ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 90

ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 90. विश्वेदेवों से सुख, समृद्धि और मंगल की प्रार्थना

परिचय

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 90 विश्वेदेवों को समर्पित है. इस सूक्त में ऋषि अनेक देवताओं का एक साथ स्मरण करते हुए उनसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कल्याण, सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं. इसमें वरुण, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, मरुद्गण, पूषा, भग, विष्णु और बृहस्पति जैसे देवताओं से उत्तम मार्ग, सुख, रक्षा और मंगल की प्रार्थना की गई है.

सूक्त के अंतिम मंत्रों में समस्त प्रकृति के मधुर और कल्याणकारी होने की कामना की गई है. वायु, नदियां, औषधियां, रात्रि, उषा, पृथ्वी, आकाश, वनस्पतियां और सूर्य तक से मानव जीवन के लिए मंगलदायक बनने की प्रार्थना की गई है. यहां दी गई व्याख्या केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 90 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

मंत्र 1

मंत्र

ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयतु विद्वान्।
अर्यमा देवैः सजोषाः…

सरल अर्थ

उत्तम मार्ग को जानने वाले वरुण, मित्र तथा अन्य देवताओं के साथ समान भाव रखने वाले अर्यमा हमें सरल और कल्याणकारी मार्ग पर ले चलें.

व्याख्या

सूक्त का आरंभ जीवन के सही मार्ग की प्रार्थना से होता है. ऋषि चाहते हैं कि मनुष्य का जीवन धर्म और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़े. इसलिए वे वरुण, मित्र और अर्यमा जैसे देवों से उचित दिशा देने का निवेदन करते हैं.

मंत्र 2

मंत्र

ते हि वस्वो वसवानास्ते अप्रमूरा महोभिः।
व्रता रक्षन्ते विश्वाहा…

सरल अर्थ

धन देने वाले, मूढ़तारहित और बुद्धिमान देव अपने तेज से सदा संसार की रक्षा करते हैं तथा अपने व्रतों का पालन करते हैं.

व्याख্যা

यहां देवताओं के अनुशासन और कर्तव्यपालन का वर्णन है. ऋषि बताते हैं कि देव अपने नियमों का पालन करते हुए संसार की रक्षा करते हैं. यही कारण है कि वे मानव के लिए आदर्श माने गए हैं.

मंत्र 3

मंत्र

ते अस्मभ्यं शर्म यंसन्नमृता मर्त्येषु।
बाधमानाः अप द्विषः…

सरल अर्थ

वे अमर देव हमारे शत्रुओं का नाश करके हम नश्वर मनुष्यों को सुख और सुरक्षा प्रदान करें.

व्याख्या

इस मंत्र में ऋषि देवताओं से संरक्षण की प्रार्थना करते हैं. वे चाहते हैं कि जीवन में आने वाली बाधाएं दूर हों और मनुष्य निर्भय होकर अपना कर्तव्य पूरा कर सके.

मंत्र 4

मंत्र

वि नः पथः सुविताय चियन्त्विन्द्रो मरुतः।
पूषा भगो वन्द्यासः…

सरल अर्थ

स्तुति के योग्य इन्द्र, मरुद्गण, पूषा और भग हमें कल्याण तथा श्रेष्ठ लोक की प्राप्ति के लिए उत्तम मार्ग दिखाएं.

व्याख्या

यहां अनेक देवताओं से एक साथ मार्गदर्शन की प्रार्थना की गई है. ऋषि का भाव है कि जीवन का प्रत्येक कार्य शुभ मार्ग पर चलकर ही सफल होता है.

मंत्र 5

मंत्र

उत नो धियो गोअग्राः पूष्णो विष्णवेवयावः।
कर्ता नः स्वस्तिमतः…

सरल अर्थ

हे पूषा, विष्णु और मरुद्गण. हमारे यज्ञों को गौ आदि पशुओं से सम्पन्न बनाओ तथा हमें विनाशरहित और कल्याणकारी जीवन प्रदान करो.

