ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 91

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 91. सोम देव की स्तुति, समृद्धि और संरक्षण की प्रार्थना

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 91 सोम देव को समर्पित है. इस सूक्त में सोम को बुद्धि का मार्ग दिखाने वाले, यजमान को धन और जीवनोपयोगी साधन देने वाले, रोगों से बचाने वाले तथा शत्रुओं से रक्षा करने वाले देव के रूप में स्मरण किया गया है.

इस सूक्त में सोम का संबंध केवल यज्ञ और हवि से नहीं दिखाई देता, बल्कि मनुष्य के जीवन के अनेक पक्षों से जुड़ा हुआ है. ऋषि उनसे उत्तम मार्ग, धन, अन्न, स्वास्थ्य, संतान, विजय और सुरक्षा की प्रार्थना करते हैं. साथ ही सोम को औषधियों, वर्षा, जल, गौ और आकाश में प्रकाश फैलाने वाली शक्ति से भी जोड़ा गया है.

मंत्र 1

मंत्र

त्वं सोम प्र चिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठमनु नेषि पन्थाम्‌.
तव प्रणीती पितरो न इन्दो देवेषु रत्नमभजन्त धीरा:..

सरल अर्थ

हे सोम. तुम हमारी बुद्धि द्वारा भली-भांति जाने जाते हो. तुम हमें सरल और श्रेष्ठ मार्ग पर ले चलते हो. तुम्हारे निर्देश के अनुसार चलकर हमारे पूर्वजों ने देवताओं के बीच धन प्राप्त किया था.

व्याख्या

सूक्त की शुरुआत सोम को मार्गदर्शक के रूप में स्मरण करने से होती है. ऋषि कहते हैं कि सोम मनुष्य को सही मार्ग पर ले जाते हैं. इसी मार्गदर्शन के कारण पूर्वजों ने देवताओं के बीच सम्मान और धन प्राप्त किया था.

मंत्र 2

मंत्र

त्वं सोम क्रतुभि: सुक्रतुर्भूस्त्व॑ दक्ष: सुदक्षो विश्ववेदा:.
त्वं वृषा वृषत्वेभिम॑हित्वा ुम्नेभिद्युम्न्यभवो नृच

सरल अर्थ

हे सर्वज्ञ सोम. तुम श्रेष्ठ कर्मों के कारण सुज्ञानी और अपने बल से समर्थ हो. तुम वर्षा के महत्व से कामनाओं को पूर्ण करने वाले हो और अपने तेज से यजमानों के लिए प्रभावशाली बनते हो.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम के ज्ञान, सामर्थ्य और तेज का वर्णन है. ऋषि उन्हें ऐसा देव मानते हैं जो यज्ञ और अपने प्रभाव के माध्यम से यजमान के जीवन में सामर्थ्य और समृद्धि लाते हैं.

मंत्र 3

मंत्र

राज्ञो नु ते वरुणस्य व्रतानि बृहदगभीरं तव सोम धाम.
शुचिष्टवमसि प्रियो न मित्रो दक्षाय्यो अर्यमेवासि सोम..

सरल अर्थ

हे सोम. वरुण के व्रतों से संबंधित तुम्हारा स्थान महान और गंभीर है. तुम पवित्र हो, मित्र के समान प्रिय हो और अर्यमा के समान उन्नति करने वाले हो.

व्याख्या

यहां सोम के स्वरूप को वरुण, मित्र और अर्यमा के गुणों से जोड़ा गया है. ऋषि उनके भीतर पवित्रता, प्रियता और उन्नति कराने वाले गुणों का वर्णन करते हैं.

मंत्र 4

मंत्र

या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु,
तेभिनों विश्वैः सुमना अहेव्ठत्राजन्त्सोम प्रति हव्या गृभाय

सरल अर्थ

हे शोभन सोम. आकाश, पृथ्वी, पर्वत, औषधियों और जल में तुम्हारे जो-जो स्थान हैं, उन सभी के साथ प्रसन्न होकर हमारे द्वारा दी गई हवि स्वीकार करो.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम की व्यापक उपस्थिति का वर्णन है. आकाश से लेकर पृथ्वी, पर्वत, औषधियों और जल तक उनके स्वरूप को देखा गया है. ऋषि इसी व्यापक शक्ति से प्रसन्न होकर उनकी हवि स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 5

मंत्र

त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा.
त्वं भद्रो असि क्रतुः..

सरल अर्थ

हे सोम. तुम सत्कर्मों के स्वामी हो, राजा के समान समर्थ हो और बलवान हो. तुम कल्याणकारी और श्रेष्ठ कर्म करने वाले हो.

