ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 94. अग्नि की स्तुति और यजमान की रक्षा की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 94 अग्नि देव को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि अग्नि की स्तुति करते हुए उनसे यज्ञ को सफल बनाने, यजमान की रक्षा करने, धन और सामर्थ्य देने तथा शत्रुओं और अनिष्ट से बचाने की प्रार्थना करते हैं.
इस सूक्त में अग्नि को यज्ञ का जानकार, देवताओं तक हवि पहुंचाने वाला, सबको प्रकाशित करने वाला और यजमान का हित करने वाला बताया गया है. ऋषि बार-बार अग्नि से अपनी मित्रता बनाए रखने और किसी के द्वारा हिंसित न होने देने की प्रार्थना करते हैं.
सूक्त में अग्नि के अनेक रूपों और कार्यों का वर्णन मिलता है. कहीं वे यज्ञ में पुरोहित और होता के रूप में दिखाई देते हैं, कहीं रात के अंधकार को दूर करने वाले प्रकाश के रूप में और कहीं वन को जलाने वाले तेजस्वी अग्नि के रूप में.
मंत्र 1
मंत्र
इमं स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया.
भद्रा हि नः प्रमतिरस्य संसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
जिस प्रकार बढ़ई रथ का निर्माण करता है, उसी प्रकार हम पूज्य और सब प्राणियों को जानने वाले अग्नि के प्रति बुद्धि से निर्मित यह स्तुति समर्पित करते हैं. हे अग्नि. तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हम हिंसा को प्राप्त न हों.
व्याख्या
सूक्त का आरंभ अग्नि की स्तुति से होता है. ऋषि अपनी स्तुति की तुलना रथ बनाने से करते हैं. जिस प्रकार रथ को सावधानी से बनाया जाता है, उसी प्रकार अग्नि के लिए यह स्तुति भी विचारपूर्वक तैयार की गई है. यहां अग्नि से उनकी मित्रता बनाए रखने और किसी प्रकार की हिंसा से बचने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 2
मंत्र
यस्मै त्वमायजसे स साधत्यनर्वा क्षेति दधते सुवीर्यम्.
स तूताव नैनमश्नोत्यंहतिरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम जिस यजमान के लिए यज्ञ करते हो, वह अभिष्ट प्राप्त कर लेता है, शत्रुओं की पीड़ा से रहित होकर निवास करता है, उत्तम शक्ति धारण करता है और वृद्धि पाता है. उसे तुम्हारी दरिद्रता नहीं मिलती. हम तुम्हारी मित्रता को पाकर किसी के द्वारा सताए न जाएं.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि की कृपा से यजमान को प्राप्त होने वाले फल बताए गए हैं. अग्नि जिस यजमान के लिए यज्ञ करते हैं, उसके लिए अभिष्ट प्राप्ति, शत्रुओं से सुरक्षा, शक्ति और वृद्धि की कामना की गई है.
मंत्र 3
मंत्र
शकेम त्वा समिधं साधया धियस्त्वे देवा हविरदन्त्याहुतम्.
त्वमादित्याँ आ वह तान्हा१ श्मस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. हम तुम्हें अच्छी तरह प्रज्वलित कर सकें और तुम हमारे यज्ञों को पूरा करो, क्योंकि ऋत्विजों द्वारा तुममें डाला गया हवि देवगण भक्षण करते हैं. तुम अदितिपुत्र देवताओं को यज्ञ में लाने वाले हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त कर लेने पर हम किसी की हिंसा का शिकार न हों.
व्याख्या
यहां अग्नि की यज्ञ में विशेष भूमिका सामने आती है. यज्ञ में दी गई हवि अग्नि के माध्यम से देवताओं तक पहुंचती है. इसलिए ऋषि अग्नि को यज्ञ को पूरा कराने और देवताओं को यज्ञ में लाने वाला बताते हैं.
मंत्र 4
मंत्र
भरामेध्मं कृणवामा हवींषि ते चितयन्तः पर्वणापर्वणा वयम्.
