ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 105. विश्वेदेवों से सत्य, रक्षा और कल्याण की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 105 विश्वेदेवों को समर्पित है. इस सूक्त में देवताओं से अनेक प्रकार की प्रार्थनाएं की गई हैं. इसमें पृथ्वी और आकाश का स्मरण, सूर्य की किरणों का वर्णन, अग्नि के प्रति श्रद्धा, वरुण से मार्गदर्शन और रक्षा की प्रार्थना तथा अंत में इंद्र सहित मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश से कल्याण की कामना की गई है.
इस सूक्त की शुरुआत चंद्रमा के आकाश में विचरण करने के वर्णन से होती है. आगे पृथ्वी और आकाश से अपनी बात समझने का निवेदन किया गया है. ऋषि देवताओं से यह भी पूछते हैं कि उनकी सत्यधारणा कहां है और वह मार्ग कौन सा है जिस पर चलकर पापरहित शत्रुओं से दूर जाया जा सके.
सूक्त के मध्य भाग में ऋषि अपने आपको एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं जो कुएं में गिर गया है और देवताओं को अपनी रक्षा के लिए पुकार रहा है. बाद के मंत्रों में सूर्य की किरणों, अग्नि, वरुण, बृहस्पति और अन्य देवताओं का स्मरण मिलता है.
मंत्र 1
मंत्र
चन्द्रमा अप्स्वश्न्तरा सुपर्णो धावते दिवि.
न वो हिरण्यनेमय: पद विन्दन्ति विद्युतो वित्तं मे अस्य रोदसी
सरल हिंदी अर्थ
उदकमय मंडल में वर्तमान सुंदर किरणों वाला चंद्रमा आकाश में दौड़ता है. हे स्वर्णमयी चंद्रकिरणों. कुएं से ढंकी होने के कारण मेरी इंद्रियां तुम्हारे अग्रभाग को नहीं प्राप्त करतीं. हे धरती और आकाश. हमारे इस स्तोत्र को जानो.
सरल व्याख्या
सूक्त की शुरुआत चंद्रमा के आकाश में विचरण करने के वर्णन से होती है. मंत्र में चंद्रमा की सुंदर किरणों और उनके स्वर्णमय स्वरूप का उल्लेख है. इसके बाद धरती और आकाश से ऋषि अपने स्तोत्र को जानने का निवेदन करते हैं.
मंत्र 2
मंत्र
अर्थमिद्वा उ अर्थिन आ जाया युवते पतिम्.
तुज्जाते वृष्ण्यं पय: परिदाय रस दुहे वित्तं मे अस्य रोदसी
सरल हिंदी अर्थ
धन चाहने वाले लोगों को निश्चित रूप से धन मिल रहा है. दूसरे की स्त्रियां अपने पतियों के समीप ही पाती हैं, उनसे समागम करती हैं एवं गर्भ में वीर्य धारण करके संतान उत्पन्न करती हैं. हे धरती और आकाश. मेरे इस कष्ट को जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में धन प्राप्ति और संतान उत्पत्ति से जुड़े उदाहरण दिए गए हैं. धन चाहने वालों को धन मिलने तथा स्त्रियों द्वारा अपने पतियों के समीप जाकर गर्भ धारण करने और संतान उत्पन्न करने की बात कही गई है. अंत में धरती और आकाश से इस बात को जानने का निवेदन किया गया है.
मंत्र 3
मंत्र
मो षु देवा अद: स्व१श्रव पादि दिवस्परि,
मा सोम्यस्य शंभुव:ः शूने भूम कदा चन वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
हे देवों. स्वर्ग में वर्तमान हमारे पूर्वपुरुष वहां से पतित न हों. सोमपान योग्य पितर के निमित्त पुत्र से रहित कभी न हों. हे धरती और आकाश. मेरी इस बात को समझो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में पूर्वपुरुषों और पितरों से संबंधित प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि स्वर्ग में स्थित उनके पूर्वपुरुष वहां से पतित न हों और सोमपान योग्य पितरों के निमित्त पुत्रहीनता न हो. अंत में धरती और आकाश से अपनी बात समझने का निवेदन है.
मंत्र 4
मंत्र
यज्ञं पृच्छाम्यवमं स तददूतो वि वोचति.
क्व ऋतं पूर्व्य गतं कस्तद्विभर्ति नूतनो वित्तं मे अस्य रोदसी.
सरल हिंदी अर्थ
मैं देवों में आदिभूत एवं यज्ञ के योग्य अग्नि से निवेदन करता हूं कि वे मेरी बात देवों के दूत के रूप में उन्हें बता दें. हे अग्नि. तुम पूर्वकाल से स्तोताओं का जो कल्याण करते हो, वह कब किया? उस गुण को अब कौन धारण करता है? हे धरती और आकाश. मेरी यह बात जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि को देवताओं के दूत के रूप में संबोधित किया गया है. ऋषि अग्नि से अपनी बात देवताओं तक पहुंचाने का निवेदन करते हैं. साथ ही पूर्वकाल से स्तोताओं के कल्याण से जुड़े अग्नि के गुण का स्मरण किया गया है.
