनके कार्यों के लिए जागृत करने वाली और यजमान के लिए अन्न तथा धन लाने वाली देवी के रूप में स्मरण किया गया है.

सूक्त के उत्तरार्ध में अश्विनीकुमारों का आह्वान किया गया है. उनसे गायों, अन्न, धन, स्वास्थ्य और सुख प्रदान करने की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 1

मंत्र

एता उ त्या उषसः केतुमक्रत पूर्वे अर्धे रजसो भानुमञ्जते.
निष्कृण्वाना आयुधानीव धृष्णव: प्रति गावो5रुषीर्यन्ति मात

सरल अर्थ

उषाओं ने अंधकार से ढके संसार का ज्ञान कराने वाला प्रकाश किया है. वे आकाश के पूर्व भाग में सूर्य का प्रकाश करती हैं. जैसे आक्रमणशील योद्धा अपने आयुधों को तैयार करते हैं, उसी प्रकार गतिशील, चमकीली और सूर्यप्रकाश उत्पन्न करने वाली उषाएं अपने प्रकाश से संसार का सुधार करती हुई प्रतिदिन आती हैं.

व्याख्या

सूक्त की शुरुआत उषा के प्रकाशमय रूप से होती है. रात के अंधकार के बाद उषा आती है और संसार को प्रकाश में ले आती है. ऋषि उनके आने की तुलना ऐसे योद्धाओं से करते हैं जो अपने कार्य के लिए तैयार होकर आगे बढ़ते हैं.

मंत्र 2

मंत्र

उदपप्तन्नरुणा भानवो वृथा स्वायुजो अरुषीर्गा अयुक्षत.
अक्रन्नुषासो वयुनानि पूर्वथा रुशन्तं भानुमरुषीरशिश्र

सरल अर्थ

चमकती हुई सूर्य की किरणें उदित होती हुई उषा के साथ प्रकट होती हैं. उषा की लालिमा चारों ओर फैलती है और सूर्य की किरणें पहले की तरह आकाश में प्रकाशित होती हैं.

व्याख्या

यहां उषा के साथ सूर्य के उदय का दृश्य सामने आता है. उषा के आने पर लालिमा दिखाई देती है और उसके बाद सूर्य की किरणें संसार को प्रकाशित करती हैं. ऋषि इस प्राकृतिक दृश्य को बहुत सजीव ढंग से प्रस्तुत करते हैं.

मंत्र 3

मंत्र

अर्चन्ति नारीरपसो न विष्टिभि: समानेन योजनेना परावतः.
इषं वहन्तीः सुकृते सुदानवे विश्वेदह यजमानाय सुन्वते

सरल अर्थ

नेतृत्व करने वाली उषाएं श्रेष्ठ कर्म करने वाले और सोमरस निचोड़कर ऋत्विजों को दक्षिणा देने वाले यजमान के लिए सभी प्रकार का अन्न प्रदान करती हैं. वे युद्ध में जाने वाले योद्धाओं के समान अपने प्रकाश द्वारा दूर-दूर तक के देशों को प्रकाशित करती हैं.

व्याख्या

इस मंत्र में उषा के प्रकाश के साथ अन्न और समृद्धि की कामना जुड़ी हुई है. ऋषि उषाओं को यजमान के लिए अन्न प्रदान करने वाली बताते हैं. उनका प्रकाश केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दूर तक फैलता है.

मंत्र 4

मंत्र

अधि पेशांसि वपते नृतूरिवापोर्णुते वक्ष उस्रेव बर्जहम्‌.
ज्योतिर्विश्वस्मै भुवनाय कृण्वती गावो न व्रजं व्युश्षा आव

सरल अर्थ

जिस प्रकार नाई बालों को काट देता है, उसी प्रकार उषाएं संसार से लिपटे हुए काले अंधकार को पूरी तरह नष्ट कर देती हैं. जिस प्रकार गाय दूध निकालते समय अपना धन प्रकट करती है, उसी प्रकार उषाएं अपने सीने को प्रकट करती हैं. वे गोशाला में जाने वाली गायों के समान पूर्व दिशा में आती हैं.

व्याख्या

इस मंत्र में अंधकार के समाप्त होने का बहुत सुंदर चित्र दिया गया है. उषा का प्रकाश धीरे-धीरे रात को हटा देता है. ऋषि उनकी गति की तुलना गोशाला की ओर जाती हुई गायों से करते हैं.

