श्रीमद्भागवत पुराण (स्कंध 1, अध्याय 4) : कथा का स्थिर होना
विस्तार से स्थिरता की ओर अब तक कथा अलग-अलग रूपों में सामने आ रही थी. कहीं प्रश्न था, कहीं उत्तर, कहीं विभिन्न रूपों की झलक. लेकिन यहाँ आकर वह थोड़ा स्थिर होती दिखाई देती है. ऐसा लगता है कि जो अब तक फैल रहा था, वह अब एक स्थान पर ठहरकर स्वयं को देख रहा…