ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 95. अग्नि के रहस्यमय स्वरूप और विश्व में उनके प्रकाश का वर्णन
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 95 अग्नि देव को समर्पित है. इस सूक्त में अग्नि के जन्म, उनके अनेक रूपों, जल और आकाश से उनके संबंध तथा पृथ्वी और समस्त प्राणियों के बीच उनके प्रकाश के विस्तार का वर्णन मिलता है.
इस सूक्त में अग्नि को एक रहस्यमय और व्यापक शक्ति के रूप में देखा गया है. वे जल में गर्भ के समान स्थित हैं, फिर प्रकट होकर अपने तेज से पृथ्वी और आकाश को प्रकाशित करते हैं. उनके जन्मस्थान को लेकर प्रश्न किया गया है और उनके विभिन्न रूपों का वर्णन किया गया है. सूक्त में अग्नि को माता-पिता से उत्पन्न होने वाला, फिर भी स्वयं अपनी शक्ति से बढ़ने वाला बताया गया है.
मंत्र 1
मंत्र
द्वे विरूपे चरतः स्वर्थे अन्यान्या वत्समुप धापयेते.
हरिरन्यस्यां भवति स्वधावाउ्छुक्रो अन्यस्यां ददृशे सुव
सरल अर्थ
हे अग्नि. दो विपरीत रूप वाली शक्तियां अपने सुंदर कार्य के लिए चलती हैं और एक-दूसरे को बछड़े के समान पालती हैं. तुम अपने तेजस्वी रूप से स्वर्ण और रजत के समान चमकते हुए धन को धारण करते हो.
व्याख्या
सूक्त की शुरुआत अग्नि के दो भिन्न रूपों के उल्लेख से होती है. स्रोत में इन्हें परस्पर संबंधित बताया गया है. अग्नि अपने तेज और प्रकाश से प्रकाशित होते हैं और उनके स्वरूप में चमक तथा संपत्ति का संबंध दिखाई देता है.
मंत्र 2
मंत्र
दशेम॑ त्वष्टर्जनयन्त गर्भमतन्द्रासो युवतयो विभृत्रम्.
तिग्मानीकं॑ स्वयशसं जनेषु विरोचमानं परि षीं नयन्ति
सरल अर्थ
हे दिन और रात. तुम दोनों सुंदर प्रयोजन वाले हो और एक-दूसरे से विपरीत रूप रखते हुए चलते हो. दिन और रात दोनों अपने पुत्रों के समान अग्नि और सूर्य की रक्षा करते हैं. रात के समय सूर्य अपना सुंदर रूप प्राप्त करता है और अगले दिन के समय वह फिर प्रकाशमान दिखाई देता है.
व्याख्या
इस मंत्र में दिन और रात के क्रम के साथ अग्नि और सूर्य का संबंध बताया गया है. दोनों विपरीत रूप में चलते हुए भी एक-दूसरे से जुड़े हैं. दिन और रात के इस क्रम में अग्नि और सूर्य की उपस्थिति का वर्णन किया गया है.
मंत्र 3
मंत्र
त्रीणि जाना परि भूषन्त्यस्य समुद्र एकं दिव्येकमप्सु,
पूर्वामनु प्र दिशं पार्थिवानामृतून्प्रशासद्वि दधावनु
सरल अर्थ
अपने जगत्पोषण रूप कार्य में आलस्यरहित, नित्य युवा और दसों दिशाओं तथा मेघों में गर्भ रूप से वर्तमान वायु सभी पदार्थों में वर्तमान, तीक्ष्ण तेजयुक्त और अत्यंत यशस्वी अग्नि को उत्पन्न करती है. इसी अग्नि को सब जगह ले जाया जाता है.
व्याख्या
यहां अग्नि के जन्म और उनके व्यापक रूप का वर्णन है. स्रोत के अनुसार अग्नि वायु और मेघों से संबंधित होकर विभिन्न स्थानों में विद्यमान दिखाई देते हैं. उनके तेज को तीक्ष्ण और अत्यंत यशस्वी बताया गया है.
मंत्र 4
मंत्र
कइमंवो मात कप चिकेत वत्सो स्वधाभि:.
बद्दीनां गर्भो न श्वरति स्वधावान..
