ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 93. अग्नि और सोम की स्तुति तथा यज्ञ की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 93 अग्नि एवं सोम को समर्पित है. इस सूक्त में दोनों देवताओं का एक साथ आह्वान किया गया है. ऋषि उनसे यजमान की स्तुतियां और हवि स्वीकार करने, उसे धन, शक्ति, अन्न और सुरक्षा प्रदान करने तथा उसके यज्ञ को सफल बनाने की प्रार्थना करते हैं.
सूक्त में अग्नि और सोम से जुड़े कई पुराने वैदिक प्रसंगों का भी उल्लेख मिलता है. कहीं उनके द्वारा पणियों से गौओं को छुड़ाने की बात आती है, कहीं इन्द्र के लिए मार्ग तैयार करने और नदियों को मुक्त करने का उल्लेख है. आगे यजमान की रक्षा, उसके यज्ञ की उन्नति, धन और पशुधन की प्राप्ति के लिए प्रार्थना की गई है.
मंत्र 1
मंत्र
अग्नीषोमाविमं सु मे शुणुतं वृषणा हवम्.
प्रति सूक्तानि हर्यतं भवतं दाशुषे मय:..
सरल अर्थ
हे कामनाओं की वर्षा करने वाले अग्नि और सोम. इस हमारे आह्वान को सुनो, हमारी स्तुतियों को स्वीकार करो और हवि देने वाले यजमान को सुख देने वाले बनो.
व्याख्या
सूक्त का आरंभ अग्नि और सोम के संयुक्त आह्वान से होता है. ऋषि उनसे अपनी प्रार्थना सुनने और स्तुतियों को स्वीकार करने का निवेदन करते हैं. साथ ही यजमान के लिए सुख की कामना की गई है.
मंत्र 2
मंत्र
अग्नीषोमा यो अद्य वामिदं वच: सपर्यति.
तस्मै धत्तं सुवीर्य गवां पोषं स्वश्व्यम्.
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. जो यजमान आज तुम्हारी स्तुति-वचनों से पूजा करता है, उसे शक्तिशाली गायें और पुष्ट घोड़े देकर पूर्णजीवन प्राप्त हो.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि और सोम की स्तुति करने वाले यजमान के लिए पशुधन और सामर्थ्य की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि यज्ञ करने वाला व्यक्ति गायों और घोड़ों से सम्पन्न हो.
मंत्र 3
मंत्र
अग्नीषोमा य आहुतिं यो वां दाशाद्धविष्कृतिम्.,
स प्रजया सुवीर्य विश्वमायुर्व्यश्नव
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. जो यजमान तुम्हें घृत की आहुति और हव्य प्रदान करता है, उसे पुत्र-पौत्र आदि से युक्त शक्तिसंपन्न पूर्णजीवन प्राप्त हो.
व्याख्या
यहां भी यजमान के लिए समृद्ध और पूर्ण जीवन की कामना की गई है. घृत और हवि द्वारा अग्नि तथा सोम की सेवा करने वाले यजमान को पुत्र-पौत्र और सामर्थ्य प्राप्त होने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 4
मंत्र
अग्नीषोमा चेति ठद्दीर्य वां यदमुष्णीतमवसं प॒रणिं गा:.
अवातिरतं बृसयस्य शेषो<विन्दतं ज्योतिरेक॑ बहुभ्य
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. हम तुम्हारे उस पुरुष को जानते हैं, जिससे तुमने पणियों के पास से गायों को छीना था और वृत्र अर्थात त्वष्टा के पुत्र को मारकर आकाश में चलते हुए सूर्य को सबके उपकार के लिए पाया था.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि और सोम से जुड़े एक पुराने प्रसंग का उल्लेख किया गया है. इसमें पणियों के पास से गायों को छुड़ाने और वृत्र को मारकर सूर्य को प्राप्त करने की बात कही गई है.
मंत्र 5
मंत्र
युवमेतानि दिवि रोचनान्यग्निश्व सोम सक्रतू अधत्तम्.
युवं सिन्धूँरभिशस्तेरवद्यादग्नीषोमावमुज्चतं गृभी
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. तुम दोनों ने समान कर्ता बनकर इन चमकते हुए नक्षत्रों को आकाश में धारण किया और इन्द्र की ब्रह्महत्या के पाप से युक्त नदियों को उस दोष से छुड़ाया है.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि और सोम के द्वारा आकाश में प्रकाशमान नक्षत्रों को धारण करने और नदियों को दोष से मुक्त करने का वर्णन मिलता है. ऋषि उनके इस कार्य का स्मरण करते हुए उनकी स्तुति करते हैं.
मंत्र 6
मंत्र
आन्यं दिवो मातरिश्वा जभारामथ्नादन्यं परि श्येनो अद्रे:.