जीवाततवे प्रतरं साधया धियो5ग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. हम तुम्हारे यज्ञ के लिए ईंधन एकत्र करते हैं और प्रत्येक पर्व पर दर्शन करने के लिए यज्ञ करते हुए तुम्हें जानकर हवि देते हैं. तुम हमारे जीवनकाल को बढ़ाने के लिए यज्ञ को पूर्ण करो. तुम हमारे मित्र बन गए हो, अब कोई हमारी हिंसा न करे.
व्याख्या
इस मंत्र में नियमित रूप से अग्नि की सेवा और यज्ञ करने का वर्णन है. ऋषि अग्नि से यज्ञ को पूर्ण कराने और जीवनकाल बढ़ाने की प्रार्थना करते हैं. साथ ही उनकी मित्रता को सुरक्षा से जोड़ा गया है.
मंत्र 5
मंत्र
विशां गोपा अस्य चरन्ति जन्तवो द्विपच्च यदुत चतुष्पदक्तुभि:.
चित्र: प्रकेत उषसो महाँ अस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
अग्नि की किरणें समस्त प्राणियों की रक्षा करती हुई विचरण करती हैं. दो पैर और चार पैर वाले जीव उनकी किरणों से युक्त हो जाते हैं. हे अग्नि. तुम विचित्र प्रकाश से युक्त, सबका ज्ञान कराने वाले और उषा से भी महान हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के प्रकाश का वर्णन किया गया है. उनकी किरणों को सभी प्राणियों की रक्षा करने वाली बताया गया है. अग्नि के प्रकाश से संसार प्रकाशित और ज्ञानयुक्त होता है.
मंत्र 6
मंत्र
त्वमध्वर्युरुत होतासि पूर्व्य: प्रशास्ता पोता जनुषा पुरोहितः.
विश्वा विद्वाँ आर्व्विज्या धीर पुष्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम यज्ञों को देवों के प्रति पहुंचाने वाले अध्वर्यु, होता, प्रशास्ता, पोता और जन्म से ही पुरोहित हो. तुम ऋत्विजों के समस्त कर्मों को जानते हो. इसलिए हमारा यज्ञ पूरा करो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के यज्ञ से जुड़े अनेक रूपों का वर्णन मिलता है. उन्हें अध्वर्यु, होता, प्रशास्ता, पोता और पुरोहित कहा गया है. इससे यज्ञ में अग्नि की महत्वपूर्ण भूमिका स्पष्ट होती है.
मंत्र 7
मंत्र
यो विश्वतः सुप्रतीक: सदृड़डसि दूरे चित्सन्तव्ठिदिवाति रोचसे.
रात्र्याश्चिदन्न्धो अति देव पश्यस्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम शोभन अंग वाले होते हुए भी सबके समान हो और दूर रहकर भी समीप दिखाई देते हो. हे देव. तुम रात के अंधकार का नाश करके चमकते हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
यहां अग्नि के प्रकाश का विशेष वर्णन है. वे दूर रहकर भी समीप दिखाई देते हैं और उनके प्रकाश से रात का अंधकार दूर हो जाता है. ऋषि फिर उनकी मित्रता और सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 8
मंत्र
पूर्वो देवा भवतु सुन्वतो रथो<स्माकं शंसो अभ्यस्तु दूढय:.
तदा जानीतोत पुष्यता वचोःग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे देव. सोम निचोड़ने वाले यजमान का रथ अन्य यजमानों के रथ से आगे हो. हमारा पाप हमारे शत्रुओं को बाधा पहुंचाए. तुम हमारी स्तुति पर ध्यान दो और उसके अनुकूल चलकर हमें पुष्ट करो. हे अग्नि. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में यजमान के लिए आगे बढ़ने और पुष्ट होने की कामना की गई है. ऋषि अग्नि से अपनी स्तुति सुनने और उसके अनुकूल होकर यजमान को सहायता देने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 9
मंत्र
वर्ध॑र्दु:शंसाँ अप दूढ्यो जहि दूरे वा ये अन्ति वा के चिदत्रिण.
