ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 61 | इन्द्र की महान विजय, वृत्र-वध और धर्म की स्थापना
जब भी ऋग्वेद में इन्द्र के सर्वोच्च पराक्रम की चर्चा होती है, तब प्रथम मंडल का सूक्त 61 विशेष रूप से उल्लेखनीय माना जाता है. इस सूक्त में ऋषि केवल इन्द्र की स्तुति नहीं करते, बल्कि वृत्र-वध, नदियों की मुक्ति, वज्र की दिव्य शक्ति, ऋषियों की रक्षा तथा धर्म की स्थापना जैसे अनेक प्रसंगों के माध्यम से उनके विराट स्वरूप का चित्र प्रस्तुत करते हैं.
इस सूक्त की एक विशेषता यह है कि इसमें इन्द्र को केवल युद्ध में विजयी देवता नहीं कहा गया, बल्कि ऐसे लोकनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिए अपनी शक्ति का उपयोग करते हैं. जब संसार पर अंधकार, सूखा या अधर्म का प्रभाव बढ़ता है, तब वही इन्द्र अपने वज्र से बाधाओं का नाश कर जीवन का प्रवाह पुनः स्थापित करते हैं.
यही कारण है कि सूक्त 61 केवल एक वीरगाथा नहीं है. यह धर्म, उत्तरदायित्व, नेतृत्व और लोककल्याण का वैदिक आदर्श प्रस्तुत करता है. आज भी इसका संदेश उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था.
सूक्त परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| वेद | ऋग्वेद |
| मंडल | प्रथम |
| सूक्त | 61 |
| देवता | इन्द्र |
| मंत्र संख्या | 16 |
| मुख्य विषय | इन्द्र की महिमा, वृत्र-वध, वज्र, नदियों की मुक्ति और धर्म की स्थापना |
सूक्त का सार
सूक्त 61 में ऋषि इन्द्र की महानता को पाँच प्रमुख आयामों में प्रस्तुत करते हैं. वे उनकी उदारता, अपार शक्ति, वृत्र-वध, विश्व-व्यवस्था की रक्षा तथा ऋषियों के प्रति उनकी कृपा का वर्णन करते हैं.
यह सूक्त स्पष्ट करता है कि इन्द्र की शक्ति केवल शत्रु-विनाश तक सीमित नहीं है. उनका प्रत्येक कार्य जीवन, प्रकृति और धर्म की रक्षा के लिए है. इसलिए वे वैदिक साहित्य में आदर्श नेतृत्व और उत्तरदायित्व के प्रतीक बन जाते हैं.
इन्द्र की स्तुति और उनकी अनुपम महिमा
(मंत्र 1–3)
मूल मंत्र
अस्मा इदु प्र तवसे तुराय प्रयो न हर्मि स्तोम॑ माहिनाय.
ऋचीषमायाध्रिगव ओहमिन्द्राय ब्रह्माणि राततमा..अस्मा इदु प्रय इव प्र यंसि भराम्यड्गूषं बाधे सुवृक्ति.
इन्द्राय हृदा मनसा मनीषा प्रत्नाय पत्ये धियो मर्जयन्त..अस्मा इदु त्यमुपमं स्वर्षा भराम्याड्गूषमास्येन
मंहिष्ठमच्छोक्तिभिमर्मतीनां सुवृक्तिभि: सूरि वावृ
इन मंत्रों का सरल अर्थ
प्रथम मंत्र में ऋषि कहते हैं कि जैसे भूखे व्यक्ति को अन्न अर्पित किया जाता है, उसी प्रकार वे अपनी श्रेष्ठ स्तुतियाँ इन्द्र को समर्पित करते हैं. इन्द्र बल, तेज और उदारता से सम्पन्न हैं तथा श्रद्धापूर्वक की गई स्तुति को स्वीकार करने वाले देव हैं.
दूसरे मंत्र में ऋषि बताते हैं कि वे अपनी बुद्धि, श्रद्धा और हृदय की भावना से इन्द्र की महिमा का गुणगान करते हैं. केवल शब्दों से नहीं, बल्कि सच्ची आस्था से की गई प्रार्थना ही इन्द्र को प्रिय होती है.
