ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 109. इंद्र और अग्नि से धन, संतान और रक्षा की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 109 इंद्र और अग्नि को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि दोनों देवताओं को अपने निकट मानते हुए उनसे धन, संतान, यज्ञ में प्रसन्नता और युद्ध के समय रक्षा की प्रार्थना करते हैं.
सूक्त की शुरुआत बहुत व्यक्तिगत भाव से होती है. ऋषि इंद्र और अग्नि को अपने जाति या बंधु के समान मानते हुए कहते हैं कि उनकी उत्तम बुद्धि किसी अन्य की दी हुई नहीं है. इसी बुद्धि से वे इंद्र और अग्नि की श्रद्धा तथा ध्यान से युक्त स्तुति करते हैं.
आगे इंद्र और अग्नि को अधिक धन देने वाले देवताओं के रूप में संबोधित किया गया है. ऋषि उनसे ऐसी समृद्धि की कामना करते हैं जो सामान्य धन देने वालों से भी अधिक हो. साथ ही पुत्र-पौत्रों की परंपरा बनी रहे और पितरों को शक्ति देने वाली संतान उत्पन्न हो, ऐसी प्रार्थना भी की गई है.
सूक्त के आगे के मंत्रों में सोमपान का उल्लेख आता है. ऋषि इंद्र और अग्नि से प्रसन्न होकर सोम ग्रहण करने का निवेदन करते हैं. इसके साथ उनके द्वारा किए गए वीरतापूर्ण कार्यों और युद्ध में सहायता करने वाले स्वरूप का स्मरण किया गया है.
मंत्र 1
मंत्र
वि हाख्यं मनसा वस्य इच्छन्निन्द्राग्नी ज्ञास उत वा सजातान्.
नान्या युवत्प्रमतिरस्ति महां स वां धियं वाजयन्तीमतक्ष
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र और अग्नि. धन की कामना करते हुए मैं तुम्हें जाति या बंधु के समान समझता हूं. मेरी उत्तम बुद्धि तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य की दी हुई नहीं है. उसी बुद्धि से मैंने तुम्हारी अनच्छेदपूर्ण एवं ध्यानयुक्त स्तुति की है.
सरल व्याख्या
सूक्त की शुरुआत किसी दूर के देवता से सामान्य प्रार्थना के बजाय बहुत आत्मीय भाव से होती है. ऋषि इंद्र और अग्नि को अपने जाति या बंधु के समान मानते हैं.
वे अपनी बुद्धि को भी उन्हीं से प्राप्त मानते हैं और उसी बुद्धि के आधार पर दोनों देवताओं की श्रद्धापूर्वक और ध्यानपूर्वक स्तुति करने की बात कहते हैं.
मंत्र 2
मंत्र
अश्रवं हि भूरिदावत्तरा वां विजामातुरुत वा घा स्यालात्.
अथा सोमस्य प्रयती युवभ्यामिन्द्राग्नी स्तोमं जनयामि नव्य
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र और अग्नि. गुणहीन जामाता कन्यालाभ के लिए अथवा गुणहीन कन्या का भाई उत्तम वर लाभ के लिए जितना धन देते हैं, तुम उससे भी अधिक देने वाले हो, यह मैंने सुना है. इसलिए तुमको निचोड़े हुए सोम देने के साथ ही यह अतिशय नवीन स्तुति भी निर्मित करता हूं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र और अग्नि की धन देने की क्षमता की तुलना सामान्य रूप से दिए जाने वाले धन से की गई है. ऋषि कहते हैं कि उन्होंने सुना है कि दोनों देवता उससे भी अधिक धन देने वाले हैं.
इसी विश्वास के कारण ऋषि उनके लिए सोम अर्पित करते हुए एक नई स्तुति भी प्रस्तुत करते हैं.
मंत्र 3
मंत्र
मा च्छेद्य रश्मीरिति नाधमाना: पितृणां शक्तीरनुयच्छमाना:.