व्याख्या

यहां सोम के प्रभावशाली और कल्याणकारी स्वरूप का वर्णन है. उन्हें सत्कर्मों के स्वामी तथा शक्तिशाली बताया गया है.

मंत्र 6

मंत्र

त्वं च सोम नो वशो जीवातुं न मरामहे.
प्रियस्तोत्रो वनस्पति:..

सरल अर्थ

हे स्तुतिप्रिय एवं वनस्पतियों के पालन करने वाले सोम. यदि तुम हमारे यजमानों के लिए जीवनदायिनी औषधि की अभिलाषा करो तो हम मृत्यु से बच सकते हैं.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम का औषधि और जीवन से संबंध सामने आता है. ऋषि उनसे जीवन की रक्षा करने वाली औषधि और दीर्घ जीवन की कामना करते हैं.

मंत्र 7

मंत्र

त्वं सोम महे भगं त्वं यून ऋतायते.
दक्ष दधासि जीवसे..

सरल अर्थ

हे सोम. तुम वृद्ध और युवा दोनों यजमानों को जीवनोपयोगी धन देते हो. तुम उन्हें जीवन के लिए आवश्यक सामर्थ्य भी प्रदान करते हो.

व्याख्या

यहां सोम की कृपा को आयु और धन दोनों से जोड़ा गया है. ऋषि चाहते हैं कि वृद्ध और युवा सभी यजमानों को जीवन के लिए आवश्यक साधन प्राप्त हों.

मंत्र 8

मंत्र

त्वं न: सोम विश्वतो रक्षा राजन्नघायत:.
न रिष्येत््वावतः सखा

सरल अर्थ

हे तेजस्वी सोम. जो लोग हमें दुख देना चाहते हैं, उनसे हमारी चारों ओर से रक्षा करो. तुम जैसे देव के मित्र को कभी विनाश प्राप्त नहीं होता.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम से चारों दिशाओं से सुरक्षा की प्रार्थना की गई है. ऋषि उन्हें अपना मित्र मानते हुए शत्रुओं और अनिष्ट से बचाने का निवेदन करते हैं.

मंत्र 9

मंत्र

सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे.
ताभिनोंडविता भव..

सरल अर्थ

हे सोम. यजमानों को देने के लिए तुम्हारे पास जो सुखदायक और कल्याणकारी रक्षाएं हैं, उन्हीं के द्वारा हमारे रक्षक बनो.

व्याख्या

ऋषि सोम से उनकी सभी कल्याणकारी शक्तियों के माध्यम से अपनी रक्षा करने की प्रार्थना करते हैं. यहां सोम के रक्षक स्वरूप पर विशेष जोर है.

मंत्र 10

मंत्र

इमं यज्ञमिदं वचो जुजुषाण उपागहि.
सोम त्वं नो वृथे भव..

सरल अर्थ

हे सोम. हमारे इस यज्ञ और स्तुति-वचन को स्वीकार करो. हमारे समीप आओ और हमारे मित्र बनो.

व्याख्या

इस मंत्र में ऋषि सोम को सीधे अपने यज्ञ और स्तुति को स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करते हैं. उनके लिए सोम केवल पूजनीय देव ही नहीं, बल्कि मित्र के समान निकट हैं.

मंत्र 11

मंत्र

सोम गीर्भिष्टवा वयं वर्धयामो वचोविद:.
सुमृव्ठीकोी न आ विश

सरल अर्थ

हे सोम. हम स्तुतियों को जानने वाले लोग अपने स्तुति-वचनों से तुम्हें बढ़ाते हैं. तुम सुख प्रदान करते हुए हमारे समीप आओ.

व्याख्या

ऋषि अपनी स्तुति को सोम के प्रति समर्पित करते हैं और उनसे प्रसन्न होकर अपने समीप आने की प्रार्थना करते हैं. इस मंत्र में देव और स्तोता के बीच का आत्मीय संबंध दिखाई देता है.

मंत्र 12

मंत्र

गयस्फानो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्धन:.
सुमित्र: सोम नो भव

सरल अर्थ

हे सोम. तुम धन को बढ़ाने वाले, रोगों को दूर करने वाले, संपत्ति प्राप्त कराने वाले और स्तुति से प्रसन्न होने वाले हो. हमारे लिए अच्छे मित्र बनो.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम से धन, स्वास्थ्य और मित्रवत संरक्षण की प्रार्थना की गई है. ऋषि उन्हें रोगों को दूर करने और संपत्ति बढ़ाने वाला देव बताते हैं.

