ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 122. विश्वेदेवों की स्तुति और यज्ञ की प्रार्थना
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 122 विश्वेदेवों को समर्पित है. इस सूक्त में अनेक देवताओं का एक साथ आह्वान करते हुए यज्ञ, स्तुति, अन्न, धन, रक्षा और यजमान के कल्याण से जुड़ी प्रार्थनाएं की गई हैं.
सूक्त के आरंभ में देवताओं को यज्ञ में आने और स्तोता की स्तुति सुनने के लिए बुलाया गया है. इसके बाद मित्र और वरुण का विशेष रूप से स्मरण मिलता है. आगे सूर्य, उषा, मरुद्गण और अन्य देवशक्तियों से जुड़े वर्णन आते हैं.
इस सूक्त में यज्ञ करने वाले व्यक्ति, उसके परिवार, पशुधन, अन्न और धन के कल्याण की कामना भी की गई है. देवताओं से प्रार्थना की गई है कि वे यजमान को विजय, अन्न, धन और सुरक्षा प्रदान करें.
मंत्र 1. विश्वेदेवों का आह्वान
मंत्र
प्र वः पान्तं रघुमन्यवो<न्धो यज्ञ रुद्राय मीव्ठहुषे भरध्वम्.
दिवो अस्तोष्यसुरस्य वीरैरिषुध्येव मरुतो रोदस्यो
सरल हिंदी अर्थ
हे विश्वेदेवों. हमारे यज्ञ में पधारिए. आप अमृतस्वरूप देवता हैं. सूर्य हमारे लिए आकाश को प्रकाशित करें और आपका प्रकाश हमारे यज्ञ को शोभायमान करे.
सरल व्याख्या
सूक्त के आरंभ में विश्वेदेवों का आह्वान किया गया है. स्तोता चाहता है कि देवता यज्ञ में उपस्थित हों और उनके लिए प्रकाश तथा कल्याण का वातावरण बने.
यहां सूर्य के प्रकाश का भी उल्लेख आता है. देवताओं के आगमन और यज्ञ की सफलता के साथ प्रकाश का संबंध दिखाई देता है.
मंत्र 2. रुद्र और मरुद्गण की स्तुति
पत्नीव पूर्वहृतिं वावृधध्या उषासानक्ता पुरुधा विदाने.
स्तरीर्नात्क॑ व्युतं वसाना सूर्यस्य श्रिया सुदृशी हिरण्यै
सरल हिंदी अर्थ
हे क्रोधरहित ऋत्विजों. कर्म का फल देने वाले रुद्र को अधिक मात्रा में अन्न दें. मैं सूर्य के समान देव और उनके अनुचरों सहित आकाश और धरती के बीच निवास करने वाले मरुद्गणों की स्तुति करता हूं. रुद्र अपने वीरों अर्थात मरुतों की सहायता से शत्रुओं को उसी प्रकार भगा देते हैं, जैसे तुर्णीर में रहने वाले बाण शत्रु को भगाते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में रुद्र और मरुद्गणों का स्मरण किया गया है. रुद्र को वीरों अर्थात मरुतों की सहायता से शत्रुओं को दूर करने वाला बताया गया है.
मंत्र में अन्न देने और देवताओं की स्तुति करने का भी उल्लेख है. इस प्रकार यहां यज्ञ, अन्न, देवस्तुति और रक्षा के भाव एक साथ दिखाई देते हैं.
मंत्र 3. उषा और सूर्य का प्रकाश
ममत्तु नः परिज्मा वर्सर्हा ममत्तु वातो अपां वृषण्वान्,
शिशीतमिन्द्रापर्वता युवं नस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवा
सरल हिंदी अर्थ
जिस प्रकार पत्नी अपने पति को प्रसन्न करती हुई उसके पास आती है, उसी प्रकार उषा हमारे पास आए. वह स्त्रियों में सुंदर है और सूर्य की प्रिय है. जैसे दिन और रात अपनी-अपनी गति से आते-जाते हैं, उसी प्रकार उषा अपने प्रकाश के साथ हमारे पास आए.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में उषा के आगमन का सुंदर वर्णन मिलता है. उषा को सूर्य की प्रिय और प्रकाश से युक्त बताया गया है.
दिन और रात के क्रम के माध्यम से उषा के नियमित आगमन को समझाया गया है. उषा के आगमन से अंधकार हटता है और प्रकाश प्रकट होता है.
