ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 26: अग्नि देव से यज्ञ में आने और कृपा करने की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 26 अग्नि देव को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि अग्नि का आह्वान करते हैं और उनसे यज्ञ में उपस्थित होकर यजमान को धन, कल्याण और देवकृपा प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं. सूक्त में अग्नि की महिमा का वर्णन करते हुए उन्हें देवताओं तक यज्ञ पहुंचाने वाला और मनुष्यों का हित करने वाला बताया गया है.
धन और कल्याण देने वाले अग्नि
सूक्त के प्रारंभ में अग्नि से प्रार्थना की गई है कि वे धन के योग्य धन के पालक बनें और अपना तेज धारण करके यजमान का कल्याण करें.
ऋषि अग्नि को महान यश वाले, सत्य का पालन करने वाले तथा ज्ञानवान व्यक्तियों द्वारा स्तुति किए जाने योग्य बताते हैं. वे चाहते हैं कि अग्नि उनके लिए मंगलकारी बनें.
देवताओं तक यज्ञ पहुंचाने वाले अग्नि
सूक्त में कहा गया है कि अग्नि देवताओं तक यज्ञ पहुंचाने वाले हैं. इसी कारण ऋषि उन्हें यज्ञ में उपस्थित होने के लिए आमंत्रित करते हैं.
जिस प्रकार वे अनेक यज्ञों में देवताओं को लाते हैं, उसी प्रकार इस यज्ञ में भी आने की प्रार्थना की गई है. उनसे निवेदन किया गया है कि वे यजमान और उसके परिवार पर कृपा करें.
स्तुति सुनने की प्रार्थना
ऋषि अग्नि से कहते हैं कि वे उनकी स्तुतियों को सुनें और प्रसन्न हों.
मंत्रों में यह भाव व्यक्त होता है कि अग्नि यज्ञ में अर्पित हवि को स्वीकार करें और यजमान के प्रति अनुकूल रहें. साथ ही उनसे यह भी कहा गया है कि वे मित्र और वरुण सहित अन्य देवताओं को भी यज्ञ में लेकर आएं.
यज्ञ के संरक्षक अग्नि
सूक्त में अग्नि को यज्ञ का संरक्षक बताया गया है.
वे यज्ञ को सफल बनाने वाले, प्रसन्नता प्रदान करने वाले और यजमान के लिए हितकारी हैं. ऋषि उनसे निवेदन करते हैं कि वे यज्ञ में उपस्थित होकर उसे पूर्णता प्रदान करें.
अग्नि की सहायता और कृपा
ऋषि अग्नि से सहायता की कामना करते हैं. वे कहते हैं कि अग्नि अपने प्रिय जनों के साथ आएं और यजमान को अनुग्रह प्रदान करें.
सूक्त में यह भी कहा गया है कि अग्नि की कृपा से मनुष्य की उत्तम इच्छाएं पूर्ण हो सकती हैं और उसका कार्य सफल हो सकता है.
अग्नि की ओर समर्पण
सूक्त के अंतिम मंत्रों में ऋषि अग्नि को अमर और मनुष्यों द्वारा पूजनीय बताते हैं.
वे अग्नि की स्तुति करते हुए उनसे यज्ञ और स्तुतियों को स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं. साथ ही उनसे निवेदन करते हैं कि वे अपने सहयोगियों सहित यज्ञ में आएं और यजमान को कल्याण प्रदान करें.