मंत्र 5

मंत्र

प्रत्यर्ची रुशदस्या अदर्शि वि तिष्ठते बाधते कृष्णमभ्वम्‌.
स्वरुं न पेशो विदथेष्वञ्जज्चित्र॑ दिवो दुहिता भानुमश्रेत्‌.

सरल अर्थ

उषा का दीप्तिमान तेज सबसे पहले पूर्व दिशा में दिखाई देता है. इसके बाद वह सभी दिशाओं में फैलकर काले रंग के अंधकार को दूर कर देता है. जैसे अध्वर्यु यज्ञ में यूप को आज्य से प्रकट करते हैं, उसी प्रकार उषा आकाश में अपना रूप दिखाती है और स्वर्गपुत्री बनकर तेजस्वी सूर्य की सेवा करती है.

व्याख्या

उषा के प्रकाश के क्रमिक विस्तार का वर्णन यहां मिलता है. पहले पूर्व दिशा प्रकाशित होती है और फिर प्रकाश चारों ओर फैल जाता है. इस प्रकार उषा अंधकार को हटाकर सूर्य के आने का मार्ग तैयार करती है.

मंत्र 6

मंत्र

अतारिष्म तमसस्पारमस्योषा उच्छन्ती वयुना कृणोति.
श्रिये छन्‍्दो न स्मयते विभाती सुप्रतीका सौमनसायाजी

सरल अर्थ

हम रात के अंधकार के पार आ गए हैं. निशा के अंधकार का नाश करती हुई उषा समस्त प्राणियों को ज्ञान देती है. जिस प्रकार वशीकरण में समर्थ पुरुष धनी के समीप जाकर उसे प्रसन्न करने के लिए हंसता है, उसी प्रकार प्रकाश फैलाती हुई उषा हंसती सी जान पड़ती है. सुंदर शरीर वाली उषाओं ने सबकी प्रसन्नता के लिए अंधकार का भक्षण किया है.

व्याख्या

इस मंत्र में उषा के प्रकाश से अंधकार के पूर्ण अंत का वर्णन है. उषा के आते ही संसार फिर से जागृत होता है और प्राणी अपने कार्यों में लगने लगते हैं.

मंत्र 7

मंत्र

भास्वती नेत्री सूनृतानां दिव: स्तवे दुहिता गोतमेभि:.
प्रजावतो नृवतो अश्वबुध्यानुषो गोअग्रां उप मासि वाजा

सरल अर्थ

हम गौतमवंशी तेजस्विनी और सत्य भाषण प्रिय लोगों का नेतृत्व करने वाली आकाशपुत्री उषा की स्तुति करते हैं. हे उषा. हमें पुत्र, पौत्र, दास, घोड़े और गायों से युक्त अन्न प्रदान करो.

व्याख्या

यहां उषा से सीधे समृद्धि की प्रार्थना की गई है. ऋषि उनसे केवल प्रकाश की नहीं, बल्कि पुत्र, पौत्र, गौ, अश्व और अन्न से सम्पन्न जीवन की कामना करते हैं.

मंत्र 8

मंत्र

उषस्तमश्यां यशसं सुवीरं दासप्रवर्ग रयिमश्वबुध्यम्‌,
सुदंससा श्रवसा या विभासि वाजप्रसूता सुभगे बृहन्तम्‌.

सरल अर्थ

हे उषा. हम यश, वीर पुरुषों, दासों, घोड़ों और सुंदर धन से युक्त अन्न प्राप्त करें. हे शोभन धन वाली उषा. शोभन यश से प्रसन्न होकर हमारे लिए अन्न और पर्याप्त धन प्रदान करो.

व्याख्या

इस मंत्र में उषा से समृद्धि और यश की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि उषा प्रसन्न होकर यजमान को अन्न, धन और वीर पुरुषों से सम्पन्न करें.

मंत्र 9

मंत्र

विश्वानि देवी भुवनाभिचक्ष्या प्रतीची चक्षुरुर्विया वि भाति.
विश्व जीवं चरसे बोधयन्ती विश्वस्य वाचमविदन्मनायो:

सरल अर्थ

उषा देवी समस्त प्राणियों को प्रकाशित करती हुई पूरे संसार में फैलती हैं. वे सभी जीवों को उनके-अपने कार्यों में प्रवृत्त करती हैं और भाषणकुशल लोगों की बातें सुनती हैं.