इन्द्राग्निभ्यां कं वृषणो मदन्ति ता हांद्री धिषणाया उपस्थे
सरल हिंदी अर्थ
रूपी के समान लंबी पुत्र-पौत्र परंपरा को हम कभी छिन्न न करें, ऐसी प्रार्थना करते हुए एवं पितरों को शक्ति देने वाले पुत्र-पौत्रादि को उत्पन्न करते हुए हम यजमान इंद्र एवं अग्नि की सुखपूर्वक स्तुति करते हैं. शत्रुओं का नाश करते हुए इंद्र और अग्नि इस स्तुति के समीप रहें.
सरल व्याख्या
यह मंत्र परिवार और पीढ़ियों की निरंतरता की कामना से जुड़ा है. ऋषि चाहते हैं कि पुत्र और पौत्रों की परंपरा कभी समाप्त न हो और पितरों को शक्ति देने वाली संतान उत्पन्न होती रहे.
इसी भावना के साथ यजमान इंद्र और अग्नि की स्तुति करते हैं और उनसे शत्रुओं का नाश करते हुए इस स्तुति के समीप रहने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 4
मंत्र
युवाभ्यां देवी धिषणा मदायेन्द्राग्गी सोममुशती सुनोति.
तावश्चिना भद्रहस्ता सुपाणी आ धावतं मधुना पृड्क्तमप्सु.
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र और अग्नि. तुम्हारी प्रसन्नता के लिए हम तेजस्वी एवं तुम्हारी कामना से पूर्ण प्रार्थना करते हुए सोमरस निचोड़ते हैं. हे अक्षसंपन्न शोभनबाहुयुक्त एवं सुंदर हाथों वाले इंद्र और अग्नि. शीघ्र आओ एवं जल में वर्तमान माधुर्य से हमारे सोम को संपन्न करो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में यज्ञ के दौरान सोम निचोड़ने का प्रसंग सामने आता है. ऋषि कहते हैं कि इंद्र और अग्नि की प्रसन्नता के लिए सोम तैयार किया जा रहा है.
दोनों देवताओं को सुंदर हाथों और शोभन बाहुओं वाले रूप में संबोधित करते हुए उनसे शीघ्र आने और सोम को मधुरता से संपन्न करने का निवेदन किया गया है.
मंत्र 5
मंत्र
युवामिन्द्राग्नी वसुनो विभागे तवस्तमा शुश्रव वृत्रहत्ये.
तावायद्या बर्हिषि यज्ञे अस्मिन्प्र चर्षणी मादयेथां सुत
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र और अग्नि. हमने सुना है कि स्तोताओं को धन बांटने के अभिप्राय से तुमने वृत्रवध में अतिशय बल का प्रदर्शन किया था. हे सबको देखने वाले. तुम हमारे यज्ञ में कुशों पर बैठकर एवं निचोड़े हुए सोम को पीकर प्रसन्न बनो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र और अग्नि के उस स्वरूप का स्मरण किया गया है जिसमें वे स्तोताओं के लिए धन बांटने और वृत्रवध के समय अपना बल दिखाने वाले हैं.
ऋषि दोनों देवताओं से यज्ञ में कुशों पर बैठने और निचोड़े हुए सोम का पान करके प्रसन्न होने का आग्रह करते हैं.
मंत्र 6
मंत्र
प्र चर्षणिभ्य: पृतनाहवेषु प्र पृथिव्या रिरीचाथे दिवश्व.
प्र सिन्धुभ्य: प्र गिरिभ्यो महित्वा प्रेन्द्राग्नी विश्वा भुवनात्यन्या
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र और अग्नि. संग्राम में रक्षा के उद्देश्य से बुलाए जाने पर तुम सभी मनुष्यों की अपेक्षा महान बनते हो. तुम धरती, आकाश, नदी एवं पर्वतों की अपेक्षा महान बनते हो. तुम समस्त विश्व की अपेक्षा महान हो.
सरल व्याख्या
यहां इंद्र और अग्नि के विशाल और सामर्थ्यवान स्वरूप का वर्णन है. युद्ध में रक्षा के लिए बुलाए जाने पर उन्हें सभी मनुष्यों से महान बताया गया है.
मंत्र आगे पृथ्वी, आकाश, नदियों, पर्वतों और पूरे विश्व की तुलना में भी उनके महान होने की बात करता है.
