ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 45. अग्नि द्वारा देवताओं के आह्वान की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 45 अग्नि देव को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वे विभिन्न देवताओं को यज्ञ में लेकर आएं और यजमान के लिए कल्याणकारी बनें. अनेक मंत्रों में अग्नि को देवताओं का दूत, यज्ञ का संचालक और स्तुति सुनने वाला बताया गया है.
अग्नि से देवताओं को बुलाने की प्रार्थना
सूक्त के प्रारंभ में अग्नि से कहा गया है कि वे आदित्यों और अन्य देवताओं को यज्ञ में लेकर आएं.
ऋषि चाहते हैं कि देवता यज्ञ में उपस्थित होकर हवि स्वीकार करें. इस कार्य के लिए अग्नि को प्रमुख माध्यम के रूप में संबोधित किया गया है.
यज्ञ में देवताओं का आगमन
मंत्रों में बार-बार विभिन्न देवताओं के यज्ञ में आने की कामना व्यक्त की गई है.
ऋषि प्रार्थना करते हैं कि देवता यजमान के समीप आएं और उसकी स्तुतियों को सुनें. वे चाहते हैं कि यज्ञ देवकृपा प्राप्त करने का माध्यम बने.
अग्नि का तेज और प्रकाश
सूक्त में अग्नि के प्रकाश और उनकी ज्योति का वर्णन मिलता है.
ऋषि उन्हें चमकदार और दूर तक प्रकाश फैलाने वाला बताते हैं. उनके तेज को यज्ञ की शोभा और सफलता से जोड़ा गया है.
यजमान की रक्षा
कई मंत्रों में अग्नि से रक्षा की प्रार्थना की गई है.
ऋषि चाहते हैं कि अग्नि यजमान को हानि पहुंचाने वालों से सुरक्षित रखें और उसके लिए कल्याणकारी बनें. उनसे संकटों को दूर करने का भी निवेदन किया गया है.
स्तुति सुनने वाले अग्नि
सूक्त में अग्नि को स्तुति सुनने वाला और प्रार्थनाओं को स्वीकार करने वाला बताया गया है.
ऋषि अपनी वाणी और स्तुतियों को अग्नि तक पहुंचाते हैं और उनसे प्रसन्न होने की कामना करते हैं.
सोमपान के लिए देवताओं का निमंत्रण
मंत्रों में सोमपान का भी उल्लेख मिलता है.
ऋषि अग्नि से कहते हैं कि वे उन देवताओं को बुलाएं जो सोमपान करते हैं. वे चाहते हैं कि देवता यज्ञ में आएं और सोम ग्रहण करें.
प्रातःकालीन आह्वान
सूक्त के अंतिम भाग में प्रातःकाल का उल्लेख मिलता है.
ऋषि अग्नि से निवेदन करते हैं कि वे प्रातःकाल जागकर देवताओं को यज्ञ में बुलाएं. इससे यज्ञ की नियमित व्यवस्था और देवताओं के आह्वान का वर्णन दिखाई देता है.
यज्ञ की सफलता की कामना
सूक्त में यज्ञ की सफलता और देवताओं की प्रसन्नता की कामना की गई है.
ऋषि चाहते हैं कि अग्नि के माध्यम से सभी देवता यज्ञ में आएं, स्तुतियों को सुनें और यजमान को अपना आशीर्वाद प्रदान करें.
पूरे सूक्त में अग्नि को देवताओं का दूत और यज्ञ का प्रमुख माध्यम बताते हुए उनसे विभिन्न देवताओं को बुलाने, यजमान की रक्षा करने और यज्ञ को सफल बनाने की प्रार्थना की गई है.