अथर्ववेद कांड 1 (भाग 10) : एक व्यापक दृष्टि की ओर संकेत
जहाँ सब कुछ एक साथ दिखाई देता है
अब तक जो अलग-अलग रूपों में सामने आता रहा – वाणी, प्रवाह, ऊर्जा, शरीर, संतुलन, प्रकृति और शक्ति – वह यहाँ आकर जैसे एक साथ दिखाई देने लगता है.
यह कोई नया विषय नहीं लाता बल्कि जो पहले से था, उसे एक व्यापक दृष्टि में रख देता है.
ऐसा लगता है कि जो कुछ अलग-अलग समझ में आ रहा था, वह वास्तव में एक ही प्रक्रिया के अलग रूप थे.
सूक्तों का भाव
इन सूक्तों में कोई एक केंद्र नहीं दिखाई देता. बल्कि कई दिशाएँ एक साथ खुलती हैं.
कहीं संरक्षण है,
कहीं संतुलन,
कहीं प्रार्थना,
और कहीं केवल एक शांत स्वीकार.
यहाँ शब्द पहले की तुलना में कम आग्रहपूर्ण लगते हैं. जैसे अब कुछ पाने की कोशिश नहीं है, बल्कि जो है, उसे देखना है.
एक साथ जुड़ती हुई धारा
यदि पूरे कांड की ओर देखा जाए, तो एक धारा स्पष्ट होती है.
शुरुआत अभिव्यक्ति से हुई थी.
फिर जीवन की स्थितियाँ आईं.
फिर प्रवाह, ऊर्जा और शरीर.
फिर संतुलन, प्रकृति और शक्ति.
और अब यह सब एक साथ दिखाई देता है यह क्रम रेखीय नहीं है, लेकिन जुड़ा हुआ है यदि इसे एक बिंदु से देखा जाए, तो सब कुछ उसी से निकलता हुआ प्रतीत होता है.
अनुभव और समझ
इन सूक्तों को पढ़ते समय यह भी महसूस होता है कि समझ केवल शब्दों से नहीं आती कुछ बातें अनुभव के स्तर पर ही स्पष्ट होती हैं और शायद इसी कारण यहाँ कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया गया यह खुला रहता है.
पहले की दिशा से संबंध
यदि प्रारंभ की ओर लौटकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि जहाँ से शब्द उठते हैं, वहीं से यह पूरी यात्रा भी शुरू होती है और अंत में फिर वही स्थान दिखाई देता है – थोड़ा अधिक स्पष्ट, लेकिन फिर भी पूरी तरह परिभाषित नहीं.
संतुलन की पूर्णता
संतुलन की जो बात बीच में आई थी, वह यहाँ एक स्थिर रूप लेती है अब यह किसी एक स्तर तक सीमित नहीं है यह जीवन के हर स्तर पर उपस्थित है.
शरीर में,
विचार में,
प्रकृति में,
और उस संबंध में जो इन सबको जोड़ता है.
एक शांत ठहराव
शायद यहाँ रुकने की आवश्यकता नहीं है और शायद आगे बढ़ने की भी नहीं बस जो है, उसे देखना पर्याप्त हो सकता है.
इस कांड की दिशा
अथर्ववेद कांड 1 को यदि एक साथ देखा जाए, तो यह किसी एक विषय का विस्तार नहीं है यह जीवन के विभिन्न पक्षों को एक साथ देखने का एक तरीका है.
यह सिखाता नहीं,
यह दिखाता है.
और जो दिखता है, वह हर बार थोड़ा अलग हो सकता है.
संदर्भ
अथर्ववेद संहिता – कांड 1, सूक्त 31–35