तीसरे मंत्र में इन्द्र को महान, यशस्वी, धनदाता और बुद्धिमानों के प्रेरणास्रोत के रूप में स्मरण किया गया है. उनकी महिमा इतनी व्यापक है कि श्रेष्ठ ऋषि भी निरंतर उनके गुणों का गान करते रहते हैं.
ऋषि यहाँ क्या कहना चाहते हैं?
सूक्त का आरम्भ ही एक अत्यंत सुंदर विचार से होता है. ऋषि अपनी स्तुति की तुलना अन्न से करते हैं. जैसे भोजन शरीर को पोषण देता है, वैसे ही सच्ची श्रद्धा और स्तुति मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन को पोषित करती है.
यहाँ एक और महत्वपूर्ण संदेश छिपा है. ऋषि केवल मंत्रों का उच्चारण नहीं कर रहे, बल्कि अपनी बुद्धि, मन और हृदय—तीनों को एकाग्र करके इन्द्र का स्मरण कर रहे हैं. इससे स्पष्ट होता है कि वैदिक उपासना केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि पूर्ण समर्पण की साधना है.
इन्द्र की महिमा का वर्णन करते हुए ऋषि बार-बार उनकी उदारता का उल्लेख करते हैं. वैदिक परंपरा में किसी भी शासक या देवता की महानता केवल उसके बल से नहीं आँकी जाती, बल्कि इस बात से आँकी जाती है कि वह अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों के हित में कैसे करता है. यही कारण है कि इन्द्र को “मघवान्” अर्थात् उदार दानी कहा गया है.
वैदिक दृष्टि
ऋग्वेद में स्तुति का अर्थ केवल प्रशंसा करना नहीं है. “स्तुति” का उद्देश्य मनुष्य के भीतर श्रद्धा, कृतज्ञता और दिव्य गुणों के प्रति आकर्षण उत्पन्न करना है. इसलिए ऋषि अपनी प्रार्थना में केवल वरदान नहीं माँगते, बल्कि स्वयं को भी श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करते हैं.
वृत्र-वध और वज्र की शक्ति
(मंत्र 4–7)
मूल मंत्र
अस्मा इदु स्तोम॑ सं हिनोमि रथं न तष्टेव तत्सिनाय.
गिरश्न गिर्वाहसे सुवृक्तीन्द्राय विश्वमिन्वं मेधिरायअस्मा इदु सप्तिमिव श्रवस्येन्द्रायार्क जुह्बा३समज्जे.
वीरं दानौकसं वन्दध्यै पुरां गूर्तश्रवसं दर्माणम्अस्मा इदु त्वष्टा तक्षद्वज्॑ स्वपस्तमं स्वर्य३ रणाय.
वृत्रस्य चिद्विदद्येन मर्म तुजन्नीशानस्तुजता कियेधा:.अस्येदु मातुः: सवनेषु सद्यो महः पितुं पपिवाज्चार्वन्ना.
मुषायद्विष्णु: पचतं सहीयान्विध्यद्वराहं तिरो अद्रिम
इन मंत्रों का सरल अर्थ
इन मंत्रों में ऋषि इन्द्र के महान पराक्रम का वर्णन करते हैं. त्वष्टा द्वारा निर्मित दिव्य वज्र को धारण कर इन्द्र वृत्र का सामना करते हैं. अपने अदम्य साहस और शक्ति से वे वृत्र का वध करते हैं तथा उसके द्वारा रोके गए जल को मुक्त कर संसार में वर्षा और जीवन का पुनः संचार करते हैं.
इन मंत्रों में यह भी बताया गया है कि इन्द्र केवल युद्ध में विजयी नहीं होते, बल्कि उनकी विजय के परिणामस्वरूप सम्पूर्ण प्रकृति में संतुलन स्थापित होता है. नदियाँ पुनः प्रवाहित होती हैं, मेघ वर्षा करते हैं और समस्त प्राणियों को जीवन का आधार प्राप्त होता है.
इस प्रसंग का वैदिक रहस्य
सूक्त 61 का यह भाग ऋग्वेद के सबसे प्रसिद्ध प्रसंगों में से एक है.