अथा यज्ञाय गृणते सुगं कृध्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम हनन करने वाले आयुधों से अपवाद के पात्र और दुर्बुद्धि लोगों का वध करो, जो शत्रु हमारे समीप आए हैं, उनका नाश करो. इस प्रकार स्तुति करने वाले यजमान का मार्ग शोभन बनाओ. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि से शत्रुओं और दुर्बुद्धि लोगों से रक्षा की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि अग्नि बाधाओं को दूर करके यजमान का मार्ग सुगम बनाएं.
मंत्र 10
मंत्र
यदयुक्था अरुषा रोहिता रथे वातजूता वृषभस्येव ते रवः.
आदिन्वसि वनिनो धूमकेतुनाग्ने सख्ये मा रिषाम वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम तेजस्वी, लाल रंग वाले एवं वायु वेग वाले दोनों घोड़ों को रथ में जोड़ते हो. उनका शब्द वृषभ के समान है. तुम अपने धूम के साथ वन को घेरे लेते हो और वन में रहने वाले जीव तुम्हारे तेज से डर जाते हैं. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के प्रचंड और गतिशील रूप का वर्णन है. लाल घोड़ों और उनके रथ की कल्पना के साथ अग्नि के वन में फैलने और उसके प्रभाव का वर्णन किया गया है.
मंत्र 11
मंत्र
अध स्वनादुत बिभ्यु: पतत्रिणो द्रप्सा यत्ते यवसादो व्यस्थिरन्.
सुगं तत्ते तावकेभ्यो रथेभ्यो5ग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. वन प्रदेश को जलाने वाला तुम्हारा शब्द सुनकर पक्षी डर जाते हैं. जब तुम्हारी ज्वालाएं वन में वर्तमान तृणों को भक्षण करके सभी ओर फैलती हैं, तब तुम्हारे लिए एवं तुम्हारे रथ के लिए समस्त अरण्य सुंदर बन जाता है. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में वन में फैलती अग्नि का दृश्य प्रस्तुत किया गया है. अग्नि की ज्वालाएं तृणों को भक्षण करते हुए चारों ओर फैलती हैं और उनके प्रचंड स्वर से पक्षी भयभीत होते हैं.
मंत्र 12
मंत्र
अयं मित्रस्य वरुणस्य धायसे 5वयातां मरुतां हैव्गे अद्भुत:.
मृव्ठा सु नो भूत्वेषां मन: पुनरग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
अग्नि के स्तोता को मित्र और वरुण धारण करें. अंतरिक्ष में वर्तमान मरुतों का क्रोध महान होता है. हे अग्नि. हमारी रक्षा करो. इन मरुतों का मन हमारे प्रति प्रसन्न हो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में अग्नि के साथ मित्र, वरुण और मरुद्गणों का स्मरण आता है. ऋषि अग्नि से अपनी रक्षा करने और मरुद्गणों के मन को अपने प्रति प्रसन्न रखने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 13
मंत्र
देवो देवानामसि मित्रो अद्भुतो वसुर्वसूनामसि चारुरध्वरे,
शर्मन्त्स्याम तव सप्रथस्तमें5ग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे तेजस्वी अग्नि. तुम सब देवों के परम मित्र हो. तुम सुंदर हो और यज्ञ की समस्त संपत्तियों के निवास हो. हम तुम्हारे अति विस्तृत यज्ञगृह में वर्तमान हैं. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
यहां अग्नि को सभी देवताओं का परम मित्र और यज्ञ की संपत्तियों का निवास बताया गया है. ऋषि स्वयं को अग्नि के विस्तृत यज्ञगृह में उपस्थित बताते हुए उनकी मित्रता और संरक्षण की कामना करते हैं.
मंत्र 14
मंत्र
तत्ते भद्रं यत्समिद्धः स्वे दमे सोमाहुतो जरसे मृत्ठयत्तम:.
दधासि रत्न द्रविणं च दाशुषे5ग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव..