सरल अर्थ
समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष अग्नि के तीन जन्मस्थान हैं. सूर्यरूप अग्नि ने ऋतुओं को विकसित करते हुए पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणियों के लिए पूर्व दिशा को अग्नि से प्रकाशित किया.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के तीन जन्मस्थानों का उल्लेख किया गया है. समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष से अग्नि के संबंध को बताया गया है. सूर्यरूप अग्नि के द्वारा पूर्व दिशा को प्रकाशित करने की बात भी इसी मंत्र में आती है.
मंत्र 5
मंत्र
आविष्ट्यो वर्धते चारुरासु जिह्यानामूर्थध्व: स्वयशा उपस्थे,
उभे त्वष्टूबिभ्यतुर्जायमानात्प्रतीची सिंहं प्रति जोष
सरल अर्थ
हे यजमान. जल, वन आदि में गर्भरूप से स्थित अग्नि को तुममें से कौन जानता है. अर्थात कोई नहीं. यह पुत्र होकर भी अपनी जलरूपी माताओं को हवि द्वारा जन्म देता है. यह प्रौढ़ तेज वाला, क्रांतदर्शी और हवि रूप अन्न से युक्त अग्नि अनेक प्रकार की ज्वालाओं को उत्पन्न करने वाला बनकर समुद्र से सूर्य रूप में निकलता है.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के जल में गर्भ के समान स्थित होने का वर्णन है. स्रोत में अग्नि को पुत्र कहा गया है, फिर भी वे अपनी जलरूपी माताओं को जन्म देने वाले बताए गए हैं. आगे अग्नि के समुद्र से सूर्य रूप में निकलने और अनेक ज्वालाओं को उत्पन्न करने का वर्णन मिलता है.
मंत्र 6
मंत्र
उभे भद्रे जोषयेते न मेने गावो न वाश्रा उप तस्थुरेवै:.
स दक्षाणां दक्षपतिर्बभूवाञ्जन्ति यं दक्षिणतो हविर्भि:..
सरल अर्थ
मेघों में तिरछे रहने वाले जल की गोद में रहकर भी ऊपर की ओर जलता हुआ अग्नि शोभन दीप्ति वाला बनकर चमकता और बढ़ता है. त्वष्टा से उत्पन्न अग्नि से धरती और आकाश दोनों डरते हैं तथा सहनशील अग्नि के समीप आकर उसकी सेवा करते हैं.
व्याख्या
यहां अग्नि को मेघों में स्थित जल के बीच भी ऊपर की ओर बढ़ते हुए तेजस्वी रूप में दिखाया गया है. अग्नि के तेज से पृथ्वी और आकाश दोनों के प्रभावित होने का वर्णन इस मंत्र में किया गया है.
मंत्र 7
मंत्र
उद्यंयमीति सवितेव बाहू उभे सिचौ यतते भीम ऋज्जन्.
उच्छुक्रमत्कमजते सिमस्मान्नवा मातृभ्यो वसना जहाति.
सरल अर्थ
रात और दिन दोनों शोभन स्त्रियों के समान अग्नि की सेवा करते हैं और शांत हुई गायों के समान उनके पास आकर ठहरते हैं. आह्वान किए जाने वाले अग्नि के दक्षिण भाग में स्थित होकर ऋत्विज जिस अग्नि को हवि द्वारा तृप्त करते हैं, वह समस्त बलों का स्वामी बनता है.
व्याख्या
इस मंत्र में दिन और रात को अग्नि की सेवा करने वाली शक्तियों के रूप में प्रस्तुत किया गया है. यज्ञ में ऋत्विजों द्वारा अग्नि को हवि देने और उनके बलशाली स्वरूप का भी वर्णन किया गया है.
मंत्र 8
मंत्र
त्वेषं रूपं कृणुत उत्तरं यत्संपृज्चान: सदने गोभिरद्धि:.
कविर्बुध्न॑ परि मर्मुज्यते धी: सा देवताता समितिर्बभूव
सरल अर्थ
भयंकर अग्नि सूर्य की किरणों के समान अपनी शक्ति का विस्तार करता है और पृथ्वी तथा आकाश दोनों को अलंकृत करके उनके काम में लगाता है. वह सभी पदार्थों से तेजस्वी और साररूप रस ग्रहण करता है. वह अपनी माता रूप जल से संसार को ढकने वाला नवीन तेज उत्पन्न करता है.
