ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 28. इन्द्र के लिए सोम तैयार करने का वर्णन
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 28 “इन्द्र आदि” देवताओं को समर्पित है. इस सूक्त में मुख्य रूप से सोम तैयार करने की प्रक्रिया का वर्णन मिलता है. ऋषि यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली ओखली, मूसल और सोम को निचोड़ने वाले पत्थरों का उल्लेख करते हुए इन्द्र के लिए सोम तैयार करने की बात करते हैं.
सूक्त के मंत्रों में यज्ञ की उस व्यवस्था का चित्र दिखाई देता है जिसमें सोम को तैयार करके देवताओं के लिए अर्पित किया जाता था.
सोम तैयार करने की व्यवस्था
सूक्त के प्रारंभिक मंत्रों में उन साधनों का वर्णन मिलता है जिनकी सहायता से सोम तैयार किया जाता है.
ऋषि ओखली और मूसल का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि जहां सोम को निचोड़ने और तैयार करने का कार्य किया जाता है, वहां सोमरस को तैयार किया जाए.
इन मंत्रों में यज्ञ के दौरान होने वाली तैयारियों का सीधा वर्णन मिलता है.
सोम को निचोड़ने वाले पत्थर
सूक्त में सोम को निचोड़ने के लिए उपयोग किए जाने वाले पत्थरों का भी उल्लेख है.
ऋषि बताते हैं कि जिस यज्ञ में पत्थरों को फैलाकर सोम तैयार किया जाता है, वहां सोमरस को उचित रूप से तैयार किया जाए.
इन मंत्रों से पता चलता है कि सोम की तैयारी यज्ञ का महत्वपूर्ण भाग थी और उसके लिए विशेष साधनों का उपयोग किया जाता था.
ओखली और मूसल का वर्णन
आगे के मंत्रों में ओखली और मूसल का बार-बार उल्लेख मिलता है.
ऋषि कहते हैं कि जिस प्रकार घर-घर में ओखली का उपयोग किया जाता है, उसी प्रकार यज्ञ में भी उसका महत्वपूर्ण स्थान है.
मूसल द्वारा सोम को तैयार करने और उसे यज्ञ के योग्य बनाने का वर्णन इन मंत्रों में मिलता है.
इन्द्र के लिए सोम अर्पण
सूक्त में कई स्थानों पर इन्द्र का उल्लेख किया गया है.
ऋषि प्रार्थना करते हैं कि तैयार किया गया सोम इन्द्र तक पहुंचे और उन्हें प्रसन्न करे.
सोम की तैयारी का उद्देश्य केवल उसका निर्माण करना नहीं बल्कि उसे देवताओं, विशेष रूप से इन्द्र, के लिए अर्पित करना भी है.
यज्ञ की ध्वनियां और गतिविधियां
सूक्त में यज्ञ के समय होने वाली गतिविधियों का भी वर्णन मिलता है.
सोम तैयार करने के दौरान उत्पन्न होने वाली ध्वनियों और कार्यों का उल्लेख किया गया है. इससे यज्ञ के वातावरण की एक झलक मिलती है.
ऋषि उन उपकरणों और कर्मों का वर्णन करते हैं जो यज्ञ को पूर्ण करने में सहायक होते हैं.
सोम पात्र और यज्ञ सामग्री
मंत्रों में सोम पात्रों का भी उल्लेख मिलता है.
सोमरस को तैयार करने के बाद उसे पात्रों में रखने और यज्ञ की प्रक्रिया में उपयोग करने की बात कही गई है.
इससे ज्ञात होता है कि सोम की तैयारी से लेकर उसके अर्पण तक की संपूर्ण व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना गया था.
इन्द्र को आमंत्रण
सूक्त के अंतिम भाग में इन्द्र को सोम ग्रहण करने के लिए आमंत्रित किया गया है.
ऋषि चाहते हैं कि इन्द्र यज्ञ में उपस्थित हों और उनके लिए तैयार किया गया सोम स्वीकार करें. इसी उद्देश्य से बार-बार सोम की तैयारी और उसके अर्पण का उल्लेख किया गया है.
पूरे सूक्त में यज्ञ की तैयारी, सोम निर्माण और इन्द्र को अर्पण की प्रक्रिया का वर्णन प्रमुख रूप से दिखाई देता है. इसमें ओखली, मूसल, पत्थरों और सोम पात्रों का उल्लेख यज्ञ की उस परंपरा को सामने लाता है जिसके माध्यम से देवताओं को हवि और सोम अर्पित किए जाते थे.