पुराणों में धर्म और समाज की संरचना : जीवन को व्यवस्थित करने की दृष्टि
धर्म केवल पूजा नहीं है आज धर्म शब्द सुनते ही अक्सर पूजा-पाठ की छवि उभरती है. मंदिर व्रत अनुष्ठान पर पुराणों में धर्म का अर्थ इससे व्यापक है. धर्म जीवन को संतुलित रखने वाली व्यवस्था है. जहाँ व्यक्ति परिवार समाज सभी सामंजस्य में रह सकें. कर्तव्य की धारणा पुराणों में हर व्यक्ति के लिए कुछ…