व्याख्या

उषा का प्रकाश केवल प्रकृति को प्रकाशित नहीं करता, बल्कि समस्त जीवों को जागृत करके उन्हें अपने कार्यों में लगाने वाला बताया गया है. इस प्रकार उषा के आने के साथ संसार की गतिविधियां फिर आरंभ होती हैं.

मंत्र 10

मंत्र

पुनः पुनर्जायमाना पुराणी समान वर्णमभि शुम्भमाना.
श्वघ्नीव कृत्नुर्विज आमिनाना मर्तस्य देवी जरयन्त्यायु

सरल अर्थ

प्रतिदिन बार-बार उत्पन्न होकर समान रूप धारण करने वाली उषाएं सभी मरणधर्मा प्राणियों के जीवन का दिन-प्रतिदिन उसी प्रकार ह्रास करती हैं, जिस प्रकार भिलनी उड़ते हुए पक्षियों के पंख काटकर उनकी गति रोक देती है.

व्याख्या

यहां उषा का एक गंभीर पक्ष सामने आता है. उषा प्रतिदिन नई दिखाई देती हैं, लेकिन प्रत्येक नया दिन मनुष्य की आयु को भी एक दिन कम करता जाता है. इसलिए ऋषि उषा के नियमित आगमन के साथ जीवन के बीतते जाने को भी देखते हैं.

मंत्र 11

मंत्र

व्यूण्वती दिवो अन्ताँ अबोध्यप स्वसारं सनुतर्युयोति.
प्रमिनती मनुष्या युगानि योषा जारस्य चक्षसा वि भाति..

सरल अर्थ

उषाएं आकाश के अंतिम भागों तक अपना प्रकाश फैलाती हैं और अपनी गति से चलती हुई रात को पीछे छोड़ देती हैं. वे मनुष्यों के युगों को समाप्त करती हुई अपने प्रकाश से प्रकट होती हैं.

व्याख्या

इस मंत्र में भी उषा के प्रकाश और समय के बीतने का संबंध दिखाई देता है. प्रत्येक उषा एक नया दिन लेकर आती है, लेकिन साथ ही मनुष्य के जीवन से एक और दिन बीत जाता है.

मंत्र 12

मंत्र

पशूज्न चित्रा सुभगा प्रथाना सिन्धुर्न क्षोद उर्विया व्यश्वैत्‌.
अमिनती दैव्यानि व्रतानि सूर्यस्य चेति रश्मिभिद्दशा

सरल अर्थ

जैसे ग्वाला वन में पशुओं को चरने के लिए फैला देता है, उसी प्रकार सुंदर और पूजनीय उषाएं तेज का विस्तार करती हैं. जैसे बहता हुआ जल नीची जगह पर शीघ्र फैल जाता है, उसी प्रकार उषा सभी संसार को घेर लेती हैं और देवकार्य में बाधा न डालती हुई सूर्य की किरणों के साथ दिखाई देती हैं.

व्याख्या

यहां उषा के प्रकाश के चारों ओर फैलने का वर्णन है. उनकी किरणें धीरे-धीरे समस्त संसार को घेर लेती हैं और सूर्य के प्रकाश के साथ उनका संबंध स्पष्ट दिखाई देता है.

मंत्र 13

मंत्र

उषस्तच्चित्रमा भरास्मभ्यं वाजिनीवति.
येन तोक॑ च तनयं च धामहे..

सरल अर्थ

हे अन्न की स्वामिनी उषाओ. हमें ऐसा विविध धन दो, जिससे हम अपने पुत्रों और पौत्रों का पालन कर सकें.

व्याख्या

इस मंत्र में उषा से परिवार के पालन के लिए पर्याप्त और विविध धन की प्रार्थना की गई है. ऋषि अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए भी समृद्धि चाहते हैं.

मंत्र 14

मंत्र

उषो अद्येह गोमत्यश्वावति विभावरि,
रेवदस्मे व्युच्छ सूनृतावति..

सरल अर्थ

हे उषा. तुम गायों, घोड़ों, सत्यभाषण और तेज से युक्त होकर आज हमारे यज्ञ को प्रकाशित करो और हमें धन से सम्पन्न करो.

व्याख्या

यहां उषा से यज्ञ को प्रकाश देने और धन से सम्पन्न करने की प्रार्थना की गई है. गौ, अश्व, सत्यवाणी और तेज को उषा के साथ जोड़ा गया है.

