ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 125. दान की स्तुति और उदारता का महत्व
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 125 दान से संबंधित है. इस सूक्त में दान देने वाले व्यक्ति की प्रशंसा की गई है और उसके द्वारा प्राप्त होने वाले धन, यश, दीर्घायु, समृद्धि तथा सामाजिक सम्मान का वर्णन मिलता है.
सूक्त के आरंभिक मंत्रों में सूर्य, प्रातःकाल और राजा से जुड़े प्रसंग दिखाई देते हैं. इसके बाद दान देने वाले व्यक्ति की उदारता और उसके द्वारा प्राप्त होने वाले लाभों का वर्णन किया गया है.
सूक्त में यह भी बताया गया है कि दान देने वाला व्यक्ति पृथ्वी पर दृश्यमान वस्तुओं को प्राप्त करता है, समृद्ध होता है और दीर्घायु प्राप्त करके अमरत्व की ओर बढ़ता है.
दूसरे भाग में गायों, यज्ञकर्ता, यज्ञ का संकल्प करने वाले व्यक्ति, पितरों और प्राणियों से जुड़े प्रसंग आते हैं. दान देने वाले व्यक्ति को यज्ञ से संबंधित सुख और समृद्धि प्राप्त होने का वर्णन किया गया है.
मंत्र 1. प्रातःकाल, राजा और समृद्धि
प्राता रत्नं प्रातरित्वा दधाति तं चिकित्वान्प्रतिगृह्मा नि धत्ते.
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचते सुवीर:..
सरल हिंदी अर्थ
प्रातःकाल प्राप्त होने वाला रत्न और धन राजा के लिए समृद्धि का साधन है. सूर्य के प्रकाश के साथ जीवन में वृद्धि होती है और राज्य तथा संपत्ति की प्राप्ति का मार्ग खुलता है.
सरल व्याख्या
सूक्त के पहले मंत्र में प्रातःकाल, धन और राजकीय समृद्धि से संबंधित भाव दिखाई देता है. सूर्य और उसके प्रकाश के साथ जीवन तथा संपत्ति के विकास का संबंध बताया गया है.
इस मंत्र से सूक्त की शुरुआत धन और समृद्धि के विषय से होती है.
मंत्र 2. राजा के लिए यश और समृद्धि
सुगुरसत्सुहिरण्य: स्वश्वो बृहदस्मै वय इन्द्रो दधाति.
यस्त्वायन्तं वसूना प्रातरित्वो मुक्षीजयेव पदि मुत्सिनाति
सरल हिंदी अर्थ
स्वनय नामक राजा के लिए प्रातःकाल मेरे समीप रत्न आए. शानी कवि ने जिनको आशीर्वाद दिया, उनकी बुद्धि और यश में वृद्धि हुई. राजा को बार-बार धन और समृद्धि प्राप्त हो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में स्वनय नामक राजा का उल्लेख मिलता है. उसके लिए रत्न और धन की प्राप्ति की कामना की गई है.
मंत्र में शानी कवि द्वारा दिए गए आशीर्वाद का भी उल्लेख है और राजा के लिए बार-बार धन प्राप्त होने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 3. सूर्य और यज्ञकर्ता की समृद्धि
आयमद्य सुकृतं प्रातरिच्छन्निष्टे: पुत्र वसुमता रथेन.
अंशो: सुतं पायय मत्सरस्य क्षयद्दीरं वर्धन्य सुनृताभि:..
सरल हिंदी अर्थ
जो व्यक्ति सूर्य के समान तेजस्वी और यज्ञ करने वाला है, वह अपनी शक्ति के अनुसार दान देता है. वह अपने यज्ञ और दान के द्वारा सुख तथा समृद्धि प्राप्त करता है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में यज्ञकर्ता और दान देने वाले व्यक्ति का वर्णन मिलता है. दान और यज्ञ के माध्यम से उसके लिए समृद्धि की कामना की गई है.
सूक्त में दान को केवल संपत्ति देने की क्रिया के रूप में नहीं, बल्कि यज्ञ और धार्मिक कर्तव्य से जुड़े कार्य के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है.
मंत्र 4. राजा और उसकी संपत्ति
उप क्षरन्ति सिन्धवो मयोभुव ईजानं च यक्ष्यमाणं च धेनव:.
पृणन्तं च पपुरिं च श्रवस्यवो घृतस्य धारा उप यन्ति विश्वतः..
सरल हिंदी अर्थ
यह स्वनय राजा बहुत सी गायों, स्वर्ण और घोड़ों का स्वामी है. जैसे पशु-पक्षियों आदि को रस्सी से बांधा जाता है, उसी प्रकार राजा ने प्रातःकाल आने वाले यात्रियों को अपने पास रोक लिया और उन्हें जाने नहीं दिया.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में स्वनय राजा की संपत्ति का विशेष उल्लेख है. उसके पास बहुत सी गायें, स्वर्ण और घोड़े बताए गए हैं.
