ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 110

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 110. ऋभुगणों की स्तुति और उनके दिव्य कर्म

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 110 ऋभुगणों को समर्पित है. इस सूक्त में ऋभुगणों के विशेष कार्यों, उनकी बुद्धि और उनके द्वारा किए गए अद्भुत कर्मों का वर्णन मिलता है.

सूक्त में ऋभुगणों को ऐसे कुशल और सामर्थ्यवान रूप में याद किया गया है, जिन्होंने अपने कार्यों से विशेष यश प्राप्त किया. इसमें यज्ञ, सोम, सूर्य, पितरों, माता-पिता, गाय और रथ से जुड़े कई प्रसंग आते हैं.

इस सूक्त की एक खास बात यह है कि इसमें ऋभुगणों के कार्यों को केवल सामान्य उपलब्धियों के रूप में नहीं बताया गया है. उनके द्वारा किए गए विशेष कर्मों को याद करते हुए उनसे यज्ञ के लिए अनुकूलता और सहायता की प्रार्थना भी की गई है.

मंत्र 1

मंत्र

ततं मे अपस्तदु तायते पुनः स्वादिष्ठा धीतिरुचथाय शस्यते.
अयं समुद्र इह विश्वदेव्य: स्वाहाकृतस्य समु तृप्णुत ऋभव:.

सरल हिंदी अर्थ

हे ऋभुगणों. मैंने पहले भी अग्निहोत्र आदि अनुष्ठान किया है और इस समय पुनः कर रहा हूं. उस समय में तुम्हारी प्रशंसा के लिए अतिशय प्रशंसनीय स्तुति की. तुम स्वाहा शब्द के साथ अग्नि में डाले गए सोम को पीकर तृप्त बनो.

सरल व्याख्या

सूक्त की शुरुआत ऋभुगणों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए होती है. ऋषि बताते हैं कि उन्होंने पहले भी अग्निहोत्र आदि अनुष्ठान किए हैं और अब फिर उसी प्रकार यज्ञ कर रहे हैं.

वे ऋभुगणों की प्रशंसा में स्तुति करते हैं और उनसे यज्ञ में अर्पित सोम को ग्रहण करके तृप्त होने की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 2

मंत्र

आभोगयं प्र यदिच्छन्त ऐतनापाका: प्राउ्चो मम के चिदापय:.
सौधन्वनासश्चरितस्य भूमनागच्छत सवितुर्दाशुषो गृह

सरल हिंदी अर्थ

हे ऋभुगणों. तुम प्राचीन काल में अपरिपक्व ज्ञान वाले एवं मेरे जातीय बंधु थे. उस समय तुमने उपजाऊ भूमि से सोमरस की इच्छा की थी. हे सुधन्वा के पुत्रों. उस समय तुमने अपने तेज से प्रशंसा के योग्य यज्ञ किया था, जिसे सोमपान दिया जा चुका था.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋभुगणों के पुराने समय का स्मरण किया गया है. उन्हें पहले अपरिपक्व ज्ञान वाले और जातीय बंधु के रूप में बताया गया है.

इसके बाद उनके द्वारा किए गए यज्ञ और सोम से जुड़े कर्म का उल्लेख आता है. मंत्र में सुधन्वा के पुत्रों के रूप में भी उनका उल्लेख किया गया है.

मंत्र 3

मंत्र

तत्सविता वो<मृतत्वमासुवदगोह्वूं यच्छुवयन्त ऐतन.
त्यं चिच्चमसमसुरस्य भक्षणमेकं सनन्‍्तमकृणुता चतुर्व

सरल हिंदी अर्थ

हम पुत्र-पौत्रों की परंपरा को कभी छिन्न न करें, ऐसी प्रार्थना करते हुए और पितरों को शक्ति देने वाले पुत्र-पौत्रों को उत्पन्न करते हुए हम यजमान इंद्र और अग्नि की सुखपूर्वक स्तुति करते हैं. शत्रुओं का नाश करते हुए इंद्र और अग्नि इस स्तुति के समीप रहें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में परिवार और वंश की निरंतरता की इच्छा सामने आती है. ऋषि चाहते हैं कि पुत्र और पौत्रों की परंपरा कभी समाप्त न हो और पितरों को शक्ति देने वाली संतान उत्पन्न होती रहे.

