उपनिषद और ध्यान : प्रयास से परे की सजगता
ध्यान को हम कैसे समझते हैं
अक्सर ध्यान का अर्थ किसी विशेष अभ्यास से जोड़ा जाता है.
- बैठना.
- आँखें बंद करना.
- श्वास पर ध्यान देना.
यह सब उपयोगी हो सकता है. पर उपनिषद यहीं रुकते नहीं. वे पूछते हैं. क्या ध्यान केवल करने की क्रिया है. या देखने की अवस्था.
प्रयास और सहजता का अंतर
जब ध्यान को सिर्फ प्रयास बना दिया जाता है तो उसमें तनाव छिप सकता है.
कुछ पाने की जल्दी. किसी अनुभव की प्रतीक्षा. पर उपनिषद जिस ध्यान की ओर संकेत करते हैं वह धीरे धीरे प्रयास से सहजता की ओर बढ़ता है.
जैसे देखना बिना ज़ोर लगाए भी संभव हो.
सजगता जो हर क्षण में हो सकती है
यदि ध्यान केवल किसी विशेष समय तक सीमित रहे तो जीवन का अधिकांश भाग उससे अलग रह जाएगा. उपनिषद ध्यान को जीवन से अलग नहीं रखते.
- चलते हुए.
- सुनते हुए.
- बोलते हुए.
एक हल्की सी सजगता संभव है उपस्थित रहे. जीवन में उपनिषद की प्रासंगिकता को देखते समय
यह संकेत पहले ही उभरता है कि स्पष्टता दैनिक क्षणों में भी जन्म ले सकती है.
मौन और ध्यान का संबंध
ध्यान गहरा होता है तो शब्द स्वाभाविक रूप से कम हो जाते हैं. यह चुप रहने का अभ्यास नहीं. बल्कि भीतर का शांत होना है.
जहाँ विचार आते हैं पर पकड़ कम हो जाती है.
मौन की इसी दिशा को समझते समय धीरे धीरे अनुभव होता है कि शांति बनाई नहीं जाती. देखी जाती है.
ध्यान अनुभव नहीं तो क्या है
कभी ध्यान में विशेष अनुभव हो सकते हैं.
- शांति.
- विस्तार.
- हल्कापन.
पर उपनिषद अनुभव को अंतिम नहीं मानते. क्योंकि अनुभव बदलते हैं. ध्यान उस देखने की ओर संकेत करता है जो अनुभव को भी देख रहा है. यहीं दर्शक का प्रश्न फिर से उभर आता है.
क्या ध्यान जीवन से अलग कर देता है
यह डर स्वाभाविक है. कि ध्यान हमें दैनिक जीवन से दूर कर देगा.
पर यदि सजगता बढ़े तो दूरी नहीं बढ़ती. स्पष्टता बढ़ती है. कार्य वही रहते हैं. पर उनके साथ जुड़ा तनाव
धीरे धीरे कम हो सकता है.
मुक्ति की आंतरिक समझ को देखते समय यह संकेत मिलता है कि शांति जीवन छोड़ने में नहीं उसे सही ढंग से देखने में है.
ध्यान की सबसे सूक्ष्म दिशा
संभव है ध्यान कोई उपलब्धि न हो. बस वह क्षण हो जब हम थोड़ी देर के लिए किसी भी बनने की कोशिश छोड़ दें और उसी साधारण ठहराव में एक शांत उपस्थिति स्वतः दिखाई दे.
एक हल्की सी संभावना
शायद ध्यान समय निकालकर किया जाने वाला कार्य नहीं. बल्कि वह सजगता हो जो अभी भी संभव है.
यदि हम एक क्षण के लिए पूरी तरह उपस्थित हो जाएँ. तब शायद ध्यान कहीं दूर नहीं. यहीं इस साधारण क्षण में.
चिंतन के कुछ आधार
- कठ और माण्डूक्य उपनिषद में अंतर्मुखी ध्यान के संकेत
- अद्वैत परंपरा में साक्षीभाव को ध्यान की मूल दिशा मानना
- ध्यान परंपराओं में सजग उपस्थिति पर बल