मंत्र में यात्रियों और उनके रुकने से जुड़ा प्रसंग भी आता है. राजा की संपन्नता को उसके पास मौजूद गायों, स्वर्ण और घोड़ों से व्यक्त किया गया है.
मंत्र 5. दान और दीर्घायु
नाकस्य पृष्ठे अधि तिष्ठति श्रितो यः पृणाति स ह देवेषु गच्छति.
तस्मा आपो घृतमर्षन्ति सिन्धवस्तस्मा इयं दक्षिणा पिन्वते सदा
सरल हिंदी अर्थ
दान देने वाला व्यक्ति पृथ्वी पर दिखाई देने वाली वस्तुओं को प्राप्त करता है. वह सूर्य के समान प्रसिद्ध होता है और समृद्धि प्राप्त करता है. दान देने वाला दीर्घायु प्राप्त करके अमरत्व की ओर बढ़ता है.
सरल व्याख्या
यह मंत्र सूक्त के मुख्य विषय को स्पष्ट रूप से सामने रखता है. दान देने वाले व्यक्ति के लिए धन, यश और दीर्घायु की प्रशंसा की गई है.
दान को समृद्धि और लंबे जीवन से जोड़ा गया है.
मंत्र 6. दान देने वाले की समृद्धि
दक्षिणावतामिदिमानि चित्रा दक्षिणावतां दिवि सूर्यास:.
दक्षिणावन्तो अमृतं भजन्ते दक्षिणावन्त: प्र तिरन्त आयु:..
सरल हिंदी अर्थ
हे दान देने वाले. तुम्हारे द्वारा दी गई वस्तुओं से यज्ञ करने वाले और यज्ञ का संकल्प करने वाले व्यक्ति के पास सुख और समृद्धि आती है. तुम्हारे दान से प्राणियों और पितरों को भी प्रसन्नता प्राप्त होती है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में दान के प्राप्तकर्ता और उससे जुड़े यज्ञ का वर्णन मिलता है.
दान देने वाला व्यक्ति यज्ञकर्ता और अन्य प्राणियों के लिए उपयोगी बनता है. मंत्र में पितरों को तर्पण करने और प्राणियों को प्रसन्न करने से जुड़े भाव भी दिखाई देते हैं.
मंत्र 7. दान और यज्ञ
मा पृणन्तो दुरितमेन आरन्मा जारिषु: सूरय: सुव्रतास:.
अन्यस्तेषां परिधिरस्तु कश्चिदपृणन्तमभि सं यन्तु शोका
सरल हिंदी अर्थ
दान देने वाला व्यक्ति यज्ञ में सुख देने वाली वस्तुएं प्रदान करता है. वह यज्ञकर्ता और प्राणियों के लिए प्रसन्नता का कारण बनता है. उसके द्वारा दिया गया दान यज्ञ के कार्य को पूर्ण करने में सहायक होता है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में दान और यज्ञ का संबंध और स्पष्ट होता है. दान देने वाला व्यक्ति यज्ञ से जुड़े कार्यों के लिए आवश्यक वस्तुएं प्रदान करता है.
इस प्रकार दान को यज्ञ की व्यवस्था और उससे जुड़े लोगों के कल्याण से जोड़ा गया है.
सूक्त 125 का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 125 दान और दान देने वाले व्यक्ति की महिमा से संबंधित है.
सूक्त के आरंभ में प्रातःकाल, सूर्य, धन और राजा से जुड़े प्रसंग आते हैं. स्वनय नामक राजा का उल्लेख करते हुए उसके पास मौजूद गायों, स्वर्ण और घोड़ों जैसी संपत्ति का वर्णन किया गया है.
सूक्त का मुख्य विषय दान देने वाले व्यक्ति की समृद्धि है. दान देने वाले को पृथ्वी पर दृश्यमान वस्तुओं की प्राप्ति, यश और दीर्घायु से जोड़ा गया है. उसके लिए अमरत्व की दिशा में बढ़ने की बात भी कही गई है.
आगे दान का संबंध यज्ञकर्ता, यज्ञ के संकल्प, पितरों और प्राणियों की प्रसन्नता से बताया गया है. दान से यज्ञ के कार्यों को सहायता मिलती है और दान देने वाला व्यक्ति सुख तथा समृद्धि प्राप्त करता है.
अंतिम मंत्र में हवि द्वारा देवताओं को प्रसन्न करने वाले व्यक्ति के दुख और पाप से दूर रहने की बात कही गई है. इसके विपरीत दान और स्तुति न करने वाले व्यक्ति के लिए पाप और शोक का उल्लेख है.