मंत्र 13

मंत्र

सोम रारन्धि नो हृदि गावो न यवसेष्वा.
मर्य इव स्व ओक्‍्ये..

सरल अर्थ

हे सोम. जिस प्रकार गौएं सुंदर घास से प्रसन्न होकर अपने घर में रहती हैं, उसी प्रकार हमारे द्वारा दिए गए हवि से तृप्त होकर हमारे हृदय में निवास करो.

व्याख्या

यहां सोम के प्रति अत्यंत आत्मीय भाव दिखाई देता है. ऋषि चाहते हैं कि सोम उनके हृदय में उसी प्रकार प्रसन्न होकर निवास करें, जैसे गौएं अपने प्रिय स्थान पर संतुष्ट होकर रहती हैं.

मंत्र 14

मंत्र

य: सोम: सख्ये तव रारणद्देव मर्त्य:.
तं दक्ष: सचते कवि:..

सरल अर्थ

हे सर्वदर्शी और सर्वकार्य समर्थ सोम. जो मनुष्य तुम्हारी मित्रता के कारण तुम्हारी स्तुति करता है, तुम उस पर अनुग्रह करते हो.

व्याख्या

सोम की मित्रता प्राप्त करने वाले यजमान के प्रति उनकी कृपा का वर्णन इस मंत्र में किया गया है. श्रद्धा और स्तुति के माध्यम से सोम के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करने की बात कही गई है.

मंत्र 15

मंत्र

उरुष्या णो अभिशस्ते: सोम नि पाह्ुंहस:.
सखा सुशेव एथि नः..

सरल अर्थ

हे सोम. हमें निंदा और पाप से बचाओ. हमारी रक्षा करो और हमारे लिए हितकारी मित्र बनो.

व्याख्या

यहां सोम से केवल बाहरी संकटों से नहीं, बल्कि निंदा और पाप से भी रक्षा की प्रार्थना की गई है. ऋषि उन्हें अपने हितकारी मित्र के रूप में स्वीकार करते हैं.

मंत्र 16

मंत्र

आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्‌.
भवा वाजस्य सड़थे

सरल अर्थ

हे सोम. तुम चारों ओर से बढ़ो और पूर्णता प्राप्त करो. हमें अन्न और सामर्थ्य प्रदान करने वाले बनो.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम की वृद्धि और पूर्णता की कामना के साथ उनसे यजमान के लिए अन्न और शक्ति देने की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 17

मंत्र

आ प्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिरंशुभि:.
भवा न: सुश्रवस्तम: सखा वृधे..

सरल अर्थ

हे अत्यंत आनंददायक सोम. सभी अंशों से वृद्धि प्राप्त करो और हमारे लिए श्रेष्ठ मित्र बनकर हमारी उन्नति में सहायक हो.

व्याख्या

ऋषि सोम से पूर्णता और वृद्धि की प्रार्थना करते हैं. साथ ही उनसे अपने यजमानों के लिए श्रेष्ठ मित्र बनने का निवेदन करते हैं.

मंत्र 18

मंत्र

सं ते पयांसि समु यन्तु वाजा: सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाह:.
आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवांस्युत्तमानि धिष्व..

सरल अर्थ

हे शत्रुनाशक सोम. तुम्हारे भीतर दूध, अन्न और वीर्य एकत्र हों. तुम बढ़ते हुए अमरता के लिए आकाश में उत्तम यश धारण करो.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम के भीतर दूध, अन्न और शक्ति के एकत्र होने की प्रार्थना की गई है. साथ ही उनके यश के आकाश में स्थापित होने की कामना की गई है.

मंत्र 19

मंत्र

या ते धामानि हविषा यजन्ति ता ते विश्वा परिभूरस्तु यज्ञम्‌.
गयस्फान: प्रतरण: सुवीरो$वीरहा प्र चरा सोम दुर्यान्‌.

सरल अर्थ

हे सोम. यजमान हवि द्वारा जिन तेजस्वी स्वरूपों की पूजा करते हैं, वे सभी हमारे यज्ञ को चारों ओर से प्राप्त हों. हे धनवर्धक, संकट से पार कराने वाले, उत्तम वीरों से युक्त और शत्रुओं का नाश करने वाले सोम. हमारे घरों में आओ.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम से यज्ञ को चारों ओर से अपने तेज से पूर्ण करने की प्रार्थना की गई है. साथ ही उन्हें धन बढ़ाने वाला, संकट से पार कराने वाला और वीरों से संपन्न करने वाला बताया गया है.

