ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 25

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 25. वरुण देव की स्तुति और उनकी कृपा की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 25 वरुण देव को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि वरुण की महिमा का वर्णन करते हुए उनसे क्षमा, संरक्षण, दीर्घायु और कल्याण की प्रार्थना करते हैं. साथ ही उनके ज्ञान, सामर्थ्य और संसार पर उनकी दृष्टि का भी उल्लेख किया गया है.

वरुण के व्रत का पालन

सूक्त के प्रारंभ में ऋषि स्वीकार करते हैं कि संसार के विद्वान भी कभी-कभी वरुण के व्रतों के पालन में भूल कर बैठते हैं.

इसी प्रकार वे स्वयं भी स्वीकार करते हैं कि उनसे प्रतिदिन त्रुटियां होती रहती हैं. इस भाव में विनम्रता दिखाई देती है और मनुष्य अपनी सीमाओं को स्वीकार करता है.

क्रोध से रक्षा की प्रार्थना

ऋषि वरुण से प्रार्थना करते हैं कि वे उन पर क्रोध न करें.

वे कहते हैं कि जो लोग वरुण का अनादर करते हैं, उनके लिए परिणाम शुभ नहीं होता. इसलिए वे प्रार्थना करते हैं कि वरुण उनकी रक्षा करें और उन्हें अपने क्रोध का पात्र न बनाएं.

स्तुति के द्वारा प्रसन्न करने का प्रयास

एक मंत्र में रथ और घोड़े का उदाहरण दिया गया है.

ऋषि कहते हैं कि जिस प्रकार रथ का स्वामी थके हुए घोड़े को स्वस्थ करता है, उसी प्रकार वे अपनी स्तुतियों के द्वारा वरुण को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं.

इसके बाद वे कहते हैं कि जैसे पक्षी तेजी से अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं, उसी प्रकार उनके विचार भी वरुण की ओर अग्रसर होते हैं.

यज्ञ में वरुण का आह्वान

सूक्त में वरुण को शक्तिशाली और अनेक लोगों पर दृष्टि रखने वाला बताया गया है.

ऋषि उन्हें यज्ञ में आमंत्रित करते हैं और उनकी उपस्थिति की कामना करते हैं. साथ ही मित्र और वरुण द्वारा यजमान के अर्पित हवि को स्वीकार करने का भी उल्लेख मिलता है.

पक्षियों, नौकाओं और समय का ज्ञान

सूक्त के कई मंत्र वरुण के व्यापक ज्ञान का वर्णन करते हैं.

कहा गया है कि वे आकाश में उड़ने वाले पक्षियों का मार्ग जानते हैं. वे समुद्र में चलने वाली नौकाओं के मार्ग से भी परिचित हैं.

आगे कहा गया है कि वे बारह महीनों को जानते हैं और तेरहवें मास का भी ज्ञान रखते हैं.

इन मंत्रों में वरुण के सर्वज्ञ स्वरूप का वर्णन मिलता है.

वायु के मार्ग और देवताओं का ज्ञान

ऋषि कहते हैं कि वरुण वायु के मार्ग को जानते हैं.

वे आकाश में स्थित देवताओं से भी परिचित हैं. इससे उनके व्यापक ज्ञान और दृष्टि का वर्णन किया गया है.

वरुण का साम्राज्य

सूक्त में उल्लेख मिलता है कि व्रत धारण करने वाले और उत्तम कर्म करने वाले वरुण दैवी प्रजाओं पर साम्राज्य करने के लिए विराजमान हुए.

इसके बाद कहा गया है कि वे भूत और भविष्य की घटनाओं को जानते हैं तथा मनुष्यों के कर्मों पर दृष्टि रखते हैं.

आयु और उत्तम मार्ग की कामना

ऋषि वरुण से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें उत्तम मार्ग पर चलने वाला बनाएं.

वे उनसे आयु बढ़ाने और कल्याण प्रदान करने की भी कामना करते हैं.

यह प्रार्थना सूक्त के महत्वपूर्ण भावों में से एक है.

स्वर्ण कवचधारी वरुण

एक मंत्र में वरुण के स्वरूप का वर्णन किया गया है.

कहा गया है कि वे स्वर्ण कवच धारण करते हैं और उनके चारों ओर सुनहरी किरणें फैली रहती हैं.

यह वर्णन सूक्त में वरुण की महिमा को प्रकट करता है.

पाप और हिंसा का त्याग

सूक्त में कहा गया है कि हिंसा करने वाले और लोगों को कष्ट देने वाले व्यक्ति वरुण के प्रभाव से अपने अनुचित आचरण को छोड़ देते हैं.

यह भी कहा गया है कि पाप करने वाले लोग उनके प्रति पाप का व्यवहार नहीं करते.

अन्न और जीवन की व्यवस्था

ऋषि कहते हैं कि वरुण ने मनुष्यों की उदरपूर्ति के लिए पर्याप्त अन्न की व्यवस्था की है.

इस प्रकार सूक्त में जीवन के पोषण और निर्वाह का भी उल्लेख मिलता है.

वरुण के दर्शन की अभिलाषा

सूक्त के अंतिम भाग में ऋषि बार-बार वरुण की ओर अपने मन और विचारों के जाने का वर्णन करते हैं.

वे कहते हैं कि जैसे गायें गोशाला की ओर जाती हैं, उसी प्रकार उनके विचार वरुण की ओर बढ़ते हैं.

आगे वे बताते हैं कि उन्होंने वरुण के रथ का दर्शन किया है और उनकी प्रार्थना स्वीकार हुई है.

रक्षा और बंधनों से मुक्ति की प्रार्थना

अंतिम मंत्रों में ऋषि वरुण से अपनी पुकार सुनने की प्रार्थना करते हैं.

वे उनसे सुख, संरक्षण और रक्षा की कामना करते हैं. साथ ही प्रार्थना करते हैं कि वे उनके सिर और कमर के बंधनों को खोल दें ताकि वे जीवन धारण कर सकें.

इन मंत्रों में वरुण की कृपा और संरक्षण प्राप्त करने की गहरी इच्छा व्यक्त होती है.

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