श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 1, अध्याय 5) : असंतोष से जागरण की ओर
एक अधूरापन जो दिखने लगता है इस अध्याय में कथा एक ऐसे बिंदु पर आती है जहाँ सब कुछ होते हुए भी कुछ कमी महसूस होती है. ज्ञान है, ग्रंथ हैं, रचना है – लेकिन फिर भी भीतर एक हल्का सा असंतोष बना हुआ है. यह असंतोष बाहर की किसी कमी से नहीं, बल्कि भीतर…