ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 104. इंद्र से रक्षा, धन और अन्न की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 104 देवता इंद्र को समर्पित है. इस सूक्त में इंद्र से रक्षा, धन, अन्न, संतान और यजमानों के कल्याण की प्रार्थना की गई है. साथ ही सूक्त में इंद्र के पराक्रम और उनके द्वारा शत्रुओं के विनाश से जुड़े प्रसंग भी आते हैं.
इस सूक्त में इंद्र को शक्तिशाली और धन देने वाले देवता के रूप में संबोधित किया गया है. ऋषि उनसे अपने यज्ञ में आने, यजमानों की रक्षा करने और उनके लिए धन तथा अन्न उपलब्ध कराने का निवेदन करते हैं. सूक्त के कई मंत्रों में शत्रुओं और उनसे होने वाली बाधाओं से बचाने की प्रार्थना भी दिखाई देती है.
मंत्र 1
मंत्र
योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारि तमा नि षीद स्वानो नार्वा.
विमुच्या वयो5वसायाश्रान्दोषा वस्तोर्वहीयस: प्रपि
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. तुम्हारे बैठने के लिए जो स्थान बनाया गया है, उस पर प्रसन्न होकर बैठो. जैसे नाव को नदी के पार पहुंचाकर उसके बंधन खोल दिए जाते हैं, उसी प्रकार हमारे लिए अपना कल्याणकारी कार्य करो और हमारे पास आओ.
सरल व्याख्या
सूक्त की शुरुआत इंद्र को उनके लिए बनाए गए स्थान पर आने के निमंत्रण से होती है. स्रोत के हिंदी अर्थ में नाव का उदाहरण दिया गया है. जैसे नाव को उसके स्थान तक पहुंचाकर खोल दिया जाता है, उसी प्रकार इंद्र से यजमान के लिए अपना कार्य करने और उनके पास आने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 2
मंत्र
ओ त्ये नर इन्द्रमूतये गुर्नू चित्तान्सद्यो अध्वनो जगम्यात्.
देवासो मन्युं दासस्य श्वम्नन्ते न आ वक्षन्त्सुविताय वर्णम्
सरल हिंदी अर्थ
यज्ञ के नेता यजमान की रक्षा की इच्छा से इंद्र के समीप आते हैं और इंद्र उनको उसी समय यज्ञ के अनुष्ठान में लगाते हैं. देवगण असुरों का क्रोध समाप्त करें एवं हमारे यज्ञ के निमित्त इंद्र को लाएं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में यजमानों के इंद्र के पास आने और यज्ञ से उनके संबंध का वर्णन है. स्रोत के अनुसार यज्ञ के नेता यजमान अपनी रक्षा की इच्छा से इंद्र के समीप आते हैं. देवताओं से भी इंद्र को यज्ञ के लिए लाने और असुरों के क्रोध को समाप्त करने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 3
मंत्र
अव त्मना भरते केतवेदा अव त्मना भरते फेनमुदन्, क्षीरेण स्नातः
कुयवस्य योषे हते ते स्यातां प्रवणे शिफाया:..
सरल हिंदी अर्थ
दूसरों के धन को जानने वाला कुणय असुर स्वयं धन का अपहरण करता है एवं जल में रहकर फेन वाले जल को चुराता है. चुराए हुए जल में स्नान करने वाली कुणय की दो स्त्रियां शिपा नामक नदी के गहरे जल में नष्ट हों.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में कुणय असुर का उल्लेख आता है. स्रोत के हिंदी अर्थ के अनुसार वह दूसरों के धन को जानने वाला और धन का अपहरण करने वाला बताया गया है. उसके द्वारा जल को चुराने का भी उल्लेख है. अंत में कुणय की दो स्त्रियों के शिपा नामक नदी के गहरे जल में नष्ट होने की बात कही गई है.
मंत्र 4
मंत्र
युयोप नाभिरुपरस्यायो: प्र पूर्वाभिस्तिरते राष्ट्रि शूर:.