व्याख्या
अग्नि के अत्यंत तेजस्वी और व्यापक रूप का वर्णन यहां किया गया है. उनकी शक्ति पृथ्वी और आकाश दोनों तक फैलती है. स्रोत में अग्नि के द्वारा पदार्थों से तेज और सार ग्रहण करने तथा जल से नया तेज उत्पन्न करने की बात कही गई है.
मंत्र 9
मंत्र
उरु ते जय: पर्यति बुध्नं विरोचमानं महिषस्य धाम.
विश्वेभिरग्ने स्वयशोभिरिद्धो5दब्धेभि: पायुभि: पाहा[स्मा
सरल अर्थ
जब अग्नि अंतरिक्ष में चलने वाले जलों से संयुक्त होकर तेजस्वी एवं सर्वोत्तम प्रकाश धारण करते हैं, तब क्रांतदर्शी एवं सर्वाधार अग्नि समस्त जल के मूलभूत आकाश को अपने तेज से ढक लेते हैं. तेजस्वी अग्नि द्वारा फैलाई हुई चमक तेजसमूह बन गई थी.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के आकाश और जल से संबंध का वर्णन आगे बढ़ता है. जब अग्नि जल से संयुक्त होकर तेजस्वी होते हैं, तब उनका प्रकाश आकाश के व्यापक क्षेत्र को अपने प्रभाव में ले लेता है.
मंत्र 10
मंत्र
धन्वन्त्स्रोत: कृणुते गातुमूर्मि शुक्रैरूमिभिरभि नक्षति क्षाम्.
विश्वा सनानि जठरेषु धत्ते3न्तर्नवासु चरति प्रसूषु
सरल अर्थ
हे महान अग्नि. तुम्हारा प्रकाश बहुत दूर तक फैलता है और तुम्हारा तेज अत्यंत महान है. तुम अपने तेज से आकाश को चारों ओर से घेरे हुए हो और अपने प्रज्वलित रूप के साथ यहां आते हो.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के व्यापक प्रकाश और महान तेज का वर्णन किया गया है. उनका प्रकाश दूर-दूर तक फैलता है और उनके तेज से आकाश प्रकाशित होता है.
मंत्र 11
मंत्र
एवा नो अग्ने समिधा वृधानो रेवत्पावक श्रवसे वि भाहि.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:
सरल अर्थ
अग्नि आकाश में गमनशील जलसमूह को प्रवाह का रूप देते हैं और उसी निर्मल किरणों वाले जलसमूह से धरती को भिगोते हैं. वे जठर में संपूर्ण अन्न को धारण करते हैं, इसलिए वर्षा के पश्चात उत्पन्न नवीन फसलों के भीतर रहते हैं.
व्याख्या
सूक्त के अंतिम मंत्र में अग्नि का जल और अन्न से संबंध सामने आता है. अग्नि आकाश में स्थित जलसमूह को प्रवाह देते हैं और उससे धरती सिंचित होती है.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 95 अग्नि के जन्म, उनके विभिन्न स्थानों में स्थित होने और उनके व्यापक प्रकाश का वर्णन करता है. इसमें अग्नि के समुद्र, आकाश और अंतरिक्ष से संबंध का उल्लेख है. जल में गर्भ के समान स्थित अग्नि के प्रकट होने और सूर्यरूप में प्रकाशित होने का भी वर्णन मिलता है.
इस सूक्त में अग्नि केवल यज्ञ की अग्नि के रूप में सामने नहीं आते. उनके साथ जल, सूर्य, आकाश, पृथ्वी, दिन और रात तथा वनस्पति और अन्न का संबंध भी बताया गया है. कहीं वे जल में स्थित गर्भ के समान हैं, कहीं सूर्य के रूप में प्रकाश देते हैं और कहीं अपने प्रचंड तेज से पृथ्वी और आकाश को प्रभावित करते हैं.
सूक्त के अंतिम भाग में अग्नि के प्रकाश और जल के संबंध का वर्णन मिलता है. अग्नि जलसमूह को प्रवाहित करते हैं, जल धरती को भिगोता है और वर्षा के बाद उत्पन्न होने वाली नई फसलों में भी अग्नि के स्थित होने का उल्लेख किया गया है. इस प्रकार सूक्त 95 में अग्नि के स्वरूप को प्रकृति के अनेक रूपों के साथ जोड़ा गया है.