मंत्र 7
मंत्र
आ भरतं शिक्षतं वज्बाहू अस्माँ इन्द्राग्नी अवतं शचीभि:.
इमे नु ते रश्मय: सूर्यस्य येभि: सपित्वं पितरो न आसन्..
सरल हिंदी अर्थ
हे वज्रबाहु इंद्र एवं अग्नि. धन लाओ, हमें दो एवं अपने कार्यों के द्वारा हमारी रक्षा करो. सूर्य की जिन रश्मियों द्वारा हमारे पूर्व पुरुष ब्रह्मलोक को गए थे, वे ये ही हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में ऋषि इंद्र और अग्नि से धन देने और अपने कार्यों के द्वारा रक्षा करने की सीधी प्रार्थना करते हैं.
इसके बाद सूर्य की किरणों का उल्लेख आता है. इन्हीं किरणों के माध्यम से पूर्व पुरुषों के ब्रह्मलोक को जाने की बात कही गई है.
मंत्र 8
मंत्र
पुरंदरा शिक्षतं वजहस्तास्माँ इन्द्राग्गी अवतं भरेषु,
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति:ः सिन्धु: पृथिवी उत द्याौ
सरल हिंदी अर्थ
हे वज्रहस्त एवं असुरनाशक इंद्र और अग्नि. हमें धन दो एवं युद्धों में हमारी रक्षा करो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारी इस प्रार्थना की पूजा करें.
सरल व्याख्या
सूक्त के अंतिम मंत्र में इंद्र और अग्नि को वज्रहस्त तथा असुरनाशक कहा गया है. ऋषि उनसे धन देने और युद्धों में रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं.
अंत में मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है और उनसे इस प्रार्थना की पूजा करने की कामना की गई है.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 109 इंद्र और अग्नि के प्रति आत्मीयता, श्रद्धा और प्रार्थना का सूक्त है. शुरुआत में ऋषि दोनों देवताओं को अपने जाति या बंधु के समान मानते हैं और अपनी बुद्धि को उनके अतिरिक्त किसी अन्य की दी हुई नहीं बताते. इसी बुद्धि से वे उनकी स्तुति करते हैं.
सूक्त के दूसरे मंत्र में इंद्र और अग्नि की धन देने वाली शक्ति का उल्लेख है. ऋषि कहते हैं कि दोनों देवता सामान्य रूप से दिए जाने वाले धन से भी अधिक देने वाले हैं. इसी विश्वास के साथ उनके लिए सोम अर्पित करते हुए नई स्तुति की जाती है.
तीसरे मंत्र में पुत्र और पौत्रों की निरंतर परंपरा की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि यह परंपरा कभी न टूटे और पितरों को शक्ति देने वाली संतान उत्पन्न होती रहे. साथ ही इंद्र और अग्नि से शत्रुओं का नाश करते हुए उनके समीप रहने की प्रार्थना की गई है.
चौथे और पांचवें मंत्र में यज्ञ और सोमपान का प्रसंग आता है. इंद्र और अग्नि की प्रसन्नता के लिए सोम निचोड़ने तथा दोनों देवताओं से यज्ञ में आकर सोमपान करने का निवेदन किया गया है. पांचवें मंत्र में उनके द्वारा वृत्रवध के समय प्रदर्शित बल और स्तोताओं को धन देने का भी उल्लेख है.
छठे मंत्र में इंद्र और अग्नि के महान सामर्थ्य का वर्णन है. संग्राम में रक्षा के लिए बुलाए जाने पर उन्हें मनुष्यों, पृथ्वी, आकाश, नदियों, पर्वतों और यहां तक कि समस्त विश्व से भी महान बताया गया है.
सातवें मंत्र में इंद्र और अग्नि से धन देने तथा अपने कार्यों के द्वारा रक्षा करने की प्रार्थना की गई है. इसी मंत्र में सूर्य की उन रश्मियों का उल्लेख है जिनके द्वारा पूर्व पुरुषों के ब्रह्मलोक को जाने की बात कही गई है.
अंतिम मंत्र में इंद्र और अग्नि को वज्रहस्त और असुरनाशक कहा गया है. उनसे धन और युद्ध में रक्षा की प्रार्थना करने के बाद मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है.