अज्जसी कुलिशी वीरपत्नी पयो हिन्वाना उदभिर्भरन्ते
सरल हिंदी अर्थ
उदक के मध्य में स्थित एवं दूसरों को परेशान करने के निमित्त इधर-उधर जाने वाले कुणय का स्थान जल में गुप्त था. वह शूर अपहृत जलों से बढ़ता एवं तेजस्वी बनता है. अंजसी, कुलिशी एवं वीरप्नी नाम की नदियां अपने जल से उसे प्रसन्न करके धारण करती हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में कुणय के स्थान और जल से उसके संबंध का वर्णन मिलता है. स्रोत के अनुसार उसका स्थान जल के भीतर गुप्त था और वह अपहृत जलों से बढ़ता तथा तेजस्वी होता था.
अंजसी, कुलिशी और वीरप्नी नाम की नदियों का भी इस मंत्र में उल्लेख है. उनके जल से कुणय के संबंध का वर्णन किया गया है.
मंत्र 5
मंत्र
प्रति यत्स्या नीथादर्शि दस्योरोको नाच्छा सदनं जानती गात्.
अध समा नो मघवज्चर्कृतादिन्मा नो मघेव निष्षपी परा दा:..
सरल हिंदी अर्थ
अपने बछड़े को जानती हुई गाय जिस प्रकार अपने निवासस्थान में पहुंचती है, उसी प्रकार हमने भी कुणय असुर के घर की ओर जाता हुआ मार्ग देखा है. हे इंद्र. हमारी रक्षा करो, हमें इस प्रकार मत त्यागो, जिस प्रकार दासी का पति धन त्याग देता है.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में गाय और उसके बछड़े का उदाहरण दिया गया है. जिस प्रकार गाय अपने बछड़े को पहचानकर अपने निवासस्थान में पहुंचती है, उसी प्रकार ऋषि कुणय असुर के घर की ओर जाने वाला मार्ग देखने की बात कहते हैं.
इसके बाद इंद्र से सीधे रक्षा करने और यजमान को छोड़कर न जाने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 6
मंत्र
सत्वंन इन्द्र सूर्य सो अप्स्वनागास्त्व आ भज जीवशंसे.
मान्तरां भुजमा रीरिषो न: श्रद्धितं ते महत इन्द्रियाय..
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. हमें सूर्य के प्रति, जलों के प्रति एवं पापरहित होने के कारण जीवों द्वारा प्रशंसित मंत्रों के प्रति भक्त बनाओ. हमारी गर्भस्थ संतान की हिंसा मत करना. हम तुम्हारे महान बल के प्रति श्रद्धा रखते हैं.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र से सूर्य और जल के प्रति तथा प्रशंसित मंत्रों के प्रति भक्ति बनाए रखने की प्रार्थना की गई है. साथ ही गर्भस्थ संतान की हिंसा न करने का स्पष्ट निवेदन किया गया है.
मंत्र के अंत में इंद्र के महान बल के प्रति श्रद्धा रखने की बात कही गई है.
मंत्र 7
मंत्र
अधा मय्ये श्रत्ते अस्मा अधायि वृषा चोदस्व महते धनाय.
मा नो अकृते पुरुह्दत योनाविन्द्र क्षुध्यद्भ्यो वय आसुतिं दा
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. हम तुम्हें मन से जानते हैं एवं तुम्हारी शक्ति पर श्रद्धा रखते हैं. हे कामवर्षी. तुम हमें महान धन के निमित्त प्रेरित करो. हे अनेक यजमानों द्वारा बुलाए गए इंद्र. हमें धनरहित घर में मत रखो तथा अन्य भूखों को अन्न एवं दूध दो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में ऋषि इंद्र के प्रति अपने विश्वास और उनकी शक्ति पर श्रद्धा व्यक्त करते हैं. उनसे महान धन की प्राप्ति के लिए प्रेरित करने की प्रार्थना की गई है.