व्याख्या

इस मंत्र में समृद्धि और सुरक्षा दोनों की कामना की गई है. गौधन और यज्ञ की सफलता उस समय सुखी जीवन के प्रमुख आधार माने जाते थे. इसलिए ऋषि इन देवताओं से अपने जीवन को समृद्ध बनाने की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 6

मंत्र

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः।
माध्वीर्नः सन्त्वोषधिः…

सरल अर्थ

यजमान के लिए वायु मधुर और सुखद चले. नदियां मधुर जल से प्रवाहित हों और औषधियां हमारे लिए हितकारी तथा सुखदायक बनें.

व्याख्या

यह मंत्र प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का सुंदर उदाहरण है. ऋषि चाहते हैं कि वायु, जल और औषधियां सभी जीवों के लिए कल्याणकारी हों. इससे प्रकृति और मानव के गहरे संबंध का परिचय मिलता है.

मंत्र 7

मंत्र

मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः।
मधु द्यौरस्तु नः पिता…

सरल अर्थ

हमारी रात्रियां और उषाएं मधुर हों. पृथ्वी तथा आकाश हमारे लिए सुखदायक बनें और आकाश पिता के समान हमारा पालन करे.

व्याख्या

यहां ऋषि दिन और रात दोनों के मंगलमय होने की कामना करते हैं. वे चाहते हैं कि प्रकृति का प्रत्येक रूप मानव जीवन के लिए सुख और शांति का कारण बने.

मंत्र 8

मंत्र

मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमानस्तु सूर्यः।
माध्वीर्गावो भवन्तु नः…

सरल अर्थ

वनस्पतियां, सूर्य और गौएं हमारे लिए मधुर, हितकारी और कल्याणकारी हों.

व्याख्या

यह मंत्र संपूर्ण प्रकृति को जीवनदाता के रूप में स्वीकार करता है. वनस्पतियां भोजन देती हैं, सूर्य ऊर्जा प्रदान करता है और गौएं पोषण का आधार हैं. इसलिए ऋषि इन सभी के कल्याणकारी बने रहने की प्रार्थना करते हैं.

मंत्र 9

मंत्र

शं नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्यमा।
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः शं नो विष्णुरुरुक्रमः…

सरल अर्थ

मित्र, वरुण, अर्यमा, इन्द्र, बृहस्पति और विस्तृत गति वाले विष्णु हमारे लिए सदैव मंगलकारी और सुखदायक हों.

व्याख्या

सूक्त का अंतिम मंत्र संपूर्ण मंगलकामना के साथ समाप्त होता है. ऋषि सभी प्रमुख देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि वे मनुष्य के जीवन में शांति, सुरक्षा और सुख बनाए रखें. यही पूरे सूक्त का मुख्य भाव है.

सूक्त का सार

ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 90 विश्वेदेवों के प्रति समर्पित एक सुंदर मंगलसूक्त है. इसमें मनुष्य के जीवन के लिए श्रेष्ठ मार्ग, सुरक्षा, समृद्धि, गौधन, प्रकृति की अनुकूलता और देवकृपा की कामना की गई है. सूक्त के उत्तरार्ध में वायु, नदियां, औषधियां, पृथ्वी, आकाश, सूर्य और वनस्पतियों के मधुर एवं हितकारी बनने की प्रार्थना इसे विशेष महत्व प्रदान करती है.

इस सूक्त का मुख्य संदेश यह है कि मानव जीवन का वास्तविक सुख तभी संभव है जब देवकृपा, प्रकृति का संतुलन और धर्ममय जीवन एक साथ बने रहें. इसलिए ऋषि सभी देवताओं और प्रकृति के प्रत्येक तत्व से समस्त मानवता के लिए मंगल और कल्याण की कामना करते हैं. यह व्याख्या केवल आपके द्वारा उपलब्ध कराए गए सूक्त 90 के पाठ और हिंदी अर्थ पर आधारित है.

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