ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 46. अश्विनीकुमारों का आह्वान और सोमपान की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 46 अश्विनीकुमारों को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि अश्विनीकुमारों का बार-बार आह्वान करते हैं और उनसे यज्ञ में आने, सोमपान करने तथा यजमान पर कृपा करने की प्रार्थना करते हैं. साथ ही उनके रथ, उनके आगमन और उनकी रक्षा का भी वर्णन किया गया है.
अश्विनीकुमारों का आह्वान
सूक्त के प्रारंभ में अश्विनीकुमारों को प्रातःकाल यज्ञ में आने के लिए आमंत्रित किया गया है.
ऋषि कहते हैं कि जिस प्रकार उषा के प्रकट होने पर प्रकाश फैलता है, उसी प्रकार अश्विनीकुमार भी शीघ्र उनके यज्ञ में पधारें और उनकी स्तुति स्वीकार करें.
यज्ञ में आने की प्रार्थना
मंत्रों में बार-बार अश्विनीकुमारों से यज्ञ में आने का निवेदन किया गया है.
ऋषि चाहते हैं कि वे यजमान के पास आएं और श्रद्धा के साथ तैयार किए गए यज्ञ को स्वीकार करें. उनके आगमन को शुभ और कल्याणकारी बताया गया है.
रथ का वर्णन
सूक्त में अश्विनीकुमारों के रथ का अनेक स्थानों पर उल्लेख मिलता है.
ऋषि उनके रथ की गति और उसके द्वारा यज्ञ तक पहुंचने का वर्णन करते हैं. वे चाहते हैं कि अश्विनीकुमार अपने रथ पर आरूढ़ होकर शीघ्र उनके पास आएं.
सोमपान का निमंत्रण
कई मंत्रों में अश्विनीकुमारों को सोमपान के लिए आमंत्रित किया गया है.
ऋषि कहते हैं कि यज्ञ में सोम तैयार है और वे उसका पान करें. इस प्रकार सोमपान इस सूक्त का एक प्रमुख विषय दिखाई देता है.
उषा और सूर्य का उल्लेख
सूक्त में उषा और सूर्य का भी उल्लेख मिलता है.
ऋषि बताते हैं कि उषा के आने और सूर्य के उदित होने के समय अश्विनीकुमारों का स्मरण किया जाता है. इन प्राकृतिक दृश्यों के साथ उनके आगमन का वर्णन किया गया है.
पृथ्वी और आकाश का वर्णन
मंत्रों में पृथ्वी और आकाश दोनों का उल्लेख मिलता है.
ऋषि चाहते हैं कि अश्विनीकुमार जहां कहीं भी हों, वहां से उनके यज्ञ में आएं. उनके व्यापक विचरण का वर्णन भी इन मंत्रों में मिलता है.
यजमान की रक्षा
सूक्त में अश्विनीकुमारों से यजमान की रक्षा की प्रार्थना की गई है.
ऋषि चाहते हैं कि वे अपने भक्तों की रक्षा करें और उन पर अपनी कृपा बनाए रखें. उनसे कल्याण और सुरक्षा की कामना की गई है.
स्तुति और कृपा की याचना
सूक्त के अंतिम मंत्रों में ऋषि श्रद्धापूर्वक अश्विनीकुमारों की स्तुति करते हैं.
वे उनसे निवेदन करते हैं कि वे सोमपान करें, उनकी प्रार्थनाएं स्वीकार करें और अपनी कृपा से यजमान का कल्याण करें.
पूरे सूक्त में अश्विनीकुमारों का आह्वान, उनके रथ का वर्णन, सोमपान का निमंत्रण, उषा और सूर्य का उल्लेख तथा यजमान के संरक्षण और कल्याण की प्रार्थना प्रमुख रूप से दिखाई देती है.