मंत्र 20

मंत्र

सोमो धेनुं सोमो अर्वन्तमाशुं सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति.
सादन्यं विदथ्यं सभेयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै

सरल अर्थ

जो यजमान सोम को हवि देता है, सोम उसे दुधारू गाय, शीघ्रगामी अश्व और कर्म करने में कुशल वीर प्रदान करते हैं. वे उसे गृहकार्य में कुशल, यज्ञ का अनुष्ठान करने वाला, सफल शास्त्रज्ञ और पिता का नाम प्रसिद्ध करने वाला पुत्र देते हैं.

व्याख्या

यह मंत्र सोम की कृपा से प्राप्त होने वाले विभिन्न प्रकार के लाभों का वर्णन करता है. यहां गौ, अश्व, वीर पुरुष, गृहकार्य की कुशलता, यज्ञ और पुत्र से जुड़े फल का उल्लेख है.

मंत्र 21

मंत्र

अषाह्हहं युत्सु पृतनासु पप्रिं स्वर्षामप्सां वृजनस्य गोपाम्‌.
भरेषुजां सुक्षितिं सुश्रवसं जयन्तं त्वामनु मदेम सोम

सरल अर्थ

हे सोम. हम तुम्हें युद्ध में नित्य विजयी सेनाओं को विजय दिलाने वाले, स्वर्ग के दाता, जलवर्षक, बल के रक्षक, यज्ञ में प्रकट होने वाले, सुंदर निवास वाले, उत्तम यश वाले और शत्रुओं का नाश करने वाले देव के रूप में लक्ष्य करके प्रसन्न होते हैं.

व्याख्या

यहां सोम के वीर और रक्षक स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया गया है. ऋषि उन्हें युद्ध में विजय दिलाने वाले और शत्रुओं का नाश करने वाले देव के रूप में स्मरण करते हैं.

मंत्र 22

मंत्र

त्वमिमा ओषधी: सोम विश्वास्त्व्मपो अजनयमस्त्व॑ गा:.
त्वमा ततन्थोर्व १नतरिक्ष॑ त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ..

सरल अर्थ

हे सोम. तुमने पृथ्वी पर विद्यमान सभी औषधियों और गौओं को उत्पन्न किया है. तुमने विस्तृत आकाश को फैलाया और अपने प्रकाश से उसके अंधकार को दूर किया.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम को औषधियों, गौओं, आकाश और प्रकाश से जोड़ा गया है. ऋषि उनके प्रभाव को प्रकृति के अनेक रूपों में देखते हैं और उन्हें सृष्टि के कल्याणकारी स्वरूप से जोड़ते हैं.

मंत्र 23

मंत्र

देवेन नो मनसा देव सोम रायो भागं सहसावन्नभि युध्य.
मा त्वा तनदीशिषे वीर्यस्योभयेभ्य: प्र चिकित्सा गविष्टौ..

सरल अर्थ

हे देव सोम. अपनी दिव्य भावना से हमें धन का भाग प्रदान करो. हमें वीरता से वंचित मत करो और गौ की प्राप्ति के लिए होने वाले संघर्ष में हमारी सहायता करो.

व्याख्या

इस मंत्र में सोम से धन और वीरता की प्रार्थना की गई है. ऋषि चाहते हैं कि वे अपने यजमानों को संपत्ति और सामर्थ्य प्रदान करें तथा गौधन की प्राप्ति के प्रसंग में उनका साथ दें.

सूक्त का सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 91 सोम देव की विस्तृत स्तुति है. इसमें सोम को ज्ञान देने वाले, उचित मार्ग पर ले जाने वाले, धन और अन्न प्रदान करने वाले, रोगों से रक्षा करने वाले तथा शत्रुओं से बचाने वाले देव के रूप में स्मरण किया गया है.

सूक्त में सोम के साथ मनुष्य के कई प्रकार के संबंध दिखाई देते हैं. कहीं उनसे यज्ञ और स्तुति स्वीकार करने की प्रार्थना है, कहीं उन्हें मित्र बनकर रक्षा करने के लिए कहा गया है और कहीं धन, गौ, अश्व, वीर पुरुष तथा पुत्र की प्राप्ति की कामना की गई है.

सूक्त के अंतिम भाग में सोम को औषधियों, गौओं, वर्षा, आकाश और प्रकाश से भी जोड़ा गया है. इस प्रकार सोम का स्वरूप केवल यज्ञ तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवन और प्रकृति के अनेक पक्षों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है.

यहां दी गई व्याख्या उपलब्ध दस्तावेज में दिए गए मंत्रों और उनके हिंदी अर्थ पर ही आधारित है. इसमें बाहर से कोई अतिरिक्त धार्मिक या आधुनिक अर्थ नहीं जोड़ा गया है.

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