मंत्र 4. विश्वेदेवों से अन्न और वर्षा की प्रार्थना
उत त्या मे यशसा श्वेतनायै व्यन्ता पान्तौशिजो हुवध्यै
प्र वो नपातमपां कृणुध्व॑ प्र मातरा रास्पिनस्यायो:.
सरल हिंदी अर्थ
हे विश्वेदेवों. हमारे निवास के योग्य स्थान में आकर हमें प्रसन्न करो. जल बरसाने वाला वायु हमें प्रसन्न करे. इंद्र और मेघ हमारी वृद्धि करें और हमें पर्याप्त अन्न प्रदान करें.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में विश्वेदेवों से यजमान के निवास और जीवन को कल्याणकारी बनाने की प्रार्थना की गई है.
वायु, इंद्र और मेघ का उल्लेख करते हुए वर्षा और अन्न की प्राप्ति की कामना की गई है. इससे यज्ञ और जीवनोपयोगी अन्न के बीच संबंध सामने आता है.
मंत्र 5. विश्वेदेवों से रक्षा
मंत्र
आ वो रुवण्युमौशिजो हुवध्यै घोषेव शंसमर्जुनस्य नंशे.
प्र व: पूष्णे दावन आँ अच्छा वोचेय वसुतातिमग्ने:.
सरल हिंदी अर्थ
हे देवताओं. हमारी रक्षा करें और हमारे यज्ञ को सुरक्षित रखें. हमारे माता-पिता तथा हमारे परिवार के लिए कल्याणकारी बनें.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में देवताओं से यज्ञ और परिवार की रक्षा की प्रार्थना की गई है. स्तोता अपने निकट संबंधियों के लिए भी देवताओं का संरक्षण चाहता है.
इस प्रकार यज्ञ केवल व्यक्तिगत प्रार्थना नहीं रह जाता, बल्कि परिवार के कल्याण से भी जुड़ता है.
मंत्र 6. कक्षीवान और अश्विनीकुमारों का स्मरण
श्रुतं मे मित्रावरुणा हवेमोत श्रुतं सदने विश्वत: सीम्.
श्रोतु नः श्रोतुरातिः सुश्रोतुः सुक्षेत्रा सिन्धुरद्धि
सरल हिंदी अर्थ
हे ऋत्विजों. उशिज के पुत्र कक्षीवान के कल्याण के लिए यज्ञीय अन्न के भक्षक, सोमपान करने वाले और स्तुति के योग्य अश्विनीकुमारों को यज्ञशाला में बुलाओ. तुम उनकी स्तुति करो और उनके प्रति समर्पित रहो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में कक्षीवान का उल्लेख मिलता है. उसके कल्याण के लिए अश्विनीकुमारों को यज्ञ में बुलाने की प्रार्थना की गई है.
अश्विनीकुमारों को सोमपान करने वाले और स्तुति के योग्य देवताओं के रूप में संबोधित किया गया है.
मंत्र 7. देवताओं की स्तुति और घोपा का प्रसंग
स्तुषे सा वां वरुण मित्र रातिर्गवां शता पृक्षयामेषु पज्ने.
श्रुतरथे प्रियरथे दधाना: सद्यः पुष्टिं निरुन््धानासो अग्मन्
सरल हिंदी अर्थ
हे देवगण. उशिज के पुत्र कक्षीवान ने आपको बुलाने के लिए आपके अनुकूल स्तोत्र का पाठ किया है. जैसे ब्रह्मवादिनी घोपा ने अपने कुछ कर्मों का वर्णन करते हुए आपको बुलाया था, उसी प्रकार मैं भी आपकी स्तुति करता हूं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में कक्षीवान और घोपा का उल्लेख मिलता है. घोपा को ब्रह्मवादिनी के रूप में बताया गया है.
स्तोता पूर्व में की गई स्तुतियों और आह्वानों का स्मरण करते हुए देवताओं की प्रशंसा करता है.
मंत्र 8. देवसमूह की स्तुति
अस्य स्तुषे महिमघस्य राध: सचा सनेम नहुष: सुवीरा:.
जनो यः पत्रेभ्यो वाजिनीवानश्वावतो रथिनो महां सूरि:..
