ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 78

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 78. गौतम ऋषि द्वारा अग्नि की स्तुति

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 78 अग्नि देव की स्तुति में रचा गया है. इस सूक्त में ऋषि बार-बार अग्नि के गुणों का स्मरण करते हुए उन्हें प्रणाम करते हैं. वे बताते हैं कि जैसे प्राचीन ऋषि गौतम ने अग्नि की उपासना की थी, उसी प्रकार वे स्वयं भी उनकी स्तुति कर रहे हैं.

इस पूरे सूक्त में अग्नि को ज्ञान देने वाले, यश प्रदान करने वाले, शत्रुओं से रक्षा करने वाले और उपासकों का कल्याण करने वाले देव के रूप में प्रस्तुत किया गया है. यहां दी गई व्याख्या केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 78 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

मंत्र 1

मंत्र

अभि त्वा गोतमा गिरा जातवेदो विचर्षणे. झ्युम्नैरभि प्र णोनुम:

सरल अर्थ

हे जातवेदा और सर्वदर्शी अग्नि. गौतम ऋषि ने तुम्हारी स्तुति की थी. उसी प्रकार हम भी तुम्हारे गुणों का वर्णन करने वाले मंत्रों से बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं.

व्याख्या

सूक्त का आरंभ ऋषि गौतम के स्मरण से होता है. वे बताते हैं कि अग्नि की उपासना कोई नई परंपरा नहीं है, बल्कि प्राचीन ऋषियों से चली आ रही है.

ऋषि स्वयं को उसी परंपरा का अनुसरण करने वाला बताते हुए अग्नि के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं.

मंत्र 2

मंत्र

तमु त्वा गोतमो गिरा रायस्कामो दुवस्यति. द्युम्नैरभि प्र णोनु

सरल अर्थ

धन की इच्छा रखने वाले गौतम ऋषि जिस अग्नि की स्तोत्रों द्वारा सेवा करते हैं, उसी अग्नि की हम भी गुणगान करने वाले मंत्रों से बार-बार स्तुति करते हैं.

व्याख्या

यहां ऋषि बताते हैं कि गौतम ऋषि ने श्रद्धा के साथ अग्नि की उपासना की थी. उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वे भी अग्नि का स्मरण कर रहे हैं.

इस मंत्र में अग्नि के प्रति विश्वास और वैदिक परंपरा की निरंतरता का भाव स्पष्ट दिखाई देता है.

मंत्र 3

मंत्र

तमु त्वा वाजसातममझ्रिरस्वद्धवामहे. झुम्नैरभि प्र णोनु

सरल अर्थ

हे अग्नि. हम अंगिरा ऋषि के समान सर्वश्रेष्ठ धन देने वाले तुम्हारा आह्वान करते हैं और गुणों का वर्णन करने वाले मंत्रों से बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं.

व्याख्या

इस मंत्र में अग्नि को धन और समृद्धि प्रदान करने वाला कहा गया है. साथ ही अंगिरा ऋषि का उल्लेख करके यह बताया गया है कि महान ऋषियों ने भी अग्नि की उपासना को विशेष महत्व दिया था.

ऋषि उसी श्रद्धा के साथ अग्नि का आह्वान करते हैं.

मंत्र 4

मंत्र

तमु त्वा वृत्रहन्तमं यो दस्यूंरवधूनुषे. द्युम्नैरभि प्र णोनु

सरल अर्थ

हे अग्नि. तुम दस्युओं और अनार्यों का नाश करने वाले हो. हम सर्वोपद्रव और शत्रुओं से रक्षा के लिए तुम्हारे गुणों का वर्णन करने वाले मंत्रों से बार-बार तुम्हारी स्तुति करते हैं.

व्याख्या

यहां अग्नि के रक्षक स्वरूप का वर्णन मिलता है. ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे सभी प्रकार के विघ्नों और शत्रुओं से रक्षा करें.

इस मंत्र में अग्नि को साहस और सुरक्षा का आधार माना गया है.

मंत्र 5

मंत्र

अवोचाम रहूगणा अग्नये मधुमद्वच:. द्युम्नैरभि प्र णोनुम

सरल अर्थ

मैं गौतमवंशी ऋषि अग्नि के प्रति मधुर वचनों का प्रयोग करता हुआ गुणगान करने वाले स्तोत्रों द्वारा उनकी बार-बार स्तुति करता हूं.

व्याख्या

सूक्त का अंतिम मंत्र अत्यंत सरल और आत्मीय भाव लिए हुए है. ऋषि कहते हैं कि वे मधुर वाणी से अग्नि का गुणगान करते हैं और बार-बार उनकी स्तुति करते हैं.

पूरे सूक्त का सार भी यही है कि श्रद्धा, विनम्रता और मधुर भाव से की गई स्तुति ही अग्नि को प्रिय है.

सूक्त का सार

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 78 अग्नि की स्तुति का एक सुंदर उदाहरण है. इसमें ऋषि गौतम और अंगिरा जैसे प्राचीन ऋषियों की परंपरा का स्मरण करते हुए स्वयं भी अग्नि की उपासना करते हैं. अग्नि को धन देने वाले, यश प्रदान करने वाले, शत्रुओं से रक्षा करने वाले और उपासकों के हितैषी देव के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

सूक्त का मुख्य भाव यह है कि श्रद्धा, मधुर वाणी और सच्चे मन से की गई स्तुति अग्नि को प्रिय होती है और ऐसा उपासक उनके अनुग्रह का अधिकारी बनता है. यह विवरण केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 78 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

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