सरल अर्थ
हे अग्नि. जिस समय तुम अपने स्थान पर प्रज्वलित एवं सोम द्वारा आहुत होकर ऋत्विजों की स्तुति का विषय बनते हो, उस समय अत्यंत भद्र प्राप्त करते हो. तुम हमारे लिए परम सुखकारक एवं यजमान के लिए रमणीय यज्ञफल तथा धन देने वाले बनो. तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हम किसी के द्वारा हिंसित न हों.
व्याख्या
इस मंत्र में यज्ञ में प्रज्वलित अग्नि का वर्णन है. सोम की आहुति और ऋत्विजों की स्तुति के साथ अग्नि का संबंध बताया गया है. ऋषि उनसे यजमान के लिए यज्ञफल और धन देने की प्रार्थना करते हैं.
मंत्र 15
मंत्र
यस्मै त्वं सुद्रविणो ददाशो&नागास्त्वमदिते सर्वताता.
यं भद्रेण शवसा चोदयासि प्रजावता राधसा ते स्याम..
सरल अर्थ
हे शोभन धन से सम्पन्न एवं अखंडनीय अग्नि. समस्त यज्ञों में वर्तमान जिस यजमान को तुम पाप से रहित करके कल्याणकारी बल से युक्त करते हो, वह समृद्ध होता है. तुम्हारी स्तुति करने वाले हम पुत्र-पौत्र आदि वाले धन से युक्त हों.
व्याख्या
यहां अग्नि की कृपा से यजमान के समृद्ध होने की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि अग्नि यजमान को पाप से रहित करके कल्याणकारी शक्ति दें और उसके जीवन में पुत्र-पौत्र तथा धन की वृद्धि हो.
मंत्र 16
मंत्र
स त्वमग्ने सौभगत्वस्य विद्वानस्माकमायु: प्र तिरेह देव.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौ:
सरल अर्थ
हे अग्नि. तुम सौभाग्य को जानते हुए इस यज्ञकर्म में हमारी आयु बढ़ाओ. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश हमारी उस आयु की रक्षा करें.
व्याख्या
सूक्त का अंतिम मंत्र अग्नि से आयु बढ़ाने की प्रार्थना के साथ समाप्त होता है. साथ ही मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश से भी उस आयु की रक्षा करने का निवेदन किया गया है.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 94 अग्नि की विस्तृत स्तुति है. इसमें अग्नि को यज्ञ का जानकार, देवताओं तक हवि पहुंचाने वाला, यज्ञ को पूर्ण कराने वाला और यजमान का हित करने वाला बताया गया है. ऋषि बार-बार अग्नि से अपनी मित्रता बनाए रखने और किसी भी प्रकार की हिंसा से बचाने की प्रार्थना करते हैं.
सूक्त में अग्नि के प्रकाशमय स्वरूप का भी वर्णन है. उनकी किरणें प्राणियों की रक्षा करती हैं और उनका प्रकाश रात के अंधकार को दूर करता है. दूसरी ओर वन में प्रकट अग्नि का प्रचंड रूप भी सामने आता है, जहां उनकी ज्वालाओं और धुएं से वन के जीव भयभीत होते हैं.
आगे अग्नि को मित्र, वरुण और मरुद्गणों से जुड़े हुए रूप में स्मरण किया गया है. उनसे यजमान की रक्षा, शत्रुओं के नाश, यज्ञ की सिद्धि, धन, शक्ति, पुत्र-पौत्र और दीर्घायु की प्रार्थना की गई है. अंतिम मंत्र में अग्नि से आयु बढ़ाने और मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी तथा आकाश से उस आयु की रक्षा करने का निवेदन किया गया है.
इस सूक्त में “अग्नि की मित्रता” का भाव बार-बार आता है. लगभग प्रत्येक प्रार्थना के साथ ऋषि यह कामना करते हैं कि अग्नि की मित्रता प्राप्त करके वे किसी के द्वारा हिंसित न हों. यही भाव पूरे सूक्त को एक सूत्र में बांधता है.