यदि केवल कथा के रूप में देखें तो यह इन्द्र और वृत्र के युद्ध का वर्णन है. लेकिन वैदिक दर्शन इससे कहीं गहरा संदेश देता है.
वृत्र केवल एक असुर नहीं है. वह हर उस शक्ति का प्रतीक है जो जीवन को रोकती है- चाहे वह सूखा हो, भय हो, अज्ञान हो, अन्याय हो या मनुष्य के भीतर बैठा हुआ आलस्य.
इसी प्रकार वज्र केवल एक अस्त्र नहीं है. वह साहस, विवेक और निर्णायक कर्म का प्रतीक है.
जब इन्द्र वज्र से वृत्र का वध करते हैं, तब उसका अर्थ केवल एक युद्ध की विजय नहीं, बल्कि जीवन की रुकावटों का अंत भी है. इसके बाद नदियाँ बहती हैं, वर्षा होती है और प्रकृति पुनः जीवंत हो उठती है.
यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है. जब मनुष्य अपने भीतर के भय, निराशा और जड़ता पर विजय प्राप्त करता है, तभी उसके जीवन में भी नई संभावनाओं का प्रवाह प्रारम्भ होता है.
इन्द्र का विश्वव्यापी पराक्रम और सृष्टि का संतुलन
(मंत्र 8–11)
मूल मंत्र
अस्मा इदु ग्नश्रिद्देवपत्नीरिन्द्रायार्कमहिहत्य ऊवु:.
परि द्यावापृथिवी जश्र उर्वी नास्य ते महिमान परि ष्ट:..अस्येदेव प्र रिरिचे महित्वं दिवस्पृथिव्या: पर्यन्तरिक्षात्,
स्वरालिन्द्रो दम आ विश्वगूर्त: स्वरिर्मत्रो ववक्षे रणायअस्येदेव शवसा शुषन्तं वि वृश्चद्धजेेण वृत्रमिन्द्र:.
गा न व्राणा अवनीरमुञ्चदभि श्रवो दावने सचेता:.अस्येदु त्वेषसा रन्त सिन्धव: परि यद्वजेण सीमयच्छत्.
ईशानकृद्दाशुषे दशस्यन्तुर्वीतये गाधं तुर्वणि: कः..
इन मंत्रों का सरल अर्थ
आठवें मंत्र में ऋषि कहते हैं कि जब इन्द्र ने वृत्र का वध किया, तब उनकी महिमा आकाश और पृथ्वी से भी अधिक प्रकट हुई. देवशक्तियों ने उनके इस अद्भुत कार्य का गुणगान किया, क्योंकि उन्होंने संसार को पुनः जीवन प्रदान किया.
नौवें मंत्र में इन्द्र की शक्ति का विस्तार तीनों लोकों तक बताया गया है. वे अपने तेज, पराक्रम और बुद्धिमत्ता से सम्पूर्ण विश्व की व्यवस्था का संचालन करते हैं तथा अधर्म का नाश करने में सदैव समर्थ हैं.
दसवें मंत्र में ऋषि स्मरण करते हैं कि इन्द्र ने जल को रोकने वाले वृत्र का विनाश कर नदियों और वर्षा का मार्ग खोल दिया. इस प्रकार उन्होंने केवल एक शत्रु का वध नहीं किया, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि को पुनः जीवन प्रदान किया.
ग्यारहवें मंत्र में कहा गया है कि इन्द्र ने अपनी शक्ति से नदियों के प्रवाह को व्यवस्थित किया और पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक संतुलन स्थापित किया. वे अपने भक्तों की रक्षा करते हुए उन्हें समृद्धि और सुरक्षित जीवन प्रदान करते हैं.
ऋषि यहाँ क्या कहना चाहते हैं?
इन मंत्रों में इन्द्र का स्वरूप केवल एक विजेता योद्धा का नहीं, बल्कि सृष्टि के संरक्षक का है.
वृत्र-वध के बाद सबसे पहले जिस बात का उल्लेख आता है, वह है जल का प्रवाह. यह कोई साधारण बात नहीं है. वैदिक ऋषि जानते थे कि जल ही जीवन का आधार है. इसलिए इन्द्र की सबसे बड़ी विजय किसी राज्य को जीतना नहीं, बल्कि जीवन को पुनः गति देना है.