अश्विनीकुमारों का आह्वान

सूक्त के अंतिम चार मंत्रों में उषा के साथ अश्विनीकुमारों का आह्वान किया गया है. उनसे यजमान के लिए गाय, घोड़े, धन, अन्न और सुख की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 15

मंत्र

युक्ष्वा हि वाजिनीवत्यश्वा अद्यारुणाँ उष:.
अथा नो विश्वा सौभगान्या वह..

सरल अर्थ

हे अश्वों वाली उषा. आज लाल रंग के दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ो और हमारे लिए सभी प्रकार के सौभाग्य लेकर आओ.

व्याख्या

उषा से उनके रथ में लाल घोड़ों को जोड़कर समस्त सौभाग्य अपने साथ लाने की प्रार्थना की गई है. यहां उषा का संबंध समृद्धि और शुभ फल से स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.

मंत्र 16

मंत्र

अश्विना वर्तिरस्मदा गोमहस्रा हिरण्यवत्‌.
अर्वाग्रथं समनसा नि यच्छतम्‌..

सरल अर्थ

हे अश्विनीकुमारों. गायों, घोड़ों और स्वर्ण से युक्त धन लेकर अपने रथ को हमारे समीप लाओ. समान विचार रखते हुए हमारे घर को समृद्ध करने के लिए हमारे पास आओ.

व्याख्या

इस मंत्र में अश्विनीकुमारों से सीधे समृद्धि की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि वे गाय, घोड़े और स्वर्ण से युक्त धन लेकर अपने रथ से उनके घर आएं.

मंत्र 17

मंत्र

यावित्था श्लोकमा दिवो ज्योतिर्जनाय चक्रथु:.
आन ऊर्ज वहतमश्चिना युवम्‌..

सरल अर्थ

हे अश्विनीकुमारों. तुमने आकाश से प्रशंसनीय ज्योति नीचे भेजी है. हमारे लिए बल देने वाला अन्न लेकर आओ.

व्याख्या

अश्विनीकुमारों से यहां प्रकाश और अन्न दोनों की प्रार्थना की गई है. ऋषि उनके दिव्य प्रकाश का स्मरण करते हुए उनसे यजमान के लिए पोषण और शक्ति प्रदान करने का निवेदन करते हैं.

मंत्र 18

मंत्र

एह देवा मयोभुवा दस्रा हिरण्यवर्तनी.
उषर्बुधो वहन्तु सोमपीत

सरल अर्थ

हे देव अश्विनीकुमारों. तुम दान देने वाले, आरोग्य और सुख देने वाले, स्वर्णनिर्मित रथ के स्वामी तथा शत्रुओं का विनाश करने वाले हो. तुम्हारे घोड़े तुम्हें सोमपान के लिए इस यज्ञ में लेकर आएं.

व्याख्या

सूक्त का अंतिम मंत्र अश्विनीकुमारों के आह्वान के साथ समाप्त होता है. ऋषि उनके दानशील, आरोग्यदायक और सुख देने वाले स्वरूप का स्मरण करते हुए उन्हें सोमपान के लिए यज्ञ में आने का निमंत्रण देते हैं. इसके बाद दस्तावेज में सूक्त 93 आरंभ होता है, जिसकी देवता अग्नि एवं सोम हैं.

सूक्त का सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 92 मुख्य रूप से उषा की स्तुति करता है. उषा के आने से रात का अंधकार समाप्त होता है, संसार प्रकाशित होता है और सभी प्राणी अपने-अपने कार्यों में प्रवृत्त होते हैं. उनके प्रकाश को सूर्य के उदय से जोड़ा गया है और उन्हें अन्न तथा धन प्रदान करने वाली देवी के रूप में भी स्मरण किया गया है.

इस सूक्त में उषा के एक महत्वपूर्ण पक्ष की ओर भी ध्यान जाता है. वे प्रतिदिन नई होकर आती हैं, लेकिन उनका प्रत्येक आगमन मनुष्य के जीवन से एक दिन कम होने का भी संकेत देता है. इसलिए उषा के प्रकाश और समय के बीतने का वर्णन एक साथ मिलता है.

सूक्त के अंतिम चार मंत्रों में अश्विनीकुमारों का आह्वान है. उनसे गाय, घोड़े, स्वर्ण, अन्न, बल, स्वास्थ्य और सुख प्रदान करने की प्रार्थना की गई है. इस प्रकार सूक्त 92 में उषा के प्रकाश के साथ जीवन, अन्न, धन और कल्याण की कामना जुड़ी हुई दिखाई देती है.

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