मंत्र 5
मंत्र
अमी ये देवा: स्थन त्रिष्वा रोचने दिव:.
कद्द ऋतं कदनृतं क्व प्रत्ना व आहुतिर्वित्तं मे अस्य रोदसी
सरल हिंदी अर्थ
हे देवों. सूर्य द्वारा प्रकाशित तीनों लोकों में तुम वर्तमान हो. तुम्हारा सत्य, असत्य एवं प्राचीन आहुति कहां है? हे धरती और आकाश. मेरी यह बात जानो.
सरल व्याख्या
यहां सूर्य से प्रकाशित तीनों लोकों में वर्तमान देवताओं का स्मरण किया गया है. ऋषि उनके सत्य, असत्य और प्राचीन आहुति से संबंधित बात पूछते हैं तथा धरती और आकाश से अपनी बात जानने का निवेदन करते हैं.
मंत्र 6
मंत्र
कद्ध ऋतस्य धर्णसि कद्वरुणस्य चक्षणम्.
कदर्यम्णो महस्पथाति क्रामेम दूढ्यो वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
हे देवों. तुम्हारा सत्यधारण कहां है? वरुण की कृपादृष्टि कहां है? महान अर्यमा का वह मार्ग कहां है, जिस पर चलकर हम पापबुद्धि शत्रुओं से दूर जा सकें? हे धरती और आकाश. हमारी इस बात को जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में देवताओं के सत्य और वरुण की कृपादृष्टि के बारे में पूछा गया है. साथ ही अर्यमा के उस मार्ग की कामना की गई है जिस पर चलकर पापबुद्धि रखने वाले शत्रुओं से दूर जाया जा सके.
मंत्र 7
मंत्र
अहं सो अस्मि यः पुरा सुते वदामि कानि चित्.
त॑ मा व्यन्त्याध्यो३ वृको न तृष्णजं मृगं वित्त मे अस्य रोदसी
सरल हिंदी अर्थ
हे देवों. मैं वही हूं, जिसने प्राचीनकाल में तुम्हारे निमित्त सोम निचोड़े जाने पर कुछ स्तोत्र बोले थे. जिस प्रकार प्यारे से हेन को व्याघ्र खा जाता है, उसी प्रकार मानसिक रूप से मुझे खा रहे हैं. हे धरती और आकाश. मेरे इस कष्ट को जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में ऋषि अपने पूर्व में किए गए स्तोत्र और सोम से जुड़े कर्म का स्मरण करते हैं. इसके बाद वे अपनी वर्तमान स्थिति को बहुत पीड़ादायक बताते हुए देवताओं से अपनी बात जानने का निवेदन करते हैं.
मंत्र 8
मंत्र
सं मा तपन्त्यभितः सपत्नीरिव पर्शव:.
मूषो न शिक्षा व्यदन्ति माध्य: स्तोतारं ते शतक्रतो वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. कुएं की आसपास की दीवारें मुझे उसी प्रकार दुखी कर रही हैं, जिस प्रकार कोई स्त्री अपने पति को कष्ट देती है. हे शतक्रतो. जिस तरह तुम स्तोता को काटते हो, उसी प्रकार दुःख मुझे खा रहे हैं. हे धरती और आकाश. मेरी यह बात जानो.
सरल व्याख्या
यहां कुएं में गिरने की स्थिति का उल्लेख स्पष्ट रूप से सामने आता है. ऋषि कुएं की आसपास की दीवारों से होने वाले कष्ट की तुलना एक स्त्री द्वारा अपने पति को दिए जाने वाले कष्ट से करते हैं. वे इंद्र से अपनी पीड़ा को दूर करने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 9
मंत्र
अमी ये सप्त रश्मयस्तत्रा मे नाभिरातता.
त्रितस्तद्वेदाप्त्य: स जामित्वाय रेभति वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
हे देवों. मित्ररूप देवताओं से जुड़ा हुआ यह यज्ञ हमारी ओर से तुम्हें अर्पित है. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश हमारी इस प्रार्थना का आदर करें.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में देवताओं और यज्ञ के संबंध का उल्लेख है. अंत में मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण करते हुए उनसे प्रार्थना का आदर करने का निवेदन किया गया है.
मंत्र 10
मंत्र
अमी ये पज्चोक्षणो मध्ये तस्थुर्महो दिव:.
