ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 97. अग्नि से पाप नाश, रक्षा और कल्याण की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 97 अग्नि देव को समर्पित है. यह सूक्त आकार में छोटा है, लेकिन इसमें अग्नि से बार-बार एक ही प्रमुख प्रार्थना की गई है. ऋषि अग्नि से पाप को नष्ट करने, धन की रक्षा करने, शत्रुओं से बचाने और कल्याण के लिए सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने का निवेदन करते हैं.
इस सूक्त में अग्नि को सर्वतोमुख बताया गया है. जैसे नाव की सहायता से नदी को पार किया जाता है, उसी प्रकार अग्नि से प्रार्थना की गई है कि वे यजमान को कठिनाइयों से पार कराकर शत्रुरहित और कल्याणकारी स्थान तक पहुंचाएं.
मंत्र 1
मंत्र
अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिमू. अप न: शोशुचदघ
सरल अर्थ
हे अग्नि. हमारा पाप नष्ट हो. तुम हमारे धन को सब ओर से प्रकाशित करो. हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
सूक्त का आरंभ अग्नि से सीधी प्रार्थना के साथ होता है. ऋषि उनसे सबसे पहले अपने पाप को दूर करने का निवेदन करते हैं. इसके साथ अग्नि से धन को चारों ओर से प्रकाशित करने की भी प्रार्थना की गई है.
मंत्र 2
मंत्र
सुक्षेत्रिया सुगातुया वसूया च यजामहे. अप न: शोशुचदघम्
सरल अर्थ
हे अग्नि. हम शोभन क्षेत्र, शोभन मार्ग और धन की इच्छा से हवि द्वारा तुम्हारी पूजा करते हैं. हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
इस मंत्र में यजमान की प्रार्थना और अधिक स्पष्ट होती है. अग्नि की पूजा करते हुए शोभन क्षेत्र, अच्छे मार्ग और धन की कामना की गई है. साथ ही पाप को दूर करने की प्रार्थना फिर दोहराई गई है.
मंत्र 3
मंत्र
प्र यद्धन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्व सूरय:. अप नः शोशुचदघम्
सरल अर्थ
हे अग्नि. हमारे स्तोता कुत्स के समान श्रेष्ठ हों. वे सभी स्तोताओं में उत्तम हों. हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
इस मंत्र में स्तुति करने वालों के श्रेष्ठ होने की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि उनके स्तोता उत्तम हों और उनकी स्तुति प्रभावशाली हो. मंत्र का अंत फिर पाप नष्ट होने की प्रार्थना से होता है.
मंत्र 4
मंत्र
प्र यत्ते अग्ने सूरयो जायेमहि प्र ते वयम्. अप न: शोशुचदघम्
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम्हारी स्तुति करने वाले पुत्र-पौत्र पाकर बढ़ते हैं. इसलिए हम भी तुम्हारी स्तुति करके बढ़ें. हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
यहां अग्नि की स्तुति और वंश की वृद्धि का संबंध बताया गया है. स्रोत के अनुसार जो अग्नि की स्तुति करते हैं, वे पुत्र-पौत्र प्राप्त करके बढ़ते हैं. इसी आधार पर ऋषि स्वयं भी अग्नि की स्तुति करके बढ़ने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 5
मंत्र
प्र यदग्ने: सहस्वतो विश्वतों यन्ति भानव:. अप न: शोशुचदघम्.
सरल अर्थ
हे अग्नि. शत्रुओं को पराजित करने वाली तुम्हारी किरणें सभी जगह जाती हैं. इसलिए हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि की किरणों को शत्रुओं को पराजित करने वाली बताया गया है. वे सभी स्थानों तक जाती हैं. ऋषि ऐसी अग्नि से अपने पाप के नष्ट होने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 6
मंत्र
त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि, अप नः शोशुचदघम्
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम्हारे मुख चारों ओर हैं, इसलिए तुम चारों ओर से हमारी रक्षा करो. हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि को विश्वतोमुख कहा गया है. उनके मुख चारों ओर होने के कारण ऋषि उनसे चारों दिशाओं से अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं. साथ ही पाप के नष्ट होने की प्रार्थना यहां भी दोहराई गई है.
मंत्र 7
मंत्र
द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेक पारय, अप न: शोशुचदघम्
सरल अर्थ
हे सर्वतोमुख अग्नि. जिस प्रकार नाव से नदी को पार करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे कल्याण के लिए हमें शत्रुरहित देश में पहुंचाओ. हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
यहां अग्नि से की गई प्रार्थना में नदी पार करने का उदाहरण दिया गया है. जैसे नाव मनुष्य को नदी के पार ले जाती है, वैसे ही अग्नि से प्रार्थना की गई है कि वे यजमान को शत्रुरहित स्थान तक पहुंचाएं.
मंत्र 8
मंत्र
स नः सिन्धुमिव नावयाति पर्षा स्वस्तये. अप न: शोशुचदघम्
सरल अर्थ
हे अग्नि. जिस प्रकार नाव से नदी को पार करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे कल्याण के लिए हमें शत्रुरहित देश में पहुंचाकर हमारा पालन करो. हमारा पाप नष्ट हो.
व्याख्या
सूक्त का अंतिम मंत्र भी नाव और नदी के उदाहरण के साथ अग्नि से प्रार्थना करता है. ऋषि चाहते हैं कि अग्नि उन्हें सुरक्षित रूप से कल्याणकारी और शत्रुरहित स्थान तक पहुंचाएं तथा उनका पालन करें. मंत्र के अंत में फिर वही प्रार्थना आती है कि हमारा पाप नष्ट हो. इसके बाद स्रोत में सूक्त 98, देवता अग्नि, आरंभ होता है.
सूक्त का सार
सूक्त में अग्नि से धन को प्रकाशित करने, शोभन क्षेत्र और मार्ग प्राप्त कराने, स्तोताओं को श्रेष्ठ बनाने तथा पुत्र-पौत्रों के साथ वृद्धि देने की कामना की गई है. अग्नि की किरणों को शत्रुओं को पराजित करने वाली बताया गया है और उनके सर्वतोमुख स्वरूप से चारों ओर से रक्षा की प्रार्थना की गई है.
अंतिम दो मंत्रों में नदी पार करने वाली नाव का उदाहरण आता है. जैसे नाव नदी पार कराती है, उसी प्रकार अग्नि से प्रार्थना की गई है कि वे यजमान को शत्रुरहित स्थान तक पहुंचाएं और उसके कल्याण के लिए उसका पालन करें.