सरल हिंदी अर्थ
मैं उन देवताओं की स्तुति करता हूं जिनका रथ मधुर है, जिनके कर्म सुंदर हैं और जो अपने भक्तों की रक्षा करते हैं. मैं उनके धन और कल्याण की कामना करता हूं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में देवताओं के समूह की सामूहिक स्तुति की गई है. उनके रथ और कार्यों की प्रशंसा करते हुए स्तोता उनसे कल्याण और धन की अपेक्षा करता है.
विश्वेदेवों की सामूहिक उपासना का भाव यहां स्पष्ट दिखाई देता है.
मंत्र 9. यज्ञ से विमुख व्यक्ति और यज्ञकर्ता
जनो यो मित्रावरुणावभिष्रुगपो न वां सुनोत्यक्ष्णयाध्रुक्.
स्वयं स यक्ष्मं हृदये नि धत्त आप यदी होत्राभिऋतावा..
सरल हिंदी अर्थ
हे मित्र और वरुण. जो व्यक्ति आपका यज्ञ नहीं करता और आपके लिए अर्पित सोमरस से विमुख होकर शत्रुता बढ़ाता है, वह अपने ही हृदय में यक्ष्मा रोग धारण करता है. जो यज्ञ करने वाला व्यक्ति स्तुति करते हुए सोमरस अर्पित करता है, वह कुशल अश्व प्राप्त करता है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में यज्ञ करने वाले और यज्ञ से विमुख व्यक्ति के बीच स्पष्ट अंतर बताया गया है.
जो व्यक्ति देवताओं के लिए यज्ञ और सोम अर्पित करता है, उसके लिए अश्व प्राप्त होने की बात कही गई है. इसके विपरीत यज्ञ से विमुख व्यक्ति के लिए विपरीत परिणाम का वर्णन है.
मंत्र 10. कुशल अश्व और वीरता
स व्राधतो नहुषो दंसुजूत: शर्धस्तरो नरां गूर्तश्रवा:.
विसृष्टरातिर्याति बाव्ठहसृत्त्वा विश्वासु पृत्सु सदमिच्छूर:..
सरल हिंदी अर्थ
वह व्यक्ति कुशल अश्व प्राप्त करता है, मनुष्यों को हराने वाला और अपने समान लोगों में अन्न के लिए प्रसिद्ध होता है. अतिथि का धन से स्वागत करने वाला ऐसा व्यक्ति हिंसक शत्रुओं से निर्भय होकर सभी प्रकार के युद्धों में जाता है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में कुशल अश्व, अन्न, धन और वीरता का वर्णन मिलता है.
स्तोता ऐसे व्यक्ति का उल्लेख करता है जो अतिथियों का धन से स्वागत करता है और शत्रुओं से निर्भय होकर युद्ध में जाता है.
मंत्र 11. यजमान के लिए विजय और धन
अध ग्मन्ता नहुषो हवं सुरे: श्रोता राजानो अमृतस्य मन्द्रा:.
नभोजुवो यन्निरवस्य राध: प्रशस्तये महिना रथवते
सरल हिंदी अर्थ
हे देवगण. उस यजमान को विजय का साधन प्रदान करें जो सोम ग्रहण करने के लिए आपकी प्रतीक्षा कर रहा है. ऐसे देवताओं का हम आह्वान करते हैं जो हमारे लिए धन और अन्न लेकर आएं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में यजमान के लिए विजय और धन की प्रार्थना की गई है.
देवताओं को सोम ग्रहण करने के लिए बुलाया गया है और उनसे यजमान के लिए कल्याणकारी धन प्रदान करने की कामना की गई है.
मंत्र 12. देवताओं की स्तुति और यज्ञ
एतं शर्ध धाम यस्य सूरेरित्यवोचन्दशतयस्य नंशे.
दुम्नानि येषु वसुताती रारन्विश्वे सन्वन्तु प्रभेथेषु वाजम्
सरल हिंदी अर्थ
हे देवताओं. हम आपके लिए यज्ञ में अर्पण करते हैं और आपकी स्तुति करते हैं. आप हमारे यज्ञ को स्वीकार करें और हमें कल्याणकारी धन तथा अन्न प्रदान करें.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में यज्ञ और देवस्तुति का संबंध फिर सामने आता है. स्तोता देवताओं को हव्य अर्पित करते हुए उनसे यज्ञ स्वीकार करने और कल्याण देने की प्रार्थना करता है.
सूक्त के इस भाग में देवताओं के सामूहिक स्वरूप पर विशेष बल है.