साथ ही यजमानों को धनरहित घर में न रखने और भूखों को अन्न तथा दूध देने का निवेदन किया गया है.
मंत्र 8
मंत्र
मा नो वधीरिन्द्र मा परा दा मा नः प्रिया भोजनानि प्र मोषी:.
आण्डा मा नो मघवउचछक्र निर्भेन्मा नः पात्रा भेत्सहजानुषाणि.
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. हमें मत मारना, हमारा त्याग मत करना एवं हमारे प्रिय उपभोग पदार्थों को मत छीनना. हे धनस्वामी एवं शक्तिशाली इंद्र. हमारे गर्भस्थ एवं घुटने के बल चलने वाले बच्चों का नाश मत करो.
सरल व्याख्या
इस मंत्र में इंद्र से बहुत सीधी प्रार्थना की गई है. ऋषि उनसे अपने जीवन की रक्षा करने, त्याग न करने और प्रिय उपभोग की वस्तुओं को न छीनने का निवेदन करते हैं.
इसके बाद गर्भस्थ बच्चों और छोटे बच्चों की रक्षा की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 9
मंत्र
अरवडिहि सोमकामं त्वाहुरयं सुतस्तस्य पिबा मदाय.
उरुव्यचा जठर आ वृषस्व पितेव न: शृणुहि हूयमान:..
सरल हिंदी अर्थ
हे इंद्र. हमारे सम्मुख आओ, क्योंकि प्राचीन लोगों ने तुम्हें सोमप्रिय बताया है. यह सोम निचुड़ा हुआ रखा है, इसे पीकर प्रसन्न बनो. विस्तीर्ण शरीर वाले बनकर हमारे उदरों में सोमरस की वर्षा करो. जिस प्रकार पिता पुत्र की बात सुनता है, उसी प्रकार हमारे द्वारा बुलाई हुई तुम हमारी बात सुनो.
सरल व्याख्या
सूक्त के अंतिम मंत्र में इंद्र को सोमपान के लिए आमंत्रित किया गया है. ऋषि कहते हैं कि प्राचीन लोगों ने इंद्र को सोमप्रिय बताया है और उनके लिए सोम निचोड़कर रखा गया है.
इंद्र से सोमपान करके प्रसन्न होने और यजमानों की प्रार्थना सुनने का निवेदन किया गया है. यहां पिता और पुत्र का उदाहरण देकर इंद्र से अपनी बात सुनने की प्रार्थना की गई है.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 104 इंद्र को संबोधित एक ऐसा सूक्त है जिसमें रक्षा, धन, अन्न, संतान और यज्ञ से जुड़ी अनेक प्रार्थनाएं एक साथ आती हैं. शुरुआत में इंद्र को उनके लिए बनाए गए स्थान पर आने और यजमान के लिए अपना कार्य करने का निवेदन किया गया है.
सूक्त के आरंभिक भाग में यज्ञ, यजमान और इंद्र के संबंध के साथ कुणय असुर का प्रसंग आता है. कुणय के द्वारा धन और जल के अपहरण का वर्णन किया गया है. अंजसी, कुलिशी और वीरप्नी नदियों का उल्लेख भी इसी प्रसंग में मिलता है.
इसके बाद ऋषि कुणय के घर की ओर जाने वाले मार्ग का उल्लेख करते हैं और इंद्र से अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं. आगे सूर्य, जल और मंत्रों के प्रति भक्ति की कामना के साथ गर्भस्थ संतान की रक्षा का निवेदन किया गया है.
सूक्त के अंतिम मंत्रों में धन और अन्न की प्रार्थना अधिक स्पष्ट रूप से आती है. इंद्र से महान धन के लिए प्रेरित करने, धनरहित घर में न रखने और भूखों को अन्न तथा दूध देने की प्रार्थना की गई है. इसके बाद यजमान अपने जीवन, प्रिय उपभोग पदार्थों और बच्चों की रक्षा के लिए इंद्र से निवेदन करते हैं.