साथ ही इंद्र और अग्नि से शत्रुओं का नाश करते हुए यजमान के समीप रहने की प्रार्थना की गई है.

मंत्र 4

मंत्र

विष्टवी शमी तरणित्वेन वाघतो मर्तास: सन्‍्तो अमृतत्वमानशु:.
सौधन्वना ऋभव: सूरचक्षस: संवत्सरे समपृच्यन्त धीतिभि:..

सरल हिंदी अर्थ

हे ऋभुगणों. मनुष्यों के साथ मिले हुए ऋभुओं को शीघ्र ही यज्ञ, दान आदि कर्म करके मरणधर्मा होते हुए भी अमरता प्राप्त हुई थी. उस समय सुधन्वा के पुत्रों ने सूर्य के समान तेजस्वी ऋभुओं में अधिकार प्राप्त किया था.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋभुगणों के सबसे महत्वपूर्ण गुणों में से एक, मरणधर्मा होते हुए अमरता प्राप्त करना, सामने आता है. स्रोत के अनुसार ऋभुओं ने मनुष्यों के साथ रहते हुए यज्ञ और दान आदि कर्म किए और इसी संदर्भ में अमरता प्राप्त की.

उनकी तेजस्विता की तुलना सूर्य से की गई है और उन्हें सुधन्वा के पुत्रों के रूप में फिर स्मरण किया गया है.

मंत्र 5

मंत्र

क्षेत्रमिव वि ममुस्तेजनेनँ एक पात्रमृभवो जेहमानम्‌.
उपस्तुता उपम॑ नाधमाना अमर्त्येषु श्रव इच्छमाना:..

सरल हिंदी अर्थ

हे ऋभुगणों. तुमने नापने के लिए जिस प्रकार बांस लेकर रेत को नापा जाता है, उसी प्रकार समीपस्थ ऋषियों द्वारा स्तुत सोम की याचना करके एवं मरणरहित देवों के बीच में हवि की इच्छा करते हुए तीक्ष्ण अस्त्र द्वारा चमस नाम के पात्र को चार भागों में बांटा था.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋभुगणों के एक विशेष कर्म का उल्लेख है. स्रोत में इसे चमस नामक पात्र को चार भागों में बांटने के रूप में बताया गया है.

इस कार्य को समझाने के लिए नापने के लिए बांस लेकर रेत को नापने का उदाहरण दिया गया है. मंत्र में ऋषियों द्वारा स्तुत सोम और देवताओं के बीच हवि की इच्छा का भी उल्लेख आता है.

मंत्र 6

मंत्र

आ मनीषामन्तरिक्षस्य नृभ्यः खुचेव घृतं जुहवाम विद्ाना.
तरणित्वा ये पितुरस्य सश्चिर ऋभवो वाजमरुहन्दिवो रज:

सरल हिंदी अर्थ

हम अंतरिक्ष संबंधी यज्ञ को नेत्र ऋभुगणों को सूच नामक पात्र के समान घी से भरा हुआ हृदय देने के साथ ही ज्ञान भरी स्तुति करते हैं. उन्होंने जगत्पालक सूर्य के समान संसार को पार करने की कुशलता एवं स्वर्गलोक का अन्न प्राप्त किया था.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋभुगणों के ज्ञान और उनके विशेष कर्मों का उल्लेख है. ऋषि उनके लिए ज्ञान से भरी स्तुति करते हैं.

स्रोत में ऋभुगणों की तुलना जगत का पालन करने वाले सूर्य से की गई है और कहा गया है कि उन्होंने संसार को पार करने की कुशलता तथा स्वर्गलोक का अन्न प्राप्त किया था.

मंत्र 7

मंत्र

ऋशुर्न इन्द्र: शवसा नवीयानृभुर्वजिभिरवसुभिर्वसुर्ददि:.
युष्माकं देवा अवसाहनि प्रिये३भि तिष्ठेम पृत्सुतीरसुन्वताम्‌

सरल हिंदी अर्थ

बल के कारण अतिप्रसिद्ध ऋभुगण हमारे ईश्वर हैं. हमें अन्न एवं धन के देने वाले ऋभु निवास के कारण वरदान देते हैं. हे देवों. हम तुम्हारी रक्षा के कारण अनुकूल दिन में सोमाभिषवरहित शत्रुओं को हरा दें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋभुगणों को बल के कारण प्रसिद्ध और अपना ईश्वर कहा गया है. उनसे अन्न और धन देने वाले वरदान की कामना की गई है.