मंत्र 13. देवताओं के लिए यज्ञ की तैयारी
मन्दामहे दशतयस्य धासेंद््विर्यत्पञ्च बि भ्रतो यन्त्यन्ना.
किमिष्टाश्व इष्टरश्मिरेत ईशानासस्तरुष ऋज्जते नृन्..
सरल हिंदी अर्थ
जब-जब हम विश्वेदेवों की स्तुति करते हैं, तब ऋत्विज उसी प्रकार इंद्रियों को पुष्ट करने वाला यज्ञ मंडप की ओर लाते हैं. इंद्र और इंद्राणी, राजा वरुण और अन्य देवता इससे प्रसन्न होते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में विश्वेदेवों की स्तुति और यज्ञ की प्रक्रिया का उल्लेख है. ऋत्विज यज्ञ की सामग्री और अर्पण लेकर यज्ञ मंडप की ओर आते हैं.
मंत्र में इंद्र, इंद्राणी, वरुण और अन्य देवताओं का भी स्मरण किया गया है.
मंत्र 14. विश्वेदेवों के सुंदर स्वरूप
हिरण्यकर्ण मणिग्रीवमर्णस्तन्नो विश्वे वरिवस्यन्तु देवा:.
अर्यो गिर: सद्य आ जम्मुषीरोस्राश्चवाकन्तूभयेष्व
सरल हिंदी अर्थ
हे विश्वेदेवों. आप सभी सुंदर पंखों वाले पक्षियों के समान शोभायमान हैं और आपके कानों में स्वर्णाभूषण तथा गले में हार सुशोभित होते हैं. सभी आदरणीय देवताओं का समूह हमारे आने के तुरंत बाद हमारी स्तुतियों और हवि को स्वीकार करे.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में विश्वेदेवों के सुंदर और अलंकृत स्वरूप का वर्णन किया गया है.
देवताओं के समूह से प्रार्थना की गई है कि वे स्तोता के पास आकर उसकी स्तुति और हव्य को स्वीकार करें.
मंत्र 15. कक्षीवान के लिए देवताओं की सहायता
चत्वारो मा मशर्शारस्य शिश्रस्त्रयो राज्ञ आयवसस्य जिष्णो:.,
रथो वां मित्रावरुणा दीर्घाप्सा: स्यूमगभस्ति: सूरो नाद्यौ
सरल हिंदी अर्थ
हे देवताओं. मघशिर राजा और जयशील राजा के तीन पुत्र उशिज के पुत्र कक्षीवान को अपने रथ पर बैठाकर पहुंचाएं. हे मित्र और वरुण. आपका विस्तृत और सुखकर प्रकाश वाला रथ सूर्य के समान चमकता है.
सरल व्याख्या
अंतिम मंत्र में कक्षीवान का फिर से उल्लेख मिलता है. देवताओं से उसके लिए सहायता और संरक्षण की प्रार्थना की गई है.
मित्र और वरुण के रथ को विस्तृत, सुखद और सूर्य के समान प्रकाशमान बताया गया है. इसके साथ सूक्त का समापन होता है.
सूक्त 122 का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 122 विश्वेदेवों की सामूहिक स्तुति और यज्ञ से जुड़ी प्रार्थनाओं का सूक्त है.
सूक्त के आरंभ में देवताओं को यज्ञ में आने के लिए बुलाया गया है. सूर्य के प्रकाश, रुद्र और मरुद्गणों, उषा, वायु, इंद्र और मेघ आदि का उल्लेख करते हुए विभिन्न देवशक्तियों से कल्याण की कामना की गई है.
सूक्त में यजमान के लिए अन्न, धन, पशुधन, अश्व, विजय और सुरक्षा की प्रार्थना की गई है. परिवार और माता-पिता के कल्याण का भी उल्लेख मिलता है.
कक्षीवान से जुड़े प्रसंग इस सूक्त में विशेष रूप से दिखाई देते हैं. अश्विनीकुमारों को उसके कल्याण के लिए यज्ञ में बुलाने और देवताओं से उसकी सहायता की प्रार्थना की गई है.
सूक्त के अंतिम भाग में विश्वेदेवों की सामूहिक स्तुति, यज्ञ और हव्य स्वीकार करने की प्रार्थना आती है. अंतिम मंत्र में कक्षीवान, मित्र और वरुण का उल्लेख करते हुए सूक्त समाप्त होता है.