नदियों का बहना केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं माना गया. यह ऋत अर्थात् ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक है. जब नदियाँ अपने मार्ग पर बहती हैं, वर्षा समय पर होती है और प्रकृति संतुलित रहती है, तब सम्पूर्ण जीवन समृद्ध होता है. इन्द्र इसी व्यवस्था के रक्षक के रूप में सामने आते हैं.
एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि ऋषि इन्द्र की महिमा को केवल उनके बल से नहीं जोड़ते. वे बताते हैं कि उनका पराक्रम लोककल्याण में दिखाई देता है. यही वैदिक नेतृत्व का आदर्श है- जिसकी शक्ति से समाज सुरक्षित हो, प्रकृति संतुलित रहे और सभी प्राणियों का हित हो.
आज के समय में भी यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक है. वास्तविक नेतृत्व वही है जो संसाधनों का संरक्षण करे, लोगों को सुरक्षा दे और समाज में संतुलन स्थापित करे.
वैदिक दृष्टि
वेदों में जल केवल भौतिक तत्व नहीं है. यह जीवन, समृद्धि, चेतना और ईश्वरीय अनुग्रह का प्रतीक भी है. इसलिए जब इन्द्र जल को मुक्त करते हैं, तो उसका अर्थ केवल वर्षा नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पुनः ऊर्जा और विकास का प्रवाह स्थापित करना भी है.
धर्म की रक्षा और ऋषियों का संरक्षण
(मंत्र 12–14)
मूल मंत्र
अस्मा डदु प्र भरा तूतुजानो वृत्राय वज़्मीशान: कियेधा:.
गोर्न पर्व वि रदा तिरकश्रेष्यन्नर्णास्यपां चरश..अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थै:,
युधे यदिष्णान आयुधान्यूघायमाणो निरिणाति शत्रूअस्येदु भिया गिरयश्च दृ्ठहा द्यावा च भूमा जनुषस्तुजेते.
उपो वेनस्य जोगुवान ओणिंसपद्यो भुवद्वीर्याय नोधा
इन मंत्रों का सरल अर्थ
बारहवें मंत्र में ऋषि इन्द्र से प्रार्थना करते हैं कि वे अपने वज्र से अधर्म और बाधाओं का नाश करें, जिससे वर्षा और समृद्धि पुनः स्थापित हो सके.
तेरहवें मंत्र में स्तोता इन्द्र के पूर्व महान कार्यों का स्मरण करते हुए लोगों को प्रेरित करता है कि वे उनके पराक्रम और धर्मरक्षा के कार्यों का गुणगान करें.
चौदहवें मंत्र में बताया गया है कि इन्द्र के प्रकट होने से पर्वत भी स्थिर रहते हैं और पृथ्वी तथा आकाश उनके पराक्रम का सम्मान करते हैं. ऋषि नोधा उनकी रक्षा-शक्ति की बार-बार प्रशंसा करते हैं और उनसे निरंतर संरक्षण की कामना करते हैं.
इस खंड का संदेश
सूक्त का यह भाग हमें बताता है कि इन्द्र की शक्ति का अंतिम उद्देश्य धर्म की स्थापना है.
यहाँ ऋषि केवल पुराने पराक्रम का वर्णन नहीं कर रहे. वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी उन आदर्शों को याद रखें, जिनके कारण संसार में संतुलन बना रहा. इसलिए वे बार-बार इन्द्र के कार्यों का स्मरण करते हैं.
नोधा ऋषि का उल्लेख भी अत्यंत महत्वपूर्ण है. इससे स्पष्ट होता है कि वैदिक ऋषियों के लिए ईश्वर केवल पूजनीय नहीं थे, बल्कि जीवन के प्रत्येक संघर्ष में सहायक और प्रेरणास्रोत भी थे.