अग्नीषोमा ब्रह्मणा वावृधानोरं यज्ञाय चक्रथुरु लोकम्..
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. तुम दोनों में से अग्नि को मातरिश्वा आकाश से और सोम को बाज पक्षी पर्वत से यजमान के लिए बलपूर्वक लेकर आया. तुम दोनों ने स्तोत्रों द्वारा वृद्धि प्राप्त करके देवताओं के लिए पृथ्वी का विस्तार किया.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि और सोम के यज्ञ तक पहुंचने का वर्णन मिलता है. अग्नि को मातरिश्वा द्वारा आकाश से और सोम को बाज द्वारा पर्वत से लाए जाने की बात कही गई है. इसके बाद दोनों के द्वारा देवताओं के लिए पृथ्वी के विस्तार का उल्लेख है.
मंत्र 7
मंत्र
अग्नीषोमा हविष: प्रस्थितस्य वीत॑ हर्यतं वृषणा जुषेथाम्.
सुशर्माणा स्ववसा हि भूतमथा धत्तं यजमानाय शं यो:..
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. यज्ञ के निमित्त दिए गए अन्न का भक्षण करो और उसके बाद हमारी अभिलाषा पूरी करो. हे कामनापूर्तिकर्ता. हमारी सेवा स्वीकार करो, हमारे लिए सुखदाता और रक्षणकर्ता बनो तथा यजमान के रोग दूर करो.
व्याख्या
इस मंत्र में यजमान की ओर से अग्नि और सोम को यज्ञ का अन्न स्वीकार करने का निमंत्रण दिया गया है. साथ ही उनसे यजमान को सुख, रक्षा और रोगों से मुक्ति देने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 8
मंत्र
यो अग्नीषोमा हविषा सपयद्दिवद्रीचा मनसा यो घृतेन.
तस्य व्रतं रक्षत॑ं पातमंहसो विशे जनाय महि शर्म यच्छतम्
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. जो यजमान देवताओं के प्रति भक्तियुक्त मन से तुम दोनों की सेवा करता है, उसके यज्ञकर्म की रक्षा करो, यजमान को पाप से बचाओ तथा यज्ञकार्य में संलग्न उस व्यक्ति को पर्याप्त सुख दो.
व्याख्या
यहां अग्नि और सोम से यजमान के यज्ञ की रक्षा करने की प्रार्थना की गई है. साथ ही उसे पाप से बचाने और सुख प्रदान करने का निवेदन किया गया है.
मंत्र 9
मंत्र
अग्नीषोमा सवेदसा सहूती वनतं गिर:.
सं देवत्रा बभूवथु:..
सरल अर्थ
हे अग्नि और सोम. तुम दोनों समान धन वाले और एक साथ आह्वान करने योग्य हो. हमारी स्तुति सुनो और सभी देवताओं से अधिक प्रसिद्ध हो.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि और सोम के संयुक्त स्वरूप का स्मरण है. ऋषि दोनों को समान रूप से आह्वान करते हुए उनसे अपनी स्तुति सुनने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 10
मंत्र
अग्नीषोमावनेन वां यो वां घृतेन दाशति.
तस्मै दीदयतं बृहत्..
सरल अर्थ
हे अग्नि एवं सोम. जो यजमान तुम्हें घृत से युक्त हवि प्रदान करता है, उसे पर्याप्त धन दो.
व्याख्या
सूक्त का अंतिम मंत्र यजमान के लिए धन की प्रार्थना के साथ समाप्त होता है. ऋषि अग्नि और सोम से कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा से घृतयुक्त हवि अर्पित करता है, उसे पर्याप्त धन प्राप्त हो.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 93 अग्नि और सोम की संयुक्त स्तुति है. इसमें दोनों देवताओं से यज्ञ स्वीकार करने, यजमान को सुख देने, धन, गाय, घोड़े, पुत्र-पौत्र और शक्ति प्रदान करने की प्रार्थना की गई है.
सूक्त के मध्य भाग में अग्नि और सोम से जुड़े वैदिक प्रसंगों का उल्लेख मिलता है. पणियों के पास से गायों को छुड़ाने, वृत्र को मारकर सूर्य को प्राप्त करने, नक्षत्रों को आकाश में धारण करने और नदियों को दोष से मुक्त करने जैसे प्रसंग इसी क्रम में आते हैं.
आगे ऋषि यजमान के यज्ञ की रक्षा, पाप से बचाने, रोग दूर करने और सुख प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं. अंतिम मंत्र में घृतयुक्त हवि देने वाले यजमान के लिए पर्याप्त धन की कामना की गई है. इस प्रकार पूरे सूक्त में अग्नि और सोम के प्रति श्रद्धा के साथ यज्ञ, सुरक्षा, सामर्थ्य, पशुधन और समृद्धि की प्रार्थना दिखाई देती है.