ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 31. अग्नि की स्तुति, रक्षा और समृद्धि की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 31 अग्नि देव को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि अग्नि की महिमा का वर्णन करते हुए उनसे धन, पुत्र, गौ, रक्षा, दीर्घायु और कल्याण की प्रार्थना करते हैं. अनेक मंत्रों में अग्नि को यज्ञ का संरक्षक, देवताओं तक हवि पहुंचाने वाला तथा यजमान का हित करने वाला बताया गया है.
ऋषियों द्वारा स्तुत्य अग्नि
सूक्त के प्रारंभ में अग्नि की प्रशंसा की गई है. ऋषि उन्हें अंगिरा ऋषियों तथा अन्य देवों द्वारा पूजनीय बताते हैं.
वे अग्नि को ऐसा देव कहते हैं जो अपने कर्मों को जानता है और यज्ञ करने वालों की सहायता करता है. इस कारण वे उनकी स्तुति करते हुए उनका आह्वान करते हैं.
यज्ञ और हवि को स्वीकार करने वाले अग्नि
कई मंत्रों में अग्नि को यज्ञ में उपस्थित होकर हवि स्वीकार करने के लिए आमंत्रित किया गया है.
ऋषि कहते हैं कि अग्नि यजमान की ओर से अर्पित की गई हवि को ग्रहण करते हैं और यज्ञ को सफल बनाते हैं. वे उनसे यज्ञ में प्रसन्न होकर आने की प्रार्थना करते हैं.
धन और समृद्धि की कामना
सूक्त में धन, अन्न और समृद्धि की कामना बार-बार व्यक्त हुई है.
ऋषि अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वे यजमान को धन प्रदान करें और उसकी इच्छाओं को पूर्ण करें. साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि उनके घर में समृद्धि बनी रहे.
गौ और अश्व की प्राप्ति
मंत्रों में गौ और अश्व का उल्लेख भी मिलता है.
ऋषि अग्नि से निवेदन करते हैं कि वे उन्हें गौ, अश्व और अन्य उपयोगी संपत्तियां प्रदान करें. इन प्रार्थनाओं में परिवार और समाज की उन्नति की इच्छा दिखाई देती है.
पुत्र और वंश की कामना
सूक्त के कई मंत्रों में पुत्र प्राप्ति का भी उल्लेख है.
ऋषि चाहते हैं कि अग्नि उनकी संतानों की रक्षा करें और उनके वंश की वृद्धि हो. साथ ही वे अपने पुत्रों के कल्याण की भी प्रार्थना करते हैं.
शत्रुओं से रक्षा
अनेक मंत्रों में अग्नि से सुरक्षा की कामना की गई है.
ऋषि उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे शत्रुओं, विरोधियों और हानि पहुंचाने वालों से उनकी रक्षा करें. वे चाहते हैं कि अग्नि उनके लिए रक्षक बनकर खड़े रहें.
दीर्घायु और कल्याण
सूक्त में दीर्घ जीवन की इच्छा भी व्यक्त हुई है.
ऋषि अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि वे उन्हें स्वस्थ और सुरक्षित जीवन प्रदान करें. वे चाहते हैं कि उनका परिवार सुख और शांति के साथ जीवन व्यतीत करे.
अग्नि की कृपा और संरक्षण
सूक्त के आगे के मंत्रों में अग्नि को पिता के समान हितकारी बताया गया है.
ऋषि उनसे विनती करते हैं कि वे उनके प्रति प्रसन्न रहें और उनकी पुकार सुनें. वे अग्नि को अपना संरक्षक मानते हुए उनसे निरंतर कृपा की कामना करते हैं.
बुद्धि और उत्तम विचारों की प्रार्थना
सूक्त के अंतिम मंत्रों में अग्नि से बुद्धि और उत्तम विचारों की कामना की गई है.
ऋषि चाहते हैं कि अग्नि उनकी स्तुति को स्वीकार करें और उन्हें ऐसी बुद्धि प्रदान करें जिससे वे सही मार्ग पर चल सकें. साथ ही वे अन्न और समृद्धि की भी प्रार्थना करते हैं.
इस प्रकार सूक्त 31 में अग्नि की स्तुति के साथ धन, संतति, सुरक्षा, दीर्घायु, बुद्धि और समृद्धि की अनेक कामनाएं व्यक्त की गई हैं. ऋषि बार-बार अग्नि को यजमान का हितकारी और रक्षक बताते हुए उनकी कृपा प्राप्त करना चाहते हैं.