ऋग्वेद मंडल 1 सूक्त 107. विश्वेदेवों से सुख, धन और रक्षा की प्रार्थना
ऋग्वेद के प्रथम मंडल का सूक्त 107 विश्वेदेवों को समर्पित है. यह एक छोटा सूक्त है, जिसमें देवताओं से सुख, धन, अन्न और सुरक्षा की प्रार्थना की गई है.
इस सूक्त में यज्ञ को देवताओं के लिए सुखद बताया गया है. ऋषि आदित्यों से सुख प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं और उस अनुग्रह की कामना करते हैं जो दरिद्र व्यक्ति को भी धनवान बना सकता है.
दूसरे मंत्र में देवताओं को अपनी सहायता के लिए पास आने का निवेदन किया गया है. इंद्र, मरुद्गण और अदिति का विशेष रूप से स्मरण करते हुए उनसे सुख देने की प्रार्थना की गई है. अंतिम मंत्र में इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता से अन्न देने तथा मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश से उसकी रक्षा करने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 1
मंत्र
यज्ञों देवानां प्रत्येति सुम्ममादित्यासो भवता मृव्ठ्यन्तः.
आ वोथर्वाची सुमतिर्ववृत्यादंहोश्रिद्या वरिवोवित्त
सरल हिंदी अर्थ
हमारा यज्ञ देवताओं को सुख देने वाला हो. हे आदित्यो. हमें सुखी करो. जो दरिद्र पुरुष को भी धनवान कराने वाला है, तुम्हारा वही अनुग्रह हमें प्राप्त हो.
सरल व्याख्या
सूक्त की शुरुआत यज्ञ से होती है. ऋषि चाहते हैं कि उनका यज्ञ देवताओं को सुख देने वाला बने. इसके बाद आदित्यों से सुख प्रदान करने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र का भाव केवल धन की इच्छा तक सीमित नहीं है. इसमें देवताओं के ऐसे अनुग्रह की कामना की गई है जो दरिद्र व्यक्ति को भी धनवान बना सके. ऋषि चाहते हैं कि ऐसा ही अनुग्रह उन्हें भी प्राप्त हो.
मंत्र 2
मंत्र
उप नो देवा अवसा गमन्त्वड्लिरिसां सामभि: स्तूयमाना:.
इन्द्र इन्द्रियर्मरुतो मरुद्धिरादित्यैनों अदिति: शर्म यंसत्
सरल हिंदी अर्थ
आंगिरस ऋषियों द्वारा गाए हुए इन मंत्रों से स्तुत देव रक्षा के लिए हमारे समीप आएं. इंद्र धन के साथ, मरुद्गण प्राण आदि वायुओं के साथ तथा अदिति आदित्यों के साथ हमें सुख दें.
सरल व्याख्या
दूसरे मंत्र में ऋषि देवताओं को अपने पास आने के लिए बुलाते हैं. उनका उद्देश्य देवताओं से सहायता और रक्षा प्राप्त करना है.
इस मंत्र में इंद्र, मरुद्गण और अदिति का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. इंद्र से धन के साथ आने, मरुद्गणों से प्राण आदि वायु के साथ आने और अदिति से आदित्यों के साथ सुख प्रदान करने की प्रार्थना की गई है.
मंत्र 3
मंत्र
तन्न इन्द्रस्तद्धरुणस्तदग्निस्तदर्यमा तत्सविता चनो धात्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौः..
सरल हिंदी अर्थ
हमारे द्वारा चाहा गया अन्न इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता हमें दें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी एवं आकाश हमारे उस अन्न की रक्षा करें.
सरल व्याख्या
सूक्त के अंतिम मंत्र में ऋषि अन्न की कामना करते हैं. इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता से अन्न देने की प्रार्थना की गई है.
इसके साथ केवल अन्न की प्राप्ति ही नहीं, बल्कि उसकी रक्षा की भी कामना की गई है. इसके लिए मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश का स्मरण किया गया है.
सूक्त का सार
ऋग्वेद मंडल 1 का सूक्त 107 छोटा होने के बावजूद अपनी प्रार्थना के भाव में बहुत स्पष्ट है. इसमें विश्वेदेवों से सुख, धन, अन्न और सुरक्षा की कामना की गई है.
पहले मंत्र में यज्ञ को देवताओं के लिए सुखद बनाने और आदित्यों से सुख देने की प्रार्थना की गई है. ऋषि ऐसे अनुग्रह की कामना करते हैं जो दरिद्र व्यक्ति को भी धनवान बना सके.
दूसरे मंत्र में देवताओं को रक्षा के लिए अपने पास आने का आह्वान किया गया है. इंद्र, मरुद्गण और अदिति का विशेष उल्लेख करते हुए उनसे सुख प्रदान करने की प्रार्थना की गई है.
अंतिम मंत्र में अन्न की प्राप्ति की इच्छा सामने आती है. इंद्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा और सविता से अन्न देने की प्रार्थना की गई है. इसके बाद मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, पृथ्वी और आकाश से उस अन्न की रक्षा करने की कामना की गई है.
इस प्रकार सूक्त 107 का मूल भाव देवताओं के प्रति श्रद्धा रखते हुए सुख, धन, अन्न और रक्षा की प्रार्थना करना है. यह सूक्त बहुत छोटा है और इसमें केवल तीन मंत्र हैं. आपकी दी हुई PDF में तीसरे मंत्र के बाद सूक्त 108 शुरू हो जाता है, इसलिए सूक्त 108 के मंत्रों को इसमें शामिल नहीं किया गया है