ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 76

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 76. अग्नि देव का आह्वान और यज्ञ की रक्षा

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 76 अग्नि देव को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि अग्नि के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनसे यह जानना चाहते हैं कि उनकी उपासना किस प्रकार की जाए जिससे वे प्रसन्न हों. इसके बाद वे अग्नि को यज्ञ में आमंत्रित करते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे देवताओं तक हव्य पहुंचाएं, यज्ञ को विघ्नों से सुरक्षित रखें और यजमान के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें.

पूरे सूक्त में अग्नि को केवल यज्ञ की अग्नि नहीं, बल्कि देवताओं और मनुष्यों के बीच सेतु, यज्ञ के संरक्षक और शुभ कर्मों को पूर्ण करने वाले देव के रूप में चित्रित किया गया है. यहां दी गई व्याख्या केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 76 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

मंत्र 1

मंत्र

का ते उपेतिर्मनसो वराय भुवद्वरे शंतमा का मनीषा.
को वा यज्ञैः परि दक्षं ते आप केन वा ते मनसा दाशेम..

सरल अर्थ

हे अग्नि. हमारे प्रति तुम्हारा मन प्रसन्न करने का क्या उपाय है. कौन-सी स्तुति तुम्हें प्रिय है. तुम्हारी महिमा के अनुरूप यज्ञ कौन कर सकता है और किस भाव से तुम्हें हव्य अर्पित करना चाहिए.

ऋषि सूक्त की शुरुआत किसी वरदान की याचना से नहीं करते, बल्कि अग्नि को प्रसन्न करने का सही मार्ग जानना चाहते हैं. यह प्रश्न बताता है कि वैदिक परंपरा में केवल कर्म करना पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि उसके पीछे की श्रद्धा, भावना और विधि भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी गई है.

मंत्र 2

मंत्र

एह्ाग्न इह होता नि षीदादब्ध: सु पुरएता भवा नः.
अवतां त्वा रोदसी विश्वमिन्वे यजा महे सौमनसाय देवान्‌..

सरल अर्थ

हे अग्नि. इस यज्ञ में आकर होतारूप में विराजमान होओ. हमारी रक्षा करते हुए देवताओं के श्रेष्ठ अग्रदूत बनो. आकाश और पृथ्वी के संरक्षण में रहकर देवताओं की प्रसन्नता के लिए हव्य अर्पित करो.

अब ऋषि अग्नि का यज्ञ में स्वागत करते हैं. वे चाहते हैं कि अग्नि स्वयं यज्ञ का संचालन करें और देवताओं तक आहुति पहुंचाएं. यही कारण है कि प्रत्येक वैदिक यज्ञ में सबसे पहले अग्नि का आह्वान किया जाता है, क्योंकि उनके बिना देवताओं तक हव्य पहुंचना संभव नहीं माना गया है.

मंत्र 3

मंत्र

प्र सु विश्वात्रक्षसो धक्ष्यग्ने भवा यज्ञानामभिशस्तिपावा.
अथा वह सोमपतिं हरिभ्यामातिथ्यमस्मै चकृमा सुदाव्ने.

सरल अर्थ

हे अग्नि. सभी राक्षसों और विघ्नों को दूर रखकर यज्ञ की रक्षा करो. सोमपान करने वाले इंद्र को उनके हरि अश्वों सहित इस यज्ञ में लेकर आओ, क्योंकि हम उनका आदरपूर्वक स्वागत करना चाहते हैं.

यहां सूक्त का भाव और स्पष्ट हो जाता है. अग्नि केवल देवताओं तक संदेश पहुंचाने वाले दूत ही नहीं हैं, बल्कि यज्ञ के रक्षक भी हैं. ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि यज्ञ में किसी प्रकार का विघ्न न आए और देवताओं का आगमन मंगलपूर्वक हो.

मंत्र 4

मंत्र

प्रजावता वचसा वह्लिरासा च हुवे नि च सत्सीह देवै:.
वेषि होत्रमुत पोत्रं यजत्र बोधि प्रयन्तर्जनितर्वसूना

सरल अर्थ

मैं मुख द्वारा हव्य ग्रहण करने वाले अग्नि का आह्वान करता हूं. तुम यज्ञ में अन्य देवताओं के साथ विराजमान होकर होतृ और पोतृ का कार्य करो. तुम धन के स्वामी और सबके उत्पन्न करने वाले बनकर हमें जागृत करो.

इस मंत्र में अग्नि के अनेक उत्तरदायित्वों का वर्णन मिलता है. वे हव्य को स्वीकार करते हैं, यज्ञ का संचालन करते हैं और यजमान के लिए देवताओं तक प्रार्थना पहुंचाते हैं. इसलिए अग्नि को पूरे यज्ञ का आधार माना गया है.

मंत्र 5

मंत्र

यथा विप्रस्य मनुषो हविर्भिर्देवाँ अयज: कविभि: कवि: सन्‌.
एवा होतः सत्यतर त्वमद्याग्ने मन्द्रया जुह्नदा यजस्व.

सरल अर्थ

हे अग्नि. जैसे तुम मेधावी ऋषियों के साथ मिलकर यज्ञ में देवताओं को हव्य अर्पित करते हो, उसी प्रकार आज भी इस यज्ञ को सफल बनाओ और देवताओं को आनंद देने वाले घृतयुक्त हव्य अर्पित करो.

सूक्त का समापन भी प्रार्थना के साथ होता है. ऋषि चाहते हैं कि जिस प्रकार पूर्वकाल में अग्नि ने ऋषियों के यज्ञों को पूर्ण किया, उसी प्रकार वे इस यज्ञ को भी सफल बनाएं. इस अंतिम मंत्र में अग्नि के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आत्मीयता तीनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं.

सूक्त का सार

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 76 अग्नि के प्रति श्रद्धा और विश्वास का सुंदर उदाहरण है. इसमें ऋषि पहले यह जानना चाहते हैं कि अग्नि को किस प्रकार प्रसन्न किया जाए. इसके बाद वे उन्हें यज्ञ में आमंत्रित करते हैं, देवताओं तक हव्य पहुंचाने का निवेदन करते हैं और यज्ञ को सभी विघ्नों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना करते हैं.

सूक्त में अग्नि को देवताओं के दूत, यज्ञ के रक्षक और यजमान के हितैषी के रूप में प्रस्तुत किया गया है. अंत में ऋषि उनसे कामना करते हैं कि वे पूर्वकाल की भांति इस यज्ञ को भी सफल बनाएं और देवताओं को प्रसन्न करें. यह विवरण केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 76 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

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