देवत्रा नु प्रवाच्यं सप्रीचीना नि वावृतुर्वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
सूर्य की सात किरणों के साथ मेरा संबंध है. ऋषि अपने को आदित्य से संबंधित बताते हुए कहते हैं कि वे कुएं से निकलने के लिए सूर्य की किरणों की स्तुति करते हैं. धरती और आकाश से उनकी बात जानने का निवेदन किया गया है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में सूर्य की सात किरणों का उल्लेख है. ऋषि इन किरणों को कुएं से निकलने के साधन के रूप में स्मरण करते हैं और उनकी स्तुति करने की बात कहते हैं.
मंत्र 11
मंत्र
सुपर्णा एत आसते मध्य आरोधने दिव:.
ते सेधन्ति पथो वृक॑ तरन्तं यह्नतीरपो वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
आकाश में स्थित इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता पांच कामनावर्षी देव हमारे प्रशंसनीय स्तोत्र को एक साथ देवों के समीप ले जाएं और लौट आएं. हे धरती और आकाश. मेरी यह बात जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में पांच देवताओं का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता से ऋषि के प्रशंसनीय स्तोत्र को देवताओं तक ले जाने और लौटने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 12
मंत्र
नव्यं तदुक््थ्यं हितं देवास:
सुप्रवाचनम् ऋतमर्षन्ति सिन्धव: सत्यं तातान सूर्यो वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
सूर्य की किरणें सबको आवरण करने वाले आकाश में वर्तमान हैं. वे विशाल जल को पार करने वाले भेड़िए को रोकती हैं. हे धरती और आकाश. मेरी यह बात जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में सूर्य की किरणों को आकाश में स्थित और सबको आवरण करने वाली बताया गया है. उनके द्वारा विशाल जल को पार करने वाले भेड़िए को रोकने की बात कही गई है.
मंत्र 13
मंत्र
अग्ने तव त्यदुक्थ्य॑ देवेष्वस्त्याप्यम् स नः
सत्तो मनुष्वदा देवान्यक्षि विदुष्टरो वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
हे देवों. तुम छिपे हुए नवीन, स्तुत्य एवं वर्णनीय बल के कारण बहने वाली नदियां जल प्रवाहित करती हैं एवं सूर्य अपना नित्य वर्तमान तेज फैलाता है. हे धरती और आकाश. हमारी इस बात को जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में छिपे हुए नवीन और स्तुत्य बल का उल्लेख है. उसके कारण नदियों के जल प्रवाहित करने और सूर्य के अपने नित्य तेज को फैलाने की बात कही गई है.
मंत्र 14
मंत्र
सत्तो होता मनुष्वदा देवाँ अच्छा विदुष्टर:.
अन्निर्हव्या सुषूदति देवो देवेषु मेधिरो वित्तं मे अस्य रोदसी.
सरल हिंदी अर्थ
हे अग्नि. देवों के साथ तुम्हारी प्रशंसनीय प्राचीन बंधुता है एवं तुम अत्यंत जाने जाते हो. मनु के यज्ञ के समान हमारे यज्ञ में भी बैठकर देवों की हवि के द्वारा पूजा करो. हे धरती और आकाश. हमारी यह बात जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि की देवताओं के साथ प्राचीन बंधुता का उल्लेख किया गया है. ऋषि अग्नि से मनु के यज्ञ के समान अपने यज्ञ में भी उपस्थित होकर देवताओं की हवि के द्वारा पूजा करने का निवेदन करते हैं.
मंत्र 15
मंत्र
ब्रह्मा कृणोति वरुणो गातुविदं तमीमहे.
व्यूणोति हृदा मतिं नव्यो जायतामृतं वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
मनु के यज्ञ के समान हमारे यज्ञ में स्थित, देवों को बुलाने वाले, परम ज्ञानी, देवों में अधिक मेधावी अग्नि देव देवों को शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार हमारे हवि की ओर प्रेरित करें. हे धरती और आकाश. हमारी यह बात जानो.
सरल व्याख्या
यहां अग्नि को देवों को बुलाने वाला और परम ज्ञानी बताया गया है. ऋषि चाहते हैं कि अग्नि देवों को शास्त्रीय मर्यादा के अनुसार उनके द्वारा दी गई हवि की ओर प्रेरित करें.
मंत्र 16
मंत्र
असौ य: पन्था आदित्यो दिवि प्रवाच्यं कृतः.
न स देवा अतिक्रमे तं मर्तासो न पश्यथ वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
वरुण अग्नि का निवारण करते हैं. हम उन मार्गदर्शक वरुण से अभिमत फल मांगते हैं. हमारा स्तोता मन उन वरुण की मननीय स्तुति करता है. वे ही स्तुति योग्य वरुण हमारे लिए सच्चे बने. हे धरती और आकाश. हमारी बात जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में वरुण को मार्गदर्शक रूप में संबोधित किया गया है. ऋषि उनसे अभिमत फल की कामना करते हैं और उनकी मननीय स्तुति करते हैं. वरुण से अपने लिए सच्चा बने रहने की प्रार्थना भी की गई है.
