ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 69. अग्नि देव का प्रकाश, पालन और यज्ञ में महत्व
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का यह सूक्त अग्नि देव को समर्पित है. इसमें अग्नि के अनेक स्वरूपों का वर्णन मिलता है. कहीं वे सूर्य के समान समस्त जगत को प्रकाशित करने वाले हैं, कहीं देवताओं के दूत हैं, तो कहीं पिता की भांति उनका पालन करने वाले बताए गए हैं. आगे चलकर ऋषि अग्नि को यज्ञ की रक्षा करने वाले और यजमान के हितैषी के रूप में भी स्मरण करते हैं.
आइए, इस सूक्त के प्रत्येक मंत्र का सरल हिंदी में अर्थ समझते हैं.
मंत्र 1-2
मंत्र
शुक्र: शुशुक्वाँ उषो न जार: पप्रा समीची दिवो न ज्योतिः.
परि प्रजात: क्रत्वा बभूथ भुवो देवानां पिता पुत्र: सन्..
सरल अर्थ
शुभ्र वर्ण वाले अग्नि उषा के जार अर्थात सूर्य के समान समस्त पदार्थों को प्रकाशित करते हैं. वे अपने तेज से पृथ्वी और आकाश को भर देते हैं. प्रकट होकर अपने कर्मों से पूरे संसार में व्याप्त हो जाते हैं. वे देवताओं के दूत होते हुए भी पिता के समान उनका पालन करने वाले हैं.
व्याख्या
सूक्त की शुरुआत अग्नि के तेजस्वी स्वरूप से होती है. ऋषि उनकी तुलना सूर्य से करते हैं, क्योंकि जैसे सूर्य अपने प्रकाश से सब ओर उजाला फैलाता है, वैसे ही अग्नि भी अपने तेज से चारों ओर प्रकाश फैलाते हैं.
इसके साथ ही अग्नि का एक और महत्वपूर्ण स्वरूप सामने आता है. वे देवताओं तक यज्ञ की आहुति पहुंचाने वाले दूत हैं, लेकिन केवल दूत ही नहीं, बल्कि पिता के समान उनका पालन करने वाले भी कहे गए हैं. इस प्रकार एक ही मंत्र में अग्नि के तेज और उनके संरक्षणकारी स्वरूप दोनों का वर्णन मिलता है.
मंत्र 3-4
मंत्र
वेधा अदृप्तो अनग्निर्विजानन्नूधर्न गोनां स्वाद्मा पितूनाम्.
जने न शेव आहूर्य: सन्मध्ये निषत्तो रण्वो दुरोणे..
सरल अर्थ
मेधावी, दर्परहित तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को जानने वाले अग्नि उसी प्रकार समस्त अन्नों को स्वादिष्ट बना देते हैं, जैसे गाय का स्तन दूध प्रदान करता है. यज्ञ में बुलाए जाने पर वे लोकहितकारी पुरुष के समान यज्ञस्थल में आकर विराजमान होते हैं.
व्याख्या
यहां अग्नि के ज्ञान और विनम्रता का वर्णन किया गया है. ऋषि बताते हैं कि अग्नि विवेकशील हैं और कर्तव्य का ज्ञान रखते हैं.
अग्नि की तुलना गाय के स्तन से की गई है, जो पोषण का आधार है. उसी प्रकार अग्नि अन्न को उपयोगी और ग्राह्य बनाते हैं. जब यज्ञ में उनका आह्वान किया जाता है, तब वे यज्ञस्थल में उपस्थित होकर उसे शोभा और मंगल प्रदान करते हैं.
मंत्र 5-6
मंत्र
पुत्रो न जातो रण्वो दुरोणे वाजी न प्रीतो विशो वि तारीत्.
विशो यदल्ले नृभि सनीव्ठा अनिनिर्देवत्वा विश्वन्यश्या:..
सरल अर्थ
यज्ञगृह में प्रकट होकर अग्नि पुत्र के समान आनंद देने वाले हैं. प्रसन्न होकर वे संग्राम में अश्व के समान शत्रुओं को दूर भगाते हैं. जब ऋषि मिलकर देवताओं का आह्वान करते हैं, तब अग्नि स्वयं उन देवताओं का स्वरूप धारण कर लेते हैं.
व्याख्या
इन मंत्रों में अग्नि के दो रूप सामने आते हैं. एक ओर वे यज्ञगृह में आनंद और मंगल का वातावरण बनाते हैं, तो दूसरी ओर आवश्यकता पड़ने पर शत्रुओं को दूर करने वाले बलवान अश्व के समान कार्य करते हैं.
ऋषि यह भी बताते हैं कि देवताओं के आह्वान में अग्नि की विशेष भूमिका है. यज्ञ के माध्यम से देवताओं तक पहुंचने का कार्य अग्नि ही करते हैं.
मंत्र 7-8
मंत्र
नविष्ट एता व्रता मिनन्ति नृभ्यो यदेभ्य: श्रुष्टिं चकर्थ.
तत्तु ते दंसो यदहन्त्समानैर्न भिर्यद्युक्तो विवे रपांसि..
सरल अर्थ
हे अग्नि. राक्षस आदि बाधक तुमसे संबंधित यज्ञों का विनाश नहीं कर पाते, क्योंकि तुम यज्ञ करने वालों को उनके कर्मों का सुखद फल प्रदान करते हो. यदि कोई यज्ञ में विघ्न उत्पन्न करता है, तो तुम अपने साथी मरुद्गणों के साथ मिलकर उन बाधाओं को दूर कर देते हो.
व्याख्या
अब ऋषि अग्नि से यज्ञ की रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं. वे कहते हैं कि जो लोग श्रद्धा से यज्ञ करते हैं, उनकी रक्षा अग्नि स्वयं करते हैं.
यदि यज्ञ में कोई बाधा उत्पन्न होती है, तो अग्नि मरुद्गणों के साथ मिलकर उन विघ्नों को दूर करते हैं. इस प्रकार अग्नि को यज्ञ के संरक्षक के रूप में भी देखा गया है.
मंत्र 9-10
मंत्र
उषो न जारो विभावोस्र: संज्ञातरूपश्चिकेतदस्मै.
त्मना वहन्तो दुरो व्यूण्वन्नवन्त विश्वे स्व दुशीके..
सरल अर्थ
उषा के जार सूर्य के समान प्रकाशयुक्त, निवास योग्य तथा सबके द्वारा ज्ञात स्वरूप वाले अग्नि यजमान को जानते हैं. उनकी किरणें स्वयं हव्य को वहन करती हुई यज्ञगृह के द्वारों को व्याप्त करती हैं और आकाश में फैलती हैं.
व्याख्या
सूक्त के अंतिम मंत्रों में फिर से अग्नि के प्रकाशमय स्वरूप का वर्णन मिलता है. ऋषि बताते हैं कि अग्नि यजमान को जानते हैं और यज्ञ में अर्पित हव्य को अपने माध्यम से आगे ले जाते हैं.
उनका प्रकाश केवल यज्ञकुंड तक सीमित नहीं रहता, बल्कि चारों ओर फैलकर यज्ञस्थल को प्रकाशित करता है. इसी के साथ यह सूक्त अग्नि के तेज, उनकी उपस्थिति और यज्ञ में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका का स्मरण कराते हुए पूर्ण होता है.