इसके साथ शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की इच्छा भी व्यक्त की गई है. यह विजय देवताओं की रक्षा और अनुकूलता से जुड़ी हुई है.

मंत्र 8

मंत्र

निश्चर्मण ऋभवो गामपिंशत सं वत्सेनासृजता मातरं पुनः.
सौधन्वनास: स्वपस्यया नरो जिव्री युवाना पितराकृणोतन.

सरल हिंदी अर्थ

हे ऋभुओं. तुमने चमड़े के द्वारा गाय को आच्छादित करके पुनः उसके बछड़े से मिला दिया था. हे सुधन्वा के पुत्रों. तुमने शुभ कर्म की इच्छा से अपने वृद्ध माता-पिता को पुनः युवा बना दिया था.

सरल व्याख्या

यह मंत्र ऋभुगणों के दो विशेष कर्मों का उल्लेख करता है.

पहला, उन्होंने गाय को चमड़े से आच्छादित करके उसे फिर उसके बछड़े से मिला दिया. दूसरा, उन्होंने अपने वृद्ध माता-पिता को फिर से युवा बना दिया.

स्रोत में दोनों कार्यों को ऋभुगणों की विशेष क्षमता और शुभ कर्म से जोड़ा गया है.

मंत्र 9

मंत्र

वाजेभिनों वाजसातावविड्ब्यूभुमाँ इन्द्र चित्रमा दर्षि राध:.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौः

सरल हिंदी अर्थ

हे इंद्र. ऋभुगणों का सहयोग पाकर हमें यज्ञ के निमित्त भूत अन्न एवं धन दो. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश हमारे उस धन एवं अन्न की पूजा करें.

सरल व्याख्या

इस मंत्र में ऋभुगणों के सहयोग के साथ अन्न और धन की प्रार्थना की गई है. ऋषि इंद्र से यज्ञ के लिए आवश्यक अन्न और धन देने का निवेदन करते हैं.

अंत में मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण करते हुए उस धन और अन्न की पूजा करने की कामना की गई है.

सूक्त का सार

ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 110 ऋभुगणों की स्तुति और उनके विशेष कर्मों के स्मरण से जुड़ा हुआ है. इसमें ऋभुओं को कुशल, तेजस्वी और अपने विशेष कार्यों के कारण प्रसिद्ध बताया गया है.

सूक्त के आरंभ में ऋषि अपने यज्ञ और अग्निहोत्र का उल्लेख करते हैं. वे ऋभुगणों की प्रशंसा में स्तुति करते हुए उनसे यज्ञ में अर्पित सोम को ग्रहण करके तृप्त होने की प्रार्थना करते हैं.

इसके बाद ऋभुगणों के पुराने समय का उल्लेख आता है. उन्हें सुधन्वा के पुत्रों के रूप में संबोधित किया गया है. उनके द्वारा किए गए यज्ञ और उनके तेज का भी स्मरण किया गया है.

सूक्त का एक महत्वपूर्ण भाव मरणधर्मा होते हुए अमरता प्राप्त करना है. स्रोत के अनुसार ऋभुओं ने मनुष्यों के साथ रहते हुए यज्ञ और दान आदि कर्म किए और इस प्रकार अमरता प्राप्त की.

आगे ऋभुगणों के विशेष कर्मों का वर्णन आता है. इनमें चमस पात्र को चार भागों में बांटना, संसार को पार करने की कुशलता प्राप्त करना, गाय को उसके बछड़े से फिर मिलाना और वृद्ध माता-पिता को पुनः युवा बनाना जैसे प्रसंग प्रमुख हैं.

गाय और बछड़े तथा वृद्ध माता-पिता से जुड़े प्रसंग इस सूक्त को विशेष रूप से अलग पहचान देते हैं. यहां ऋभुगणों के कार्यों को उनकी कुशलता और विशेष सामर्थ्य के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

अंतिम भाग में ऋभुगणों से अन्न और धन की प्राप्ति तथा यज्ञ के विकास की प्रार्थना की गई है. इंद्र से भी ऋभुगणों के सहयोग से यज्ञ के लिए अन्न और धन देने का निवेदन किया गया है.

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