इन मंत्रों का एक और गहरा संदेश है कि धर्म की रक्षा केवल दिव्य शक्ति का कार्य नहीं, बल्कि मनुष्य का भी उत्तरदायित्व है. ईश्वर प्रेरणा देते हैं, साहस प्रदान करते हैं, लेकिन धर्म की स्थापना के लिए कर्म मनुष्य को ही करना पड़ता है.
इसी कारण यह सूक्त आज भी केवल धार्मिक स्तुति नहीं, बल्कि साहस, उत्तरदायित्व और लोकमंगल का घोष बनकर सामने आता है.
ऋषियों की प्रार्थना और सूक्त का समापन
(मंत्र 15–16)
मूल मंत्र
अस्मा इदु त्यदनु दाय्येषामेको यद्वव्ने भूरेरीशान:.
प्रैतशं सूर्य पस्पृधानं सौवश्व्ये सुष्विमावदिन..एवा ते हारियोजना सुवृक्तीन्द्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्.
ऐषु विश्वपेशसं धियं धाः प्रातर्मक्षू धियावसुर्जगम्या
इन मंत्रों का सरल अर्थ
पंद्रहवें मंत्र में ऋषि गौतम इन्द्र का स्मरण करते हुए उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे अपने भक्तों की रक्षा करें, उनकी स्तुतियों को स्वीकार करें और उन्हें धन, बल तथा विजय का आशीर्वाद दें. वे इन्द्र को ऐसे देवता के रूप में देखते हैं जो श्रद्धापूर्वक की गई प्रार्थना को कभी अनसुना नहीं करते.
सोलहवें और अंतिम मंत्र में सूक्त का समापन मंगलकामना के साथ होता है. ऋषि इन्द्र से प्रार्थना करते हैं कि वे अपने उपासकों को यश, समृद्धि, उत्तम संतति, अन्न, पशुधन और सुरक्षित जीवन प्रदान करें. साथ ही वे सदैव धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहें.
इस सूक्त का अंतिम संदेश
सूक्त 61 का समापन अत्यंत सुंदर भाव के साथ होता है. पूरे सूक्त में जहाँ इन्द्र के महान पराक्रम, वृत्र-वध और विश्व-व्यवस्था की चर्चा हुई, वहीं अंत में ऋषि हमें यह स्मरण कराते हैं कि ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा केवल शत्रुओं पर विजय नहीं, बल्कि जीवन में धर्म, शांति और समृद्धि का स्थायी आधार है.
गौतम ऋषि की प्रार्थना में केवल व्यक्तिगत सुख की कामना नहीं है. वे समस्त समाज के कल्याण, अन्न की समृद्धि, सुरक्षा और धर्म की निरंतर स्थापना की प्रार्थना करते हैं. यही वैदिक प्रार्थना की विशेषता है—यह केवल “मुझे दो” तक सीमित नहीं रहती, बल्कि “सबका कल्याण हो” की भावना से जुड़ी होती है.
पूरे सूक्त को यदि एक सूत्र में बाँधा जाए, तो उसका संदेश स्पष्ट है – शक्ति तभी पूजनीय है जब वह लोककल्याण के लिए समर्पित हो. इन्द्र इसी आदर्श का प्रतिनिधित्व करते हैं. वे युद्ध इसलिए नहीं करते कि अपना प्रभुत्व स्थापित कर सकें, बल्कि इसलिए कि जीवन, प्रकृति और धर्म की रक्षा हो सके.
क्या आप जानते हैं?
ऋग्वेद में वृत्र-वध का प्रसंग अनेक सूक्तों में आता है, लेकिन सूक्त 61 उन प्रमुख सूक्तों में गिना जाता है जहाँ इस घटना को केवल युद्ध के रूप में नहीं, बल्कि जीवन, वर्षा, नदियों और ब्रह्मांडीय व्यवस्था की पुनर्स्थापना के रूप में प्रस्तुत किया गया है. यही कारण है कि यह सूक्त वैदिक साहित्य में विशेष महत्व रखता है.
इस सूक्त से मिलने वाली प्रमुख शिक्षाएँ
- सच्ची शक्ति वही है जो धर्म और लोककल्याण के लिए समर्पित हो.
- श्रद्धा और समर्पण से की गई प्रार्थना जीवन को सकारात्मक दिशा देती है.