मंत्र 17
मंत्र
त्रित: कूपेडवहितो देवान्हवत ऊतये.
तच्छुश्राव बृहस्पति: कृण्वन्नंहुरणादुरु वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
हे देवगण. जो सूर्य आकाश में सततगामी मार्ग के समान सबके द्वारा देखे जाते हैं, उनका अतिक्रमण तुम भी नहीं कर सकते. हे मनुष्यो. तुम उन्हें नहीं जानते. हे धरती और आकाश. हमारी बात जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में सूर्य के आकाश में सततगामी मार्ग का उल्लेख है. ऋषि देवताओं और मनुष्यों के संदर्भ में सूर्य के इस मार्ग की बात करते हैं तथा धरती और आकाश से इसे जानने का निवेदन करते हैं.
मंत्र 18
मंत्र
अरुणो मा सकृदवृकः पथा यन्तं ददर्श हि.
उज्जिहीते निचाय्या तष्टेव पृष्टयामयी वित्तं मे अस्य रोदसी..
सरल हिंदी अर्थ
कुएं में गिरा हुआ त्रित ऋषि अपनी रक्षा के लिए देवों को बुलाता है. बृहस्पति ने उसे पापरूप कुएं से निकालकर उसकी पुकार सुनी. हे धरती और आकाश. हमारी बात जानो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में त्रित ऋषि के कुएं में गिरने का प्रसंग स्पष्ट रूप से आता है. वे अपनी रक्षा के लिए देवताओं को बुलाते हैं. स्रोत के अनुसार बृहस्पति उन्हें पापरूप कुएं से निकालकर उनकी पुकार सुनते हैं.
मंत्र 19
मंत्र
एनाड्गूषेण वयमिन्द्रवन्तो$भि ष्याम वृजने सर्ववीरा:.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ
सरल हिंदी अर्थ
लाल रंग के वक ने मुझे एक बार मार्ग में जाते हुए देख लिया. वह मुझे देखकर उसी प्रकार ऊपर उछला, जिस प्रकार पीड़ा वाला काम करते-करते सहसा उठ पड़ता है. हे धरती और आकाश. मेरे इस कष्ट को जानो.
सरल व्याख्या
सूक्त के अंतिम मंत्र में लाल रंग के वक द्वारा ऋषि को मार्ग में देखते हुए उसका उल्लेख आता है. उसके देखने पर उसके ऊपर उछलने का वर्णन किया गया है. मंत्र के अंत में फिर धरती और आकाश से इस कष्ट को जानने का निवेदन किया गया है.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 105 विश्वेदेवों को समर्पित है और इसमें अलग-अलग देवताओं तथा प्राकृतिक शक्तियों के माध्यम से सुरक्षा, सत्य, कल्याण और अभिलाषित फल की प्रार्थनाएं सामने आती हैं. सूक्त की शुरुआत चंद्रमा के आकाश में विचरण से होती है और बार-बार धरती तथा आकाश से ऋषि की बात जानने का निवेदन किया जाता है.
सूक्त के आरंभिक मंत्रों में धन प्राप्ति, संतान, पूर्वपुरुषों और पितरों से जुड़े भाव आते हैं. इसके बाद अग्नि को देवताओं के दूत के रूप में संबोधित किया गया है. ऋषि अग्नि से अपनी बात देवताओं तक पहुंचाने का निवेदन करते हैं.
सूक्त का एक महत्वपूर्ण प्रसंग कुएं में गिरे त्रित ऋषि का है. मंत्रों में कुएं से उत्पन्न कष्ट का वर्णन मिलता है और सूर्य की किरणों की स्तुति करके उससे निकलने की बात कही गई है. बाद में बृहस्पति द्वारा त्रित को कुएं से निकालने का भी उल्लेख है.
सूक्त में सूर्य की सात किरणों, सूर्य के आकाश में मार्ग, नदियों के जल प्रवाह और अग्नि के देवताओं से संबंध का भी वर्णन मिलता है. पांच कामनावर्षी देवताओं के रूप में इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता का उल्लेख भी किया गया है.
बाद के मंत्रों में अग्नि की देवताओं के साथ प्राचीन बंधुता, यज्ञ में उनकी उपस्थिति और हवि को देवताओं तक पहुंचाने की बात आती है. इसके बाद वरुण को मार्गदर्शक के रूप में संबोधित किया गया है और उनसे अभिमत फल की प्रार्थना की गई है.
अंतिम मंत्रों में सूर्य के सततगामी मार्ग का उल्लेख है और फिर त्रित ऋषि के कुएं में गिरने तथा बृहस्पति द्वारा उनकी पुकार सुनने का प्रसंग आता है. अंतिम मंत्र में लाल रंग के वक द्वारा ऋषि को देखे जाने का वर्णन है.