- जीवन की प्रत्येक बाधा साहस, विवेक और पुरुषार्थ से दूर की जा सकती है.
- नेतृत्व का उद्देश्य दूसरों की रक्षा और समृद्धि सुनिश्चित करना होना चाहिए.
- प्रकृति का संतुलन और जल का संरक्षण मानव जीवन के लिए अनिवार्य है.
- ईश्वर की कृपा का सर्वोत्तम रूप हमें सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना है.
- व्यक्तिगत सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है समाज और समस्त सृष्टि का कल्याण.
वैदिक दृष्टि से सूक्त 61 का महत्व
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 61 इन्द्र के सबसे व्यापक और प्रभावशाली स्वरूपों में से एक का परिचय कराता है. यहाँ वे केवल वज्रधारी देवता नहीं, बल्कि धर्म के रक्षक, प्रकृति के संरक्षक, वर्षा के दाता और लोकमंगल के प्रेरक के रूप में सामने आते हैं.
इस सूक्त का महत्व इसलिए भी विशेष है क्योंकि इसमें वीरता और करुणा का अद्भुत संतुलन दिखाई देता है. एक ओर इन्द्र अधर्म और अवरोधों का नाश करते हैं, तो दूसरी ओर उन्हीं के कारण नदियाँ प्रवाहित होती हैं, खेतों में अन्न उत्पन्न होता है और जीवन पुनः फलने-फूलने लगता है.
यदि वैदिक नेतृत्व के आदर्श को एक सूक्त में समझना हो, तो सूक्त 61 उसका उत्कृष्ट उदाहरण है. यह हमें सिखाता है कि शक्ति का वास्तविक उद्देश्य अधिकार नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व है.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 61 के देवता कौन हैं?
इस सूक्त के देवता इन्द्र हैं, जिनकी महिमा, वृत्र-वध, वज्र की शक्ति तथा धर्म की स्थापना का विस्तृत वर्णन किया गया है.
2. सूक्त 61 का मुख्य विषय क्या है?
इस सूक्त का मुख्य विषय इन्द्र का पराक्रम, वृत्र-वध, नदियों की मुक्ति, विश्व-व्यवस्था की रक्षा और धर्म की स्थापना है.
3. इस सूक्त में वृत्र-वध का क्या अर्थ है?
वृत्र-वध केवल एक दैवी युद्ध नहीं है. वैदिक दृष्टि में यह जीवन की बाधाओं, अज्ञान, सूखे और अधर्म पर विजय का प्रतीक है. इसके बाद जल का प्रवाह और जीवन का पुनर्जागरण होता है.
4. इन्द्र के वज्र का क्या प्रतीकात्मक अर्थ है?
वज्र साहस, निर्णायक शक्ति, विवेक और धर्म की रक्षा के लिए आवश्यक संकल्प का प्रतीक है. यह हमें अन्याय और भय का सामना करने की प्रेरणा देता है.
5. आज के समय में सूक्त 61 हमें क्या सिखाता है?
यह सूक्त बताता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज की रक्षा करे, संसाधनों का संरक्षण करे, कठिन परिस्थितियों में साहस दिखाए और अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करे.
सूक्त 61 केवल इन्द्र के पराक्रम का वर्णन नहीं करता, बल्कि यह हमें शक्ति और उत्तरदायित्व के वास्तविक संबंध को समझाता है. वैदिक ऋषियों ने इन्द्र को इसलिए महान नहीं कहा कि वे सबसे अधिक बलवान थे, बल्कि इसलिए कि उन्होंने अपने बल का उपयोग जीवन की रक्षा, नदियों के प्रवाह, वर्षा और धर्म की स्थापना के लिए किया.
आज भी यह संदेश उतना ही प्रेरणादायक है. प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी रूप में नेतृत्व करता है- परिवार में, समाज में, कार्यक्षेत्र में या अपने विचारों के माध्यम से. यदि उस नेतृत्व का आधार सत्य, साहस, करुणा और लोककल्याण हो, तो वही वैदिक आदर्श है जिसकी प्रेरणा हमें